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(src)="1"> अब गुना के किसी भी सवाल को हल करने के लिए हमारे पास सारे तरीके है इस वीडियो में मैं बस आपको बहुत से उधारण दिखाऊंगा तो आओ शुरू करे -- और मैने पीले में शुरू करूँगा आओ 32 गुना 18 से शुरू करे 8 गुना 2 होता है 16 . अब मैं ये सब अपने दिमाग़ में करूँगा क्योंकि हुमारे पास इतना स्पेस नही होता ये करने करने के लिए तो 8 गुना 2 होता है 16 1 को यहाँ रखो 8 गुना 3 होता है 24 .
(trg)="1"> aata aaplya kade general tools aahet konchyahi gunakar la sodaunya sathi

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(src)="1"> किसान ने ५३१ टमाटर उगाये और १७६ टमाटर बेचे तीन दिन में
(trg)="1"> एक शेतकरी ५३१ टमाटे उगवतो ,
(trg)="2"> तीन दिवसात .

(src)="2"> यह देखते हुए की १७६ टमाटर की आपूर्ति कम हो गयी है किसान के पास अब कितने टमाटर बचे है ? तिन दिन के बाद ? शुरुआत में उस के पास ५३१ टमाटर थे में खुद को यहाँ पर थोड़ी सी और जगहे देता हूँ काम करने के लिए
(trg)="3"> आता ज़र सांगितले असेल कि टमाटान ची आवक १७६ नि कमