# hi/farooq.xml.gz
# hi/hindi.xml.gz


(src)="s1.1"> अल ् लाह के नाम से जो बड ़ ा कृपालु और अत ् यन ् त दयावान हैं ।
(trg)="s1.1"> अल ् लाह के नाम से जो रहमान व रहीम है ।

(src)="s1.2"> प ् रशंसा अल ् लाह ही के लिए हैं जो सारे संसार का रब हैं
(trg)="s1.2"> तारीफ ़ अल ् लाह ही के लिये है जो तमाम क ़ ायनात का रब है ।

(src)="s1.3"> बड ़ ा कृपालु , अत ् यन ् त दयावान हैं
(trg)="s1.3"> रहमान और रहीम है ।

(src)="s1.4"> बदला दिए जाने के दिन का मालिक हैं
(trg)="s1.4"> रोज ़ े जज ़ ा का मालिक है ।

(src)="s1.5"> हम तेरी बन ् दगी करते हैं और तुझी से मदद माँगते हैं
(trg)="s1.5"> हम तेरी ही इबादत करते हैं , और तुझ ही से मदद मांगते है ।

(src)="s1.6"> हमें सीधे मार ् ग पर चला
(trg)="s1.6"> हमें सीधा रास ् ता दिखा ।

(src)="s1.7"> उन लोगों के मार ् ग पर जो तेरे कृपापात ् र हुए , जो न प ् रकोप के भागी हुए और न पथभ ् रष ् ट
(trg)="s1.7"> उन लोगों का रास ् ता जिन पर तूने इनाम फ ़ रमाया , जो माअतूब नहीं हुए , जो भटके हुए नहीं है ।

(src)="s2.1"> अलीफ ़ ॰ लाम ॰ मीम ॰
(trg)="s2.1"> अलीफ़ लाम मीम

(src)="s2.2"> वह किताब यही हैं , जिसमें कोई सन ् देह नहीं , मार ् गदर ् शन हैं डर रखनेवालों के लिए ,
(trg)="s2.2"> ( ये ) वह किताब है । जिस ( के किताबे खुदा होने ) में कुछ भी शक नहीं ( ये ) परहेज़गारों की रहनुमा है

(src)="s2.3"> जो अनदेखे ईमान लाते हैं , नमाज ़ क ़ ायम करते हैं और जो कुछ हमने उन ् हें दिया हैं उसमें से कुछ खर ् च करते हैं ;
(trg)="s2.3"> जो ग़ैब पर ईमान लाते हैं और ( पाबन ् दी से ) नमाज़ अदा करते हैं और जो कुछ हमने उनको दिया है उसमें से ( राहे खुदा में ) ख़र ् च करते हैं

(src)="s2.4"> और जो उस पर ईमान लाते हैं जो तुम पर उतरा और जो तुमसे पहले अवतरित हुआ हैं और आख ़ िरत पर वही लोग विश ् वास रखते हैं ;
(trg)="s2.4"> और जो कुछ तुम पर ( ऐ रसूल ) और तुम से पहले नाज़िल किया गया है उस पर ईमान लाते हैं और वही आख़िरत का यक़ीन भी रखते हैं

(src)="s2.5"> वही लोग हैं जो अपने रब के सीधे मार ् ग पर हैं और वही सफलता प ् राप ् त करनेवाले हैं
(trg)="s2.5"> यही लोग अपने परवरदिगार की हिदायत पर ( आमिल ) हैं और यही लोग अपनी दिली मुरादें पाएँगे

(src)="s2.6"> जिन लोगों ने कुफ ़ ् र ( इनकार ) किया उनके लिए बराबर हैं , चाहे तुमने उन ् हें सचेत किया हो या सचेत न किया हो , वे ईमान नहीं लाएँगे
(trg)="s2.6"> बेशक जिन लोगों ने कुफ ़ ् र इख़तेयार किया उनके लिए बराबर है ( ऐ रसूल ) ख ् वाह ( चाहे ) तुम उन ् हें डराओ या न डराओ वह ईमान न लाएँगे

(src)="s2.7"> अल ् लाह ने उनके दिलों पर और कानों पर मुहर लगा दी है और उनकी आँखों पर परदा पड ़ ा है , और उनके लिए बड ़ ी यातना है
(trg)="s2.7"> उनके दिलों पर और उनके कानों पर ( नज़र करके ) खुदा ने तसदीक़ कर दी है ( कि ये ईमान न लाएँगे ) और उनकी ऑंखों पर परदा ( पड़ा हुआ ) है और उन ् हीं के लिए ( बहुत ) बड़ा अज़ाब है

(src)="s2.8"> कुछ लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि हम अल ् लाह और अन ् तिम दिन पर ईमान रखते हैं , हालाँकि वे ईमान नहीं रखते
(trg)="s2.8"> और बाज़ लोग ऐसे भी हैं जो ( ज़बान से तो ) कहते हैं कि हम खुदा पर और क़यामत पर ईमान लाए हालाँकि वह दिल से ईमान नहीं लाए

(src)="s2.9"> वे अल ् लाह और ईमानवालों के साथ धोखेबाज ़ ी कर रहे हैं , हालाँकि धोखा वे स ् वयं अपने-आपको ही दे रहे हैं , परन ् तु वे इसको महसूस नहीं करते
(trg)="s2.9"> खुदा को और उन लोगों को जो ईमान लाए धोखा देते हैं हालाँकि वह अपने आपको धोखा देते हैं और कुछ शऊर नहीं रखते हैं

(src)="s2.10"> उनके दिलों में रोग था तो अल ् लाह ने उनके रोग को और बढ ़ ा दिया और उनके लिए झूठ बोलते रहने के कारण उनके लिए एक दुखद यातना है
(trg)="s2.10"> उनके दिलों में मर ् ज़ था ही अब खुदा ने उनके मर ् ज़ को और बढ़ा दिया और चूँकि वह लोग झूठ बोला करते थे इसलिए उन पर तकलीफ देह अज़ाब है

(src)="s2.11"> और जब उनसे कहा जाता है कि " ज ़ मीन में बिगाड ़ पैदा न करो " , तो कहते हैं , " हम तो केवल सुधारक है । " "
(trg)="s2.11"> और जब उनसे कहा जाता है कि मुल ् क में फसाद न करते फिरो ( तो ) कहते हैं कि हम तो सिर ् फ इसलाह करते हैं

(src)="s2.12"> जान लो ! वही हैं जो बिगाड ़ पैदा करते हैं , परन ् तु उन ् हें एहसास नहीं होता
(trg)="s2.12"> ख़बरदार हो जाओ बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं

(src)="s2.13"> और जब उनसे कहा जाता है , " ईमान लाओ जैसे लोग ईमान लाए हैं " , कहते हैं , " क ् या हम ईमान लाए जैसे कम समझ लोग ईमान लाए हैं ? " जान लो , वही कम समझ हैं परन ् तु जानते नहीं
(trg)="s2.13"> और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क ् या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकूफ़ लोग ईमान लाएँ , ख़बरदार हो जाओ लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते

(src)="s2.14"> और जब ईमान लानेवालों से मिलते हैं तो कहते , " हम भी ईमान लाए हैं , " और जब एकान ् त में अपने शैतानों के पास पहुँचते हैं , तो कहते हैं , " हम तो तुम ् हारे साथ हैं और यह तो हम केवल परिहास कर रहे हैं । "
(trg)="s2.14"> और जब उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान ला चुके तो कहते हैं हम तो ईमान ला चुके और जब अपने शैतानों के साथ तनहा रह जाते हैं तो कहते हैं हम तुम ् हारे साथ हैं हम तो ( मुसलमानों को ) बनाते हैं

(src)="s2.15"> अल ् लाह उनके साथ परिहास कर रहा है और उन ् हें उनकी सरकशी में ढील दिए जाता है , वे भटकते फिर रहे हैं
(trg)="s2.15"> ( वह क ् या बनाएँगे ) खुदा उनको बनाता है और उनको ढील देता है कि वह अपनी सरकशी में ग़लत पेचाँ ( उलझे ) रहें

(src)="s2.16"> यही वे लोग हैं , जिन ् होंने मार ् गदर ् शन के बदले में गुमराही मोल ली , किन ् तु उनके इस व ् यापार में न कोई लाभ पहुँचाया , और न ही वे सीधा मार ् ग पा सके
(trg)="s2.16"> यही वह लोग हैं जिन ् होंने हिदायत के बदले गुमराही ख़रीद ली , फिर न उनकी तिजारत ही ने कुछ नफ़ा दिया और न उन लोगों ने हिदायत ही पाई

(src)="s2.17"> उनकी मिसाल ऐसी हैं जैसे किसी व ् यक ् ति ने आग जलाई , फिर जब उसने उसके वातावरण को प ् रकाशित कर दिया , तो अल ् लाह ने उसका प ् रकाश ही छीन लिया और उन ् हें अँधेरों में छोड ़ दिया जिससे उन ् हें कुछ सुझाई नहीं दे रहा हैं
(trg)="s2.17"> उन लोगों की मिसाल ( तो ) उस शख ् स की सी है जिसने ( रात के वक ् त मजमे में ) भड़कती हुईआग रौशन की फिर जब आग ( के शोले ) ने उसके गिर ् दों पेश ( चारों ओर ) खूब उजाला कर दिया तो खुदा ने उनकी रौशनी ले ली और उनको घटाटोप अंधेरे में छोड़ दिया

(src)="s2.18"> वे बहरे हैं , गूँगें हैं , अन ् धे हैं , अब वे लौटने के नहीं
(trg)="s2.18"> कि अब उन ् हें कुछ सुझाई नहीं देता ये लोग बहरे गूँगे अन ् धे हैं कि फिर अपनी गुमराही से बाज़ नहीं आ सकते

(src)="s2.19"> या ( उनकी मिसाल ऐसी है ) जैसे आकाश से वर ् षा हो रही हो जिसके साथ अँधेरे हों और गरज और चमक भी हो , वे बिजली की कड ़ क के कारण मृत ् यु के भय से अपने कानों में उँगलियाँ दे ले रहे हों - और अल ् लाह ने तो इनकार करनेवालों को घेर रखा हैं
(trg)="s2.19"> या उनकी मिसाल ऐसी है जैसे आसमानी बारिश जिसमें तारिकियाँ ग़र ् ज़ बिजली हो मौत के खौफ से कड़क के मारे अपने कानों में ऊँगलियाँ दे लेते हैं हालाँकि खुदा काफ़िरों को ( इस तरह ) घेरे हुए है ( कि उसक हिल नहीं सकते )

(src)="s2.20"> मानो शीघ ् र ही बिजली उनकी आँखों की रौशनी उचक लेने को है ; जब भी उनपर चमकती हो , वे चल पड ़ ते हो और जब उनपर अँधेरा छा जाता हैं तो खड ़ े हो जाते हो ; अगर अल ् लाह चाहता तो उनकी सुनने और देखने की शक ् ति बिलकुल ही छीन लेता । निस ् सन ् देह अल ् लाह को हर चीज ़ की सामर ् थ ् य प ् राप ् त है
(trg)="s2.20"> क़रीब है कि बिजली उनकी ऑंखों को चौन ् धिया दे जब उनके आगे बिजली चमकी तो उस रौशनी में चल खड़े हुए और जब उन पर अंधेरा छा गया तो ( ठिठके के ) खड़े हो गए और खुदा चाहता तो यूँ भी उनके देखने और सुनने की कूवतें छीन लेता बेशक खुदा हर चीज़ पर क़ादिर है

(src)="s2.21"> ऐ लोगो ! बन ् दगी करो अपने रब की जिसने तुम ् हें और तुमसे पहले के लोगों को पैदा किया , ताकि तुम बच सको ;
(trg)="s2.21"> ऐ लोगों अपने परवरदिगार की इबादत करो जिसने तुमको और उन लोगों को जो तुम से पहले थे पैदा किया है अजब नहीं तुम परहेज़गार बन जाओ

(src)="s2.22"> वही है जिसने तुम ् हारे लिए ज ़ मीन को फर ् श और आकाश को छत बनाया , और आकाश से पानी उतारा , फिर उसके द ् वारा हर प ् रकार की पैदावार की और फल तुम ् हारी रोजी के लिए पैदा किए , अतः जब तुम जानते हो तो अल ् लाह के समकक ् ष न ठहराओ
(trg)="s2.22"> जिसने तुम ् हारे लिए ज़मीन का बिछौना और आसमान को छत बनाया और आसमान से पानी बरसाया फिर उसी ने तुम ् हारे खाने के लिए बाज़ फल पैदा किए पस किसी को खुदा का हमसर न बनाओ हालाँकि तुम खूब जानते हो

(src)="s2.23"> और अगर उसके विषय में जो हमने अपने बन ् दे पर उतारा हैं , तुम किसी सन ् देह में न हो तो उस जैसी कोई सूरा ले आओ और अल ् लाह से हटकर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम ् हें विश ् वास हैं , यदि तुम सच ् चे हो
(trg)="s2.23"> और अगर तुम लोग इस कलाम से जो हमने अपने बन ् दे ( मोहम ् मद ) पर नाज़िल किया है शक में पड़े हो पस अगर तुम सच ् चे हो तो तुम ( भी ) एक सूरा बना लाओ और खुदा के सिवा जो भी तुम ् हारे मददगार हों उनको भी बुला लो

(src)="s2.24"> फिर अगर तुम ऐसा न कर सको और तुम कदापि नहीं कर सकते , तो डरो उस आग से जिसका ईधन इनसान और पत ् थर हैं , जो इनकार करनेवालों के लिए तैयार की गई है
(trg)="s2.24"> पस अगर तुम ये नहीं कर सकते हो और हरगिज़ नहीं कर सकोगे तो उस आग से डरो सिके ईधन आदमी और पत ् थर होंगे और काफ़िरों के लिए तैयार की गई है

(src)="s2.25"> जो लोग ईमान लाए और उन ् होंने अच ् छे कर ् म किए उन ् हें शुभ सूचना दे दो कि उनके लिए ऐसे बाग ़ है जिनके नीचे नहरें बह रहीं होगी ; जब भी उनमें से कोई फल उन ् हें रोजी के रूप में मिलेगा , तो कहेंगे , " यह तो वही हैं जो पहले हमें मिला था , " और उन ् हें मिलता-जुलता ही ( फल ) मिलेगा ; उनके लिए वहाँ पाक-साफ ़ पत ् नि याँ होगी , और वे वहाँ सदैव रहेंगे
(trg)="s2.25"> और जो लोग ईमान लाए और उन ् होंने नेक काम किए उनको ( ऐ पैग़म ् बर ) खुशख़बरी दे दो कि उनके लिए ( बेहिश ् त के ) वह बाग़ात हैं जिनके नीचे नहरे जारी हैं जब उन ् हें इन बाग़ात का कोई मेवा खाने को मिलेगा तो कहेंगे ये तो वही ( मेवा है जो पहले भी हमें खाने को मिल चुका है ) ( क ् योंकि ) उन ् हें मिलती जुलती सूरत व रंग के ( मेवे ) मिला करेंगे और बेहिश ् त में उनके लिए साफ सुथरी बीवियाँ होगी और ये लोग उस बाग़ में हमेशा रहेंगे

(src)="s2.26"> निस ् संदेह अल ् लाह नहीं शरमाता कि वह कोई मिसाल पेश करे चाहे वह हो मच ् छर की , बल ् कि उससे भी बढ ़ कर किसी तुच ् छ चीज ़ की । फिर जो ईमान लाए है वे तो जानते है कि वह उनके रब की ओर से सत ् य हैं ; रहे इनकार करनेवाले तो वे कहते है , " इस मिसाल से अल ् लाह का अभिप ् राय क ् या है ? " इससे वह बहुतों को भटकने देता है और बहुतों को सीधा मार ् ग दिखा देता है , मगर इससे वह केवल अवज ् ञाकारियों ही को भटकने देता है
(trg)="s2.26"> बेशक खुदा मच ् छर या उससे भी बढ़कर ( हक़ीर चीज़ ) की कोई मिसाल बयान करने में नहीं झेंपता पस जो लोग ईमान ला चुके हैं वह तो ये यक़ीन जानते हैं कि ये ( मिसाल ) बिल ् कुल ठीक है और ये परवरदिगार की तरफ़ से है ( अब रहे ) वह लोग जो काफ़िर है पस वह बोल उठते हैं कि खुदा का उस मिसाल से क ् या मतलब है , ऐसी मिसाल से ख़ुदा बहुतेरों की हिदायत करता है मगर गुमराही में छोड़ता भी है तो ऐसे बदकारों को

(src)="s2.27"> जो अल ् लाह की प ् रतिज ् ञा को उसे सुदृढ ़ करने के पश ् चात भंग कर देते हैं और जिसे अल ् लाह ने जोड ़ ने का आदेश दिया है उसे काट डालते हैं , और ज ़ मीन में बिगाड ़ पैदा करते हैं , वही हैं जो घाटे में हैं
(trg)="s2.27"> जो लोग खुदा के एहदो पैमान को मज़बूत हो जाने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन ( ताल ् लुक़ात ) का खुदा ने हुक ् म दिया है उनको क़ताआ कर देते हैं और मुल ् क में फसाद करते फिरते हैं , यही लोग घाटा उठाने वाले हैं

(src)="s2.28"> तुम अल ् लाह के साथ अविश ् वास की नीति कैसे अपनाते हो , जबकि तुम निर ् जीव थे तो उसने तुम ् हें जीवित किया , फिर वही तुम ् हें मौत देता हैं , फिर वही तुम ् हें जीवित करेगा , फिर उसी की ओर तुम ् हें लौटना हैं ?
(trg)="s2.28"> ( हाँए ) क ् यों कर तुम खुदा का इन ् कार कर सकते हो हालाँकि तुम ( माओं के पेट में ) बेजान थे तो उसी ने तुमको ज़िन ् दा किया फिर वही तुमको मार डालेगा , फिर वही तुमको ( दोबारा क़यामत में ) ज़िन ् दा करेगा फिर उसी की तरफ लौटाए जाओगे

(src)="s2.29"> वही तो है जिसने तुम ् हारे लिए ज ़ मीन की सारी चीज ़ े पैदा की , फिर आकाश की ओर रुख ़ किया और ठीक तौर पर सात आकाश बनाए और वह हर चीज ़ को जानता है
(trg)="s2.29"> वही तो वह ( खुदा ) है जिसने तुम ् हारे ( नफ़े ) के ज़मीन की कुल चीज़ों को पैदा किया फिर आसमान ( के बनाने ) की तरफ़ मुतावज ् जेह हुआ तो सात आसमान हमवार ( व मुसतहकम ) बना दिए और वह ( खुदा ) हर चीज़ से ( खूब ) वाक़िफ है

(src)="s2.30"> और याद करो जब तुम ् हारे रब ने फरिश ् तों से कहा कि " मैं धरती में ( मनुष ् य को ) खलीफ ़ ा ( सत ् ताधारी ) बनानेवाला हूँ । " उन ् होंने कहा , " क ् या उसमें उसको रखेगा , जो उसमें बिगाड ़ पैदा करे और रक ् तपात करे और हम तेरा गुणगान करते और तुझे पवित ् र कहते हैं ? " उसने कहा , " मैं जानता हूँ जो तुम नहीं जानते । "
(trg)="s2.30"> और ( ऐ रसूल ) उस वक ् त क़ो याद करो जब तुम ् हारे परवरदिगार ने फ़रिश ् तों से कहा कि मैं ( अपना ) एक नाएब ज़मीन में बनानेवाला हूँ ( फरिश ् ते ताज ् जुब से ) कहने लगे क ् या तू ज़मीन ऐसे शख ् स को पैदा करेगा जो ज़मीन में फ़साद और खूँरेज़ियाँ करता फिरे हालाँकि ( अगर ) ख़लीफा बनाना है ( तो हमारा ज ् यादा हक़ है ) क ् योंकि हम तेरी तारीफ व तसबीह करते हैं और तेरी पाकीज़गी साबित करते हैं तब खुदा ने फरमाया इसमें तो शक ही नहीं कि जो मैं जानता हूँ तुम नहीं जानते

(src)="s2.31"> उसने ( अल ् लाह ने ) आदम को सारे नाम सिखाए , फिर उन ् हें फ ़ रिश ् तों के सामने पेश किया और कहा , " अगर तुम सच ् चे हो तो मुझे इनके नाम बताओ । "
(trg)="s2.31"> और ( आदम की हक़ीक़म ज़ाहिर करने की ग़रज़ से ) आदम को सब चीज़ों के नाम सिखा दिए फिर उनको फरिश ् तों के सामने पेश किया और फ़रमाया कि अगर तुम अपने दावे में कि हम मुस ् तहके ख़िलाफ़त हैं । सच ् चे हो तो मुझे इन चीज़ों के नाम बताओ

(src)="s2.32"> वे बोले , " पाक और महिमावान है तू ! तूने जो कुछ हमें बताया उसके सिवा हमें कोई ज ् ञान नहीं । निस ् संदेह तू सर ् वज ् ञ , तत ् वदर ् शी है । "
(trg)="s2.32"> तब फ़रिश ् तों ने ( आजिज़ी से ) अर ् ज़ की तू ( हर ऐब से ) पाक व पाकीज़ा है हम तो जो कुछ तूने बताया है उसके सिवा कुछ नहीं जानते तू बड़ा जानने वाला , मसलहतों का पहचानने वाला है

(src)="s2.33"> उसने कहा , " ऐ आदम ! उन ् हें उन लोगों के नाम बताओ । " फिर जब उसने उन ् हें उनके नाम बता दिए तो ( अल ् लाह ने ) कहा , " क ् या मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आकाशों और धरती की छिपी बातों को जानता हूँ और मैं जानता हूँ जो कुछ तुम ज ़ ाहिर करते हो और जो कुछ छिपाते हो । "
(trg)="s2.33"> ( उस वक ् त ख़ुदा ने आदम को ) हुक ् म दिया कि ऐ आदम तुम इन फ़रिश ् तों को उन सब चीज़ों के नाम बता दो बस जब आदम ने फ़रिश ् तों को उन चीज़ों के नाम बता दिए तो खुदा ने फरिश ् तों की तरफ ख़िताब करके फरमाया क ् यों , मैं तुमसे न कहता था कि मैं आसमानों और ज़मीनों के छिपे हुए राज़ को जानता हूँ , और जो कुछ तुम अब ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाते थे ( वह सब ) जानता हूँ

(src)="s2.34"> और याद करो जब हमने फ ़ रिश ् तों से कहा कि " आदम को सजदा करो " तो , उन ् होंने सजदा किया सिवाय इबलील के ; उसने इनकार कर दिया और लगा बड ़ ा बनने और काफ ़ िर हो रहा
(trg)="s2.34"> और ( उस वक ् त क़ो याद करो ) जब हमने फ़रिश ् तों से कहा कि आदम को सजदा करो तो सब के सब झुक गए मगर शैतान ने इन ् कार किया और ग़ुरूर में आ गया और काफ़िर हो गया

(src)="s2.35"> और हमने कहा , " ऐ आदम ! तुम और तुम ् हारी पत ् नी जन ् नत में रहो और वहाँ जी भर बेरोक-टोक जहाँ से तुम दोनों का जी चाहे खाओ , लेकिन इस वृक ् ष के पास न जाना , अन ् यथा तुम ज ़ ालिम ठहरोगे । "
(trg)="s2.35"> और हमने आदम से कहा ऐ आदम तुम अपनी बीवी समैत बेहिश ् त में रहा सहा करो और जहाँ से तुम ् हारा जी चाहे उसमें से ब फराग़त खाओ ( पियो ) मगर उस दरख ् त के पास भी न जाना ( वरना ) फिर तुम अपना आप नुक़सान करोगे

(src)="s2.36"> अन ् ततः शैतान ने उन ् हें वहाँ से फिसला दिया , फिर उन दोनों को वहाँ से निकलवाकर छोड ़ ा , जहाँ वे थे । हमने कहा कि " उतरो , तुम एक-दूसरे के शत ् रु होगे और तुम ् हें एक समय तक धरती में ठहरना और बिसलना है । "
(trg)="s2.36"> तब शैतान ने आदम व हौव ् वा को ( धोखा देकर ) वहाँ से डगमगाया और आख़िर कार उनको जिस ( ऐश व राहत ) में थे उनसे निकाल फेंका और हमने कहा ( ऐ आदम व हौव ् वा ) तुम ( ज़मीन पर ) उतर पड़ो तुममें से एक का एक दुशमन होगा और ज़मीन में तुम ् हारे लिए एक ख़ास वक ् त ( क़यामत ) तक ठहराव और ठिकाना है

(src)="s2.37"> फिर आदम ने अपने रब से कुछ शब ् द पा लिए , तो अल ् लाह ने उसकी तौबा क ़ बूल कर ली ; निस ् संदेह वही तौबा क ़ बूल करने वाला , अत ् यन ् त दयावान है
(trg)="s2.37"> फिर आदम ने अपने परवरदिगार से ( माज़रत के चन ् द अल ् फाज़ ) सीखे पस खुदा ने उन अल ् फाज़ की बरकत से आदम की तौबा कुबूल कर ली बेशक वह बड़ा माफ़ करने वाला मेहरबान है

(src)="s2.38"> हमने कहा , " तुम सब यहाँ से उतरो , फिर यदि तुम ् हारे पास मेरी ओर से कोई मार ् गदर ् शन पहुँचे तो जिस किसी ने मेरे मार ् गदर ् शन का अनुसरण किया , तो ऐसे लोगों को न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे । "
(trg)="s2.38"> ( और जब आदम को ) ये हुक ् म दिया था कि यहाँ से उतर पड़ो ( तो भी कह दिया था कि ) अगर तुम ् हारे पास मेरी तरफ़ से हिदायत आए तो ( उसकी पैरवी करना क ् योंकि ) जो लोग मेरी हिदायत पर चलेंगे उन पर ( क़यामत ) में न कोई ख़ौफ होगा

(src)="s2.39"> और जिन लोगों ने इनकार किया और हमारी आयतों को झुठलाया , वहीं आग में पड ़ नेवाले हैं , वे उसमें सदैव रहेंगे
(trg)="s2.39"> और न वह रंजीदा होगे और ( ये भी याद रखो ) जिन लोगों ने कुफ ् र इख़तेयार किया और हमारी आयतों को झुठलाया तो वही जहन ् नुमी हैं और हमेशा दोज़ख़ में पड़े रहेगे

(src)="s2.40"> ऐ इसराईल का सन ् तान ! याद करो मेरे उस अनुग ् रह को जो मैंने तुमपर किया था । और मेरी प ् रतिज ् ञा को पूरा करो , मैं तुमसे की हुई प ् रतिज ् ञा को पूरा करूँगा और हाँ मुझी से डरो
(trg)="s2.40"> ऐ बनी इसराईल ( याक ़ ूब की औलाद ) मेरे उन एहसानात को याद करो जो तुम पर पहले कर चुके हैं और तुम मेरे एहद व इक़रार ( ईमान ) को पूरा करो तो मैं तुम ् हारे एहद ( सवाब ) को पूरा करूँगा , और मुझ ही से डरते रहो

(src)="s2.41"> और ईमान लाओ उस चीज ़ पर जो मैंने उतारी है , जो उसकी पुष ् टि में है , जो तुम ् हारे पास है , और सबसे पहले तुम ही उसके इनकार करनेवाले न बनो । और मेरी आयतों को थोड ़ ा मूल ् य प ् राप ् त करने का साधन न बनाओ , मुझसे ही तुम डरो
(trg)="s2.41"> और जो ( कुरान ) मैंने नाज़िल किया वह उस किताब ( तौरेत ) की ( भी ) तसदीक़ करता हूँ जो तुम ् हारे पास है और तुम सबसे चले उसके इन ् कार पर मौजूद न हो जाओ और मेरी आयतों के बदले थोड़ी क़ीमत ( दुनयावी फायदा ) न लो और मुझ ही से डरते रहो

(src)="s2.42"> और सत ् य में असत ् य का घाल-मेल न करो और जानते-बुझते सत ् य को छिपाओ मत
(trg)="s2.42"> और हक़ को बातिल के साथ न मिलाओ और हक़ बात को न छिपाओ हालाँकि तुम जानते हो और पाबन ् दी से नमाज़ अदा करो

(src)="s2.43"> और नमाज ़ क ़ ायम करो और ज ़ कात दो और ( मेरे समक ् ष ) झुकनेवालों के साथ झुको
(trg)="s2.43"> और ज़कात दिया करो और जो लोग ( हमारे सामने ) इबादत के लिए झुकते हैं उनके साथ तुम भी झुका करो

(src)="s2.44"> क ् या तुम लोगों को तो नेकी और एहसान का उपदेश देते हो और अपने आपको भूल जाते हो , हालाँकि तुम किताब भी पढ ़ ते हो ? फिर क ् या तुम बुद ् धि से काम नहीं लेते ?
(trg)="s2.44"> और तुम लोगों से नेकी करने को कहते हो और अपनी ख़बर नहीं लेते हालाँकि तुम किताबे खुदा को ( बराबर ) रटा करते हो तो तुम क ् या इतना भी नहीं समझते

(src)="s2.45"> धैर ् य और नमाज ़ से मदद लो , और निस ् संदेह यह ( नमाज ) बहुत कठिन है , किन ् तु उन लोगों के लिए नहीं जिनके दिल पिघले हुए हो ;
(trg)="s2.45"> और ( मुसीबत के वक ् त ) सब ् र और नमाज़ का सहारा पकड़ो और अलबत ् ता नमाज़ दूभर तो है मगर उन ख़ाक़सारों पर ( नहीं ) जो बख़ूबी जानते हैं

(src)="s2.46"> जो समझते है कि उन ् हें अपने रब से मिलना हैं और उसी की ओर उन ् हें पलटकर जाना है
(trg)="s2.46"> कि वह अपने परवरदिगार की बारगाह में हाज़िर होंगे और ज़रूर उसकी तरफ लौट जाएँगे

(src)="s2.47"> ऐ इसराईल की सन ् तान ! याद करो मेरे उस अनुग ् रह को जो मैंने तुमपर किया और इसे भी कि मैंने तुम ् हें सारे संसार पर श ् रेष ् ठता प ् रदान की थी ;
(trg)="s2.47"> ऐ बनी इसराइल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंने पहले तुम ् हें दी और ये ( भी तो सोचो ) कि हमने तुमको सारे जहान के लोगों से बढ़ा दिया

(src)="s2.48"> और डरो उस दिन से जब न कोई किसी भी ओर से कुछ तावान भरेगा और न किसी की ओर से कोई सिफ ़ ारिश ही क ़ बूल की जाएगी और न किसी की ओर से कोई फ ़ िद ् ‌ या ( अर ् थदंड ) लिया जाएगा और न वे सहायता ही पा सकेंगे ।
(trg)="s2.48"> और उस दिन से डरो ( जिस दिन ) कोई शख ् स किसी की तरफ से न फिदिया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई सिफारिश मानी जाएगी और न उसका कोई मुआवज़ा लिया जाएगा और न वह मदद पहुँचाए जाएँगे

(src)="s2.49"> और याद करो जब हमने तुम ् हें फ ़ िरऔनियों से छुटकारा दिलाया जो तुम ् हें अत ् यन ् त बुरी यातना देते थे , तुम ् हारे बेटों को मार डालते थे और तुम ् हारी स ् त ् रियों को जीवित रहने देते थे ; और इसमं तुम ् हारे रब की ओर से बड ़ ी परीक ् षा थी
(trg)="s2.49"> और ( उस वक ् त क़ो याद करो ) जब हमने तुम ् हें ( तुम ् हारे बुर ् ज़गो को ) फिरऔन ( के पन ् जे ) से छुड़ाया जो तुम ् हें बड़े-बड़े दुख दे के सताते थे तुम ् हारे लड़कों पर छुरी फेरते थे और तुम ् हारी औरतों को ( अपनी ख़िदमत के लिए ) ज़िन ् दा रहने देते थे और उसमें तुम ् हारे परवरदिगार की तरफ से ( तुम ् हारे सब ् र की ) सख ् त आज़माइश थी

(src)="s2.50"> याद करो जब हमने तुम ् हें सागर में अलग-अलग चौड ़ े रास ् ते से ले जाकर छुटकारा दिया और फ ़ िरऔनियों को तुम ् हारी आँखों के सामने डूबो दिया
(trg)="s2.50"> और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब हमने तुम ् हारे लिए दरिया को टुकड़े-टुकड़े किया फिर हमने तुमको छुटकारा दिया

(src)="s2.51"> और याद करो जब हमने मूसा से चालीस रातों का वादा ठहराया तो उसके पीछे तुम बछड ़ े को अपना देवता बना बैठे , तुम अत ् याचारी थे
(trg)="s2.51"> और फिरऔन के आदमियों को तुम ् हारे देखते-देखते डुबो दिया और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब हमने मूसा से चालीस रातों का वायदा किया था और तुम लोगों ने उनके जाने के बाद एक बछड़े को ( परसतिश के लिए खुदा ) बना लिया

(src)="s2.52"> फिर इसके पश ् चात भी हमने तुम ् हें क ् षमा किया , ताकि तुम कृतज ् ञता दिखालाओ
(trg)="s2.52"> हालाँकि तुम अपने ऊपर ज़ुल ् म जोत रहे थे फिर हमने उसके बाद भी दरगुज़र की ताकि तुम शुक ् र करो

(src)="s2.53"> और याद करो जब मूसा को हमने किताब और कसौटी प ् रदान की , ताकि तुम मार ् ग पा सको
(trg)="s2.53"> और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब मूसा को ( तौरेत ) अता की और हक़ और बातिल को जुदा करनेवाला क़ानून ( इनायत किया ) ताके तुम हिदायत पाओ

(src)="s2.54"> और जब मूसा ने अपनी क ़ ौम से कहा , " ऐ मेरी कौम के लोगो ! बछड ़ े को देवता बनाकर तुमने अपने ऊपर ज ़ ुल ् म किया है , तो तुम अपने पैदा करनेवाले की ओर पलटो , अतः अपने लोगों को स ् वयं क ़ त ् ल करो । यही तुम ् हारे पैदा करनेवाले की स ् पष ् ट में तुम ् हारे लिए अच ् छा है , फिर उसने तुम ् हारी तौबा क ़ बूल कर ली । निस ् संदेह वह बड ़ ी तौबा क ़ बूल करनेवाला , अत ् यन ् त दयावान है । "
(trg)="s2.54"> और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ऐ मेरी क़ौम तुमने बछड़े को ( ख़ुदा ) बना के अपने ऊपर बड़ा सख ् त जुल ् म किया तो अब ( इसके सिवा कोई चारा नहीं कि ) तुम अपने ख़ालिक की बारगाह में तौबा करो और वह ये है कि अपने को क़त ् ल कर डालो तुम ् हारे परवरदिगार के नज़दीक तुम ् हारे हक़ में यही बेहतर है , फिर जब तुमने ऐसा किया तो खुदा ने तुम ् हारी तौबा क़ुबूल कर ली बेशक वह बड़ा मेहरबान माफ़ करने वाला है

(src)="s2.55"> और याद करो जब तुमने कहा था , " ऐ मूसा , हम तुमपर ईमान नहीं लाएँगे जब तक अल ् लाह को खुल ् लम-खुल ् ला न देख लें । " फिर एक कड ़ क ने तुम ् हें आ दबोचा , तुम देखते रहे
(trg)="s2.55"> और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब तुमने मूसा से कहा था कि ऐ मूसा हम तुम पर उस वक ् त तक ईमान न लाएँगे जब तक हम खुदा को ज़ाहिर बज़ाहिर न देख ले उस पर तुम ् हें बिजली ने ले डाला , और तुम तकते ही रह गए

(src)="s2.56"> फिर तुम ् हारे निर ् जीव हो जाने के पश ् चात हमने तुम ् हें जिला उठाया , ताकि तुम कृतज ् ञता दिखलाओ
(trg)="s2.56"> फिर तुम ् हें तुम ् हारे मरने के बाद हमने जिला उठाया ताकि तुम शुक ् र करो

(src)="s2.57"> और हमने तुमपर बादलों की छाया की और तुमपर ' मन ् न ' और ' सलबा ' उतारा - " खाओ , जो अच ् छी पाक चीजें हमने तुम ् हें प ् रदान की है । " उन ् होंने हमारा तो कुछ भी नहीं बिगाड ़ ा , बल ् कि वे अपने ही ऊपर अत ् याचार करते रहे
(trg)="s2.57"> और हमने तुम पर अब ् र का साया किया और तुम पर मन व सलवा उतारा और ( ये भी तो कह दिया था कि ) जो सुथरी व नफीस रोज़िया तुम ् हें दी हैं उन ् हें शौक़ से खाओ , और उन लोगों ने हमारा तो कुछ बिगड़ा नहीं मगर अपनी जानों पर सितम ढाते रहे

(src)="s2.58"> और जब हमने कहा था , " इस बस ् ती में प ् रवेश करो फिर उसमें से जहाँ से चाहो जी भर खाओ , और बस ् ती के द ् वार में सजदागुज ़ ार बनकर प ् रवेश करो और कहो , " छूट हैं । " हम तुम ् हारी खताओं को क ् षमा कर देंगे और अच ् छे से अच ् छा काम करनेवालों पर हम और अधिक अनुग ् रह करेंगे । "
(trg)="s2.58"> और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब हमने तुमसे कहा कि इस गाँव ( अरीहा ) में जाओ और इसमें जहाँ चाहो फराग़त से खाओ ( पियो ) और दरवाज़े पर सजदा करते हुए और ज़बान से हित ् ता बख ् शिश कहते हुए आओ तो हम तुम ् हारी ख़ता ये बख ् श देगे और हम नेकी करने वालों की नेकी ( सवाब ) बढ़ा देगें

(src)="s2.59"> फिर जो बात उनसे कहीं गई थी ज ़ ालिमों ने उसे दूसरी बात से बदल दिया । अन ् ततः ज ़ ालिमों पर हमने , जो अवज ् ञा वे कर रहे थे उसके कारण , आकाश से यातना उतारी
(trg)="s2.59"> तो जो बात उनसे कही गई थी उसे शरीरों ने बदलकर दूसरी बात कहनी शुरू कर दी तब हमने उन लोगों पर जिन ् होंने शरारत की थी उनकी बदकारी की वजह से आसमानी बला नाज़िल की

(src)="s2.60"> और याद करो जब मूसा ने अपनी क ़ ौम के लिए पानी की प ् रार ् थना को तो हमने कहा , " चट ् टान पर अपनी लाठी मारो , " तो उससे बारह स ् रोत फूट निकले और हर गिरोह ने अपना-अपना घाट जान लिया - " खाओ और पियो अल ् लाह का दिया और धरती में बिगाड ़ फैलाते न फिरो । "
(trg)="s2.60"> और ( वह वक ् त भी याद करो ) जब मूसा ने अपनी क़ौम के लिए पानी माँगा तो हमने कहा ( ऐ मूसा ) अपनी लाठी पत ् थर पर मारो ( लाठी मारते ही ) उसमें से बारह चश ् में फूट निकले और सब लोगों ने अपना-अपना घाट बखूबी जान लिया और हमने आम इजाज़त दे दी कि खुदा की दी हुईरोज़ी से खाओ पियो और मुल ् क में फसाद न करते फिरो

(src)="s2.61"> और याद करो जब तुमने कहा था , " ऐ मूसा , हम एक ही प ् रकार के खाने पर कदापि संतोष नहीं कर सकते , अतः हमारे लिए अपने रब से प ् रार ् थना करो कि हमारे वास ् ते धरती की उपज से साग-पात और ककड ़ ियाँ और लहसुन और मसूर और प ् याज ़ निकाले । " और मूसा ने कहा , " क ् या तुम जो घटिया चीज ़ है उसको उससे बदलकर लेना चाहते हो जो उत ् तम है ? किसी नगर में उतरो , फिर जो कुछ तुमने माँगा हैं , तुम ् हें मिल जाएगा " - और उनपर अपमान और हीन दशा थोप दी गई , और अल ् लाह के प ् रकोप के भागी हुए । यह इसलिए कि वे अल ् लाह की आयतों का इनकार करते रहे और नबियों की अकारण हत ् या करते थे । यह इसलिए कि उन ् होंने अवज ् ञा की और वे सीमा का उल ् लंघन करते रहे
(trg)="s2.61"> ( और वह वक ् त भी याद करो ) जब तुमने मूसा से कहा कि ऐ मूसा हमसे एक ही खाने पर न रहा जाएगा तो आप हमारे लिए अपने परवरदिगार से दुआ कीजिए कि जो चीज़े ज़मीन से उगती है जैसे साग पात तरकारी और ककड़ी और गेहूँ या ( लहसुन ) और मसूर और प ् याज़ ( मन व सलवा ) की जगह पैदा करें ( मूसा ने ) कहा क ् या तुम ऐसी चीज़ को जो हर तरह से बेहतर है अदना चीज़ से बदलन चाहते हो तो किसी शहर में उतर पड़ो फिर तुम ् हारे लिए जो तुमने माँगा है सब मौजूद है और उन पर रूसवाई और मोहताजी की मार पड़ी और उन लोगों ने क़हरे खुदा की तरफ पलटा खाया , ये सब इस सबब से हुआ कि वह लोग खुदा की निशानियों से इन ् कार करते थे और पैग़म ् बरों को नाहक शहीद करते थे , और इस वजह से ( भी ) कि वह नाफ़रमानी और सरकशी किया करते थे

(src)="s2.62"> निस ् संदेह , ईमानवाले और जो यहूदी हुए और ईसाई और साबिई , जो भी अल ् लाह और अन ् तिम दिन पर ईमान लाया और अच ् छा कर ् म किया तो ऐसे लोगों का उनके अपने रब के पास ( अच ् छा ) बदला है , उनको न तो कोई भय होगा और न वे शोकाकुल होंगे -
(trg)="s2.62"> बेशक मुसलमानों और यहूदियों और नसरानियों और ला मज़हबों में से जो कोई खुदा और रोज़े आख़िरत पर ईमान लाए और अच ् छे-अच ् छे काम करता रहे तो उन ् हीं के लिए उनका अज ् र व सवाब उनके खुदा के पास है और न ( क़यामत में ) उन पर किसी का ख़ौफ होगा न वह रंजीदा दिल होंगे

(src)="s2.63"> और याद करो जब हमने इस हाल में कि तूर पर ् वत को तुम ् हारे ऊपर ऊँचा कर रखा था , तुमसे दृढ ़ वचन लिया था , " जो चीज ़ हमने तुम ् हें दी हैं उसे मजबूती के साथ पकड ़ ो और जो कुछ उसमें हैं उसे याद रखो ताकि तुम बच सको । "
(trg)="s2.63"> और ( वह वक ् त याद करो ) जब हमने ( तामीले तौरेत ) का तुमसे एक़रार कर लिया और हमने तुम ् हारे सर पर तूर से ( पहाड़ को ) लाकर लटकाया और कह दिया कि तौरेत जो हमने तुमको दी है उसको मज़बूत पकड़े रहो और जो कुछ उसमें है उसको याद रखो

(src)="s2.64"> फिर इसके पश ् चात भी तुम फिर गए , तो यदि अल ् लाह की कृपा और उसकी दयालुता तुम पर न होती , तो तुम घाटे में पड ़ गए होते
(trg)="s2.64"> ताकि तुम परहेज़गार बनो फिर उसके बाद तुम ( अपने एहदो पैमान से ) फिर गए पस अगर तुम पर खुदा का फज़ल और उसकी मेहरबानी न होती तो तुमने सख ् त घाटा उठाया होता

(src)="s2.65"> और तुम उन लोगों के विषय में तो जानते ही हो जिन ् होंने तुममें से ' सब ् त ' के दिन के मामले में मर ् यादा का उल ् लंघन किया था , तो हमने उनसे कह दिया , " बन ् दर हो जाओ , धिक ् कारे और फिटकारे हुए ! "
(trg)="s2.65"> और अपनी क़ौम से उन लोगों की हालत तो तुम बखूबी जानते हो जो शम ् बे ( सनीचर ) के दिन अपनी हद से गुज़र गए ( कि बावजूद मुमानिअत शिकार खेलने निकले ) तो हमने उन से कहा कि तुम राइन ् दे गए बन ् दर बन जाओ ( और वह बन ् दर हो गए )

(src)="s2.66"> फिर हमने इसे सामनेवालों और बाद के लोगों के लिए शिक ् षा-सामग ् री और डर रखनेवालों के लिए नसीहत बनाकर छोड ़ ा
(trg)="s2.66"> पस हमने इस वाक़ये से उन लोगों के वास ् ते जिन के सामने हुआ था और जो उसके बाद आनेवाले थे अज़ाब क़रार दिया , और परहेज़गारों के लिए नसीहत

(src)="s2.67"> और याद करो जब मूसा ने अपनी क ़ ौम से कहा , " निश ् चय ही अल ् लाह तुम ् हें आदेश देता है कि एक गाय जब ् ह करो । " कहने लगे , " क ् या तुम हमसे परिहास करते हो ? " उसने कहा , " मैं इससे अल ् लाह की पनाह माँगता हूँ कि जाहिल बनूँ । "
(trg)="s2.67"> और ( वह वक ् त याद करो ) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि खुदा तुम लोगों को ताकीदी हुक ् म करता है कि तुम एक गाय ज़िबाह करो वह लोग कहने लगे क ् या तुम हमसे दिल ् लगी करते हो मूसा ने कहा मैं खुदा से पनाह माँगता हूँ कि मैं जाहिल बनूँ

(src)="s2.68"> बोले , " हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हम पर स ् पष ् टा कर दे कि वह गाय कौन-सी है ? " उसने कहा , " वह कहता है कि वह ऐसी गाय है जो न बूढ ़ ी है , न बछिया , इनके बीच की रास है ; तो जो तुम ् हें हुक ् म दिया जा रहा है , करो । "
(trg)="s2.68"> ( तब वह लोग कहने लगे कि ( अच ् छा ) तुम अपने खुदा से दुआ करो कि हमें बता दे कि वह गाय कैसी हो मूसा ने कहा बेशक खुदा ने फरमाता है कि वह गाय न तो बहुत बूढ़ी हो और न बछिया बल ् कि उनमें से औसत दरजे की हो , ग़रज़ जो तुमको हुक ् म दिया गया उसको बजा लाओ

(src)="s2.69"> कहने लगे , " हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि उसका रंग कैसा है ? " कहा , " वह कहता है कि वह गाय सुनहरी है , गहरे चटकीले रंग की कि देखनेवालों को प ् रसन ् न कर देती है । "
(trg)="s2.69"> वह कहने लगे ( वाह ) तुम अपने खुदा से दुआ करो कि हमें ये बता दे कि उसका रंग आख़िर क ् या हो मूसा ने कहा बेशक खुदा फरमाता है कि वह गाय खूब गहरे ज़र ् द रंग की हो देखने वाले उसे देखकर खुश हो जाए

(src)="s2.70"> बोले , " हमारे लिए अपने रब से निवेदन करो कि वह हमें बता दे कि वह कौन-सी है , गायों का निर ् धारण हमारे लिए संदिग ् ध हो रहा है । यदि अल ् लाह ने चाहा तो हम अवश ् य । पता लगा लेंगे । "
(trg)="s2.70"> तब कहने लगे कि तुम अपने खुदा से दुआ करो कि हमें ज़रा ये तो बता दे कि वह ( गाय ) और कैसी हो ( वह ) गाय तो और गायों में मिल जुल गई और खुदा ने चाहा तो हम ज़रूर ( उसका ) पता लगा लेगे

(src)="s2.71"> उसने कहा , " वह कहता हैं कि वह ऐसा गाय है जो सधाई हुई नहीं है कि भूमि जोतती हो , और न वह खेत को पानी देती है , ठीक-ठाक है , उसमें किसी दूसरे रंग की मिलावट नहीं है । " बोले , " अब तुमने ठीक बात बताई है । " फिर उन ् होंने उसे ज ़ ब ् ह किया , जबकि वे करना नहीं चाहते थे
(trg)="s2.71"> मूसा ने कहा खुदा ज़रूर फरमाता है कि वह गाय न तो इतनी सधाई हो कि ज़मीन जोते न खेती सीचें भली चंगी एक रंग की कि उसमें कोई धब ् बा तक न हो , वह बोले अब ( जा के ) ठीक-ठीक बयान किया , ग़रज़ उन लोगों ने वह गाय हलाल की हालाँकि उनसे उम ् मीद न थी वह कि वह ऐसा करेंगे

(src)="s2.72"> और याद करो जब तुमने एक व ् यक ् ति की हत ् या कर दी , फिर उस सिलसिले में तुमने टाल-मटोल से काम लिया - जबकि जिसको तुम छिपा रहे थे , अल ् लाह उसे खोल देनेवाला था
(trg)="s2.72"> और जब एक शख ् स को मार डाला और तुममें उसकी बाबत फूट पड़ गई एक दूसरे को क़ातिल बताने लगा जो तुम छिपाते थे

(src)="s2.73"> तो हमने कहा , " उसे उसके एक हिस ् से से मारो । " इस प ् रकार अल ् लाह मुर ् दों को जीवित करता है और तुम ् हें अपनी निशानियाँ दिखाता है , ताकि तुम समझो
(trg)="s2.73"> खुदा को उसका ज़ाहिर करना मंजूर था पस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस ( की लाश ) पर मारो यूँ खुदा मुर ् दे को ज़िन ् दा करता है और तुम को अपनी कुदरत की निशानियाँ दिखा देता है

(src)="s2.74"> फिर इसके पश ् चात भी तुम ् हारे दिल कठोर हो गए , तो वे पत ् थरों की तरह हो गए बल ् कि उनसे भी अधिक कठोर ; क ् योंकि कुछ पत ् थर ऐसे भी होते है जिनसे नहरें फूट निकलती है , और कुछ ऐसे भी होते है कि फट जाते है तो उनमें से पानी निकलने लगता है , और उनमें से कुछ ऐसे भी होते है जो अल ् लाह के भय से गिर जाते है । और अल ् लाह , जो कुछ तुम कर रहे हो , उससे बेखबर नहीं है
(trg)="s2.74"> ताकि तुम समझो फिर उसके बाद तुम ् हारे दिल सख ् त हो गये पस वह मिसल पत ् थर के ( सख ् त ) थे या उससे भी ज ् यादा करख ् त क ् योंकि पत ् थरों में बाज़ तो ऐसे होते हैं कि उनसे नहरें जारी हो जाती हैं और बाज़ ऐसे होते हैं कि उनमें दरार पड़ जाती है और उनमें से पानी निकल पड़ता है और बाज़ पत ् थर तो ऐसे होते हैं कि खुदा के ख़ौफ से गिर पड़ते हैं और जो कुछ तुम कर रहे हो उससे खुदा ग़ाफिल नहीं है

(src)="s2.75"> तो क ् या तुम इस लालच में हो कि वे तुम ् हारी बात मान लेंगे , जबकि उनमें से कुछ लोग अल ् लाह का कलाम सुनते रहे हैं , फिर उसे भली-भाँति समझ लेने के पश ् चात जान-बूझकर उसमें परिवर ् तन करते रहे ?
(trg)="s2.75"> ( मुसलमानों ) क ् या तुम ये लालच रखते हो कि वह तुम ् हारा ( सा ) ईमान लाएँगें हालाँकि उनमें का एक गिरोह ( साबिक़ में ) ऐसा था कि खुदा का कलाम सुनाता था और अच ् छी तरह समझने के बाद उलट फेर कर देता था हालाँकि वह खूब जानते थे और जब उन लोगों से मुलाक़ात करते हैं

(src)="s2.76"> और जब वे ईमान लानेवाले से मिलते है तो कहते हैं , " हम भी ईमान रखते हैं " , और जब आपस में एक-दूसरे से एकान ् त में मिलते है तो कहते है , " क ् या तुम उन ् हें वे बातें , जो अल ् लाह ने तुम पर खोली , बता देते हो कि वे उनके द ् वारा तुम ् हारे रब के यहाँ हुज ् जत में तुम ् हारा मुक ़ ाबिला करें ? तो क ् या तुम समझते नहीं ! "
(trg)="s2.76"> जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो ईमान ला चुके और जब उनसे बाज़-बाज़ के साथ तख़िलया करते हैं तो कहते हैं कि जो कुछ खुदा ने तुम पर ( तौरेत ) में ज़ाहिर कर दिया है क ् या तुम ( मुसलमानों को ) बता दोगे ताकि उसके सबब से कल तुम ् हारे खुदा के पास तुम पर हुज ् जत लाएँ क ् या तुम इतना भी नहीं समझते

(src)="s2.77"> क ् या वे जानते नहीं कि अल ् लाह वह सब कुछ जानता है , जो कुछ वे छिपाते और जो कुछ ज ़ ाहिर करते हैं ?
(trg)="s2.77"> लेकिन क ् या वह लोग ( इतना भी ) नहीं जानते कि वह लोग जो कुछ छिपाते हैं या ज़ाहिर करते हैं खुदा सब कुछ जानता है

(src)="s2.78"> और उनमें सामान ् य बेपढ ़ े भी हैं जिन ् हें किताब का ज ् ञान नहीं है , बस कुछ कामनाओं एवं आशाओं को धर ् म जानते हैं , और वे तो बस अटकल से काम लेते हैं
(trg)="s2.78"> और कुछ उनमें से ऐसे अनपढ़ हैं कि वह किताबे खुदा को अपने मतलब की बातों के सिवा कुछ नहीं समझते और वह फक़त ख ् याली बातें किया करते हैं ,

(src)="s2.79"> तो विनाश और तबाही है उन लोगों के लिए जो अपने हाथों से किताब लिखते हैं फिर कहते हैं , " यह अल ् लाह की ओर से है " , ताकि उसके द ् वारा थोड ़ ा मूल ् य प ् राप ् त कर लें । तो तबाही है उनके हाथों ने लिखा और तबाही है उनके लिए उसके कारण जो वे कमा रहे हैं
(trg)="s2.79"> पस वाए हो उन लोगों पर जो अपने हाथ से किताब लिखते हैं फिर ( लोगों से कहते फिरते ) हैं कि ये खुदा के यहाँ से ( आई ) है ताकि उसके ज़रिये से थोड़ी सी क़ीमत ( दुनयावी फ़ायदा ) हासिल करें पस अफसोस है उन पर कि उनके हाथों ने लिखा और फिर अफसोस है उनपर कि वह ऐसी कमाई करते हैं

(src)="s2.80"> वे कहते है , " जहन ् नम की आग हमें नहीं छू सकती , हाँ , कुछ गिने-चुने दिनों की बात और है । " कहो , " क ् या तुमने अल ् लाह से कोई वचन ले रखा है ? फिर तो अल ् लाह कदापि अपने वचन के विरुद ् ध नहीं जा सकता ? या तुम अल ् लाह के ज ़ िम ् मे डालकर ऐसी बात कहते हो जिसका तुम ् हें ज ् ञान नहीं ?
(trg)="s2.80"> और कहते हैं कि गिनती के चन ् द दिनों के सिवा हमें आग छुएगी भी तो नहीं ( ऐ रसूल ) इन लोगों से कहो कि क ् या तुमने खुदा से कोई इक़रार ले लिया है कि फिर वह किसी तरह अपने इक़रार के ख़िलाफ़ हरगिज़ न करेगा या बे समझे बूझे खुदा पर बोहताव जोड़ते हो

(src)="s2.81"> क ् यों नहीं ; जिसने भी कोई बदी कमाई और उसकी खताकारी ने उसे अपने घरे में ले लिया , तो ऐसे ही लोग आग ( जहन ् नम ) में पड ़ नेवाले है ; वे उसी में सदैव रहेंगे
(trg)="s2.81"> हाँ ( सच तो यह है ) कि जिसने बुराई हासिल की और उसके गुनाहों ने चारों तरफ से उसे घेर लिया है वही लोग तो दोज़ख़ी हैं और वही ( तो ) उसमें हमेशा रहेंगे

(src)="s2.82"> रहे वे लोग जो ईमान लाए और उन ् होंने अच ् छे कर ् म किए , वही जन ् नतवाले हैं , वे सदैव उसी में रहेंगे । "
(trg)="s2.82"> और जो लोग ईमानदार हैं और उन ् होंने अच ् छे काम किए हैं वही लोग जन ् नती हैं कि हमेशा जन ् नत में रहेंगे

(src)="s2.83"> और याद करो जब इसराईल की सन ् तान से हमने वचन लिया , " अल ् लाह के अतिरिक ् त किसी की बन ् दगी न करोगे ; और माँ-बाप के साथ और नातेदारों के साथ और अनाथों और मुहताजों के साथ अच ् छा व ् यवहार करोगे ; और यह कि लोगों से भली बात कहो और नमाज ़ क ़ ायम करो और ज ़ कात दो । " तो तुम फिर गए , बस तुममें से बचे थोड ़ े ही , और तुम उपेक ् षा की नीति ही अपनाए रहे
(trg)="s2.83"> और ( वह वक ् त याद करो ) जब हमने बनी ईसराइल से ( जो तुम ् हारे बुर ् जुग़ थे ) अहद व पैमान लिया था कि खुदा के सिवा किसी की इबादत न करना और माँ बाप और क़राबतदारों और यतीमों और मोहताजों के साथ अच ् छे सुलूक करना और लोगों के साथ अच ् छी तरह ( नरमी ) से बातें करना और बराबर नमाज़ पढ़ना और ज़कात देना फिर तुममें से थोड़े आदिमियों के सिवा ( सब के सब ) फिर गए और तुम लोग हो ही इक़रार से मुँह फेरने वाले

(src)="s2.84"> और याद करो जब तुमसे वचन लिया , " अपने ख ़ ून न बहाओगे और न अपने लोगों को अपनी बस ् तियों से निकालोगे । " फिर तुमने इक ़ रार किया और तुम स ् वयं इसके गवाह हो
(trg)="s2.84"> और ( वह वक ् त याद करो ) जब हमने तुम ( तुम ् हारे बुर ् ज़ुगों ) से अहद लिया था कि आपस में खूरेज़ियाँ न करना और न अपने लोगों को शहर बदर करना तो तुम ( तुम ् हारे बुर ् जुग़ों ) ने इक़रार किया था और तुम भी उसकी गवाही देते हो

(src)="s2.85"> फिर तुम वही हो कि अपने लोगों की हत ् या करते हो और अपने ही एक गिरोह के लोगों को उनकी बस ् तियों से निकालते हो ; तुम गुनाह और ज ़ ् यादती के साथ उनके विरुद ् ध एक-दूसरे के पृष ् ठपोषक बन जाते हो ; और यदि वे बन ् दी बनकर तुम ् हारे पास आते है , तो उनकी रिहाई के लिए फिद ् ए ( अर ् थदंड ) का लेन-देन करते हो जबकि उनको उनके घरों से निकालना ही तुम पर हराम था , तो क ् या तुम किताब के एक हिस ् से को मानते हो और एक को नहीं मानते ? फिर तुममें जो ऐसा करें उसका बदला इसके सिवा और क ् या हो सकता है कि सांसारिक जीवन में अपमान हो ? और क ़ यामत के दिन ऐसे लोगों को कठोर से कठोर यातना की ओर फेर दिया जाएगा । अल ् लाह उससे बेखबर नहीं है जो कुछ तुम कर रहे हो
(trg)="s2.85"> ( कि हाँ ऐसा हुआ था ) फिर वही लोग तो तुम हो कि आपस में एक दूसरे को क़त ् ल करते हो और अपनों से एक जत ् थे के नाहक़ और ज़बरदस ् ती हिमायती बनकर दूसरे को शहर बदर करते हो ( और लुत ् फ़ तो ये है कि ) अगर वही लोग क़ैदी बनकर तम ् हारे पास ( मदद माँगने ) आए तो उनको तावान देकर छुड़ा लेते हो हालाँकि उनका निकालना ही तुम पर हराम किया गया था तो फिर क ् या तुम ( किताबे खुदा की ) बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन ् कार करते हो पस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि ज़िन ् दगी भर की रूसवाई हो और ( आख़िरकार ) क़यामत के दिन सख ् त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो खुदा उससे ग़ाफ़िल नहीं है

(src)="s2.86"> यही वे लोग है जो आख ़ िरात के बदले सांसारिक जीवन के ख ़ रीदार हुए , तो न उनकी यातना हल ् की की जाएगी और न उन ् हें कोई सहायता पहुँच सकेगी
(trg)="s2.86"> यही वह लोग हैं जिन ् होंने आख़ेरत के बदले दुनिया की ज़िन ् दगी ख़रीद पस न उनके अज़ाब ही में तख ् फ़ीफ़ ( कमी ) की जाएगी और न वह लोग किसी तरह की मदद दिए जाएँगे

(src)="s2.87"> और हमने मूसा को किताब दी थी , और उसके पश ् चात आगे-पीछे निरन ् तर रसूल भेजते रहे ; और मरयम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियाँ प ् रदान की और पवित ् र-आत ् मा के द ् वारा उसे शक ् ति प ् रदान की ; तो यही तो हुआ कि जब भी कोई रसूल तुम ् हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम ् हारे जी को पसन ् द न था , तो तुम अकड ़ बैठे , तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को क ़ त ् ल करते हो ?
(trg)="s2.87"> और ये हक़ीक़ी बात है कि हमने मूसा को किताब ( तौरेत ) दी और उनके बाद बहुत से पैग़म ् बरों को उनके क़दम ब क़दम ले चलें और मरियम के बेटे ईसा को ( भी बहुत से ) वाजेए व रौशन मौजिजे दिए और पाक रूह जिबरील के ज़रिये से उनकी मदद की क ् या तुम उस क़दर बददिमाग़ हो गए हो कि जब कोई पैग़म ् बर तुम ् हारे पास तुम ् हारी ख ् वाहिशे नफ़सानी के ख़िलाफ कोई हुक ् म लेकर आया तो तुम अकड़ बैठे फिर तुमने बाज़ पैग़म ् बरों को तो झुठलाया और बाज़ को जान से मार डाला

(src)="s2.88"> वे कहते हैं , " हमारे दिलों पर तो प ् राकृतिक आवरण चढ ़ े है " नहीं , बल ् कि उनके इनकार के कारण अल ् लाह ने उनपर लानत की है ; अतः वे ईमान थोड ़ े ही लाएँगे
(trg)="s2.88"> और कहने लगे कि हमारे दिलों पर ग़िलाफ चढ़ा हुआ है ( ऐसा नहीं ) बल ् कि उनके कुफ ् र की वजह से खुदा ने उनपर लानत की है पस कम ही लोग ईमान लाते हैं

(src)="s2.89"> और जब उनके पास एक किताब अल ् लाह की ओर से आई है जो उसकी पुष ् टि करती है जो उनके पास मौजूद है - और इससे पहले तो वे न माननेवाले लोगों पर विजय पाने के इच ् छुक रहे है - फिर जब वह चीज ़ उनके पास आ गई जिसे वे पहचान भी गए हैं , तो उसका इनकार कर बैठे ; तो अल ् लाह की फिटकार इनकार करने वालों पर !
(trg)="s2.89"> और जब उनके पास खुदा की तरफ़ से किताब ( कुरान आई और वह उस किताब तौरेत ) की जो उन के पास तसदीक़ भी करती है । और उससे पहले ( इसकी उम ् मीद पर ) काफ़िरों पर फतेहयाब होने की दुआएँ माँगते थे पस जब उनके पास वह चीज़ जिसे पहचानते थे आ गई तो लगे इन ् कार करने पस काफ़िरों पर खुदा की लानत है

(src)="s2.90"> क ् या ही बुरी चीज ़ है जिसके बदले उन ् होंने अपनी जानों का सौदा किया , अर ् थात जो कुछ अल ् लाह ने उतारा है उसे सरकशी और इस अप ् रियता के कारण नहीं मानते कि अल ् लाह अपना फ ़ ज ़ ् ल ( कृपा ) अपने बन ् दों में से जिसपर चाहता है क ् यों उतारता है , अतः वे प ् रकोप पर प ् रकोप के अधिकारी हो गए है । और ऐसे इनकार करनेवालों के लिए अपमानजनक यातना है
(trg)="s2.90"> क ् या ही बुरा है वह काम जिसके मुक़ाबले में ( इतनी बात पर ) वह लोग अपनी जानें बेच बैठे हैं कि खुदा अपने बन ् दों से जिस पर चाहे अपनी इनायत से किताब नाज़िल किया करे इस रश ् क से जो कुछ खुदा ने नाज़िल किया है सबका इन ् कार कर बैठे पस उन पर ग़ज़ब पर ग़ज़ब टूट पड़ा और काफ़िरों के लिए ( बड़ी ) रूसवाई का अज़ाब है

(src)="s2.91"> जब उनसे कहा जाता है , " अल ् लाह ने जो कुछ उतारा है उस पर ईमान लाओ " , तो कहते है , " हम तो उसपर ईमान रखते है जो हम पर उतरा है , " और उसे मानने से इनकार करते हैं जो उसके पीछे है , जबकि वही सत ् य है , उसकी पुष ् टि करता है जो उसके पास है । कहो , " अच ् छा तो इससे पहले अल ् लाह के पैग ़ म ् बरों की हत ् या क ् यों करते रहे हो , यदि तुम ईमानवाले हो ? "
(trg)="s2.91"> और जब उनसे कहा गया कि ( जो क़ुरान ) खुदा ने नाज़िल किया है उस पर ईमान लाओ तो कहने लगे कि हम तो उसी किताब ( तौरेत ) पर ईमान लाए हैं जो हम पर नाज़िल की गई थी और उस किताब ( कुरान ) को जो उसके बाद आई है नहीं मानते हैं हालाँकि वह ( क़ुरान ) हक़ है और उस किताब ( तौरेत ) की जो उनके पास है तसदीक़ भी करती है मगर उस किताब कुरान का जो उसके बाद आई है इन ् कार करते हैं ( ऐ रसूल ) उनसे ये तो पूछो कि तुम ( तुम ् हारे बुर ् जुग़ ) अगर ईमानदार थे तो फिर क ् यों खुदा के पैग़म ् बरों का साबिक़ क़त ् ल करते थे

(src)="s2.92"> तुम ् हारे पास मूसा खुली-खुली निशानियाँ लेकर आया , फिर भी उसके बाद तुम ज ़ ालिम बनकर बछड ़ े को देवता बना बैठे
(trg)="s2.92"> और तुम ् हारे पास मूसा तो वाज़ेए व रौशन मौजिज़े लेकर आ ही चुके थे फिर भी तुमने उनके बाद बछड़े को खुदा बना ही लिया और उससे तुम अपने ही ऊपर ज़ुल ् म करने वाले थे

(src)="s2.93"> कहो , " यदि अल ् लाह के निकट आख ़ िरत का घर सारे इनसानों को छोड ़ कर केवल तुम ् हारे ही लिए है , फिर तो मृत ् यु की कामना करो , यदि तुम सच ् चे हो । "
(trg)="s2.93"> और ( वह वक ् त याद करो ) जब हमने तुमसे अहद लिया और ( क़ोहे ) तूर को ( तुम ् हारी उदूले हुक ् मी से ) तुम ् हारे सर पर लटकाया और ( हमने कहा कि ये किताब तौरेत ) जो हमने दी है मज़बूती से लिए रहो और ( जो कुछ उसमें है ) सुनो तो कहने लगे सुना तो ( सही लेकिन ) हम इसको मानते नहीं और उनकी बेईमानी की वजह से ( गोया ) बछड़े की उलफ़त घोल के उनके दिलों में पिला दी गई ( ऐ रसूल ) उन लोगों से कह दो कि अगर तुम ईमानदार थे तो तुमको तुम ् हारा ईमान क ् या ही बुरा हुक ् म करता था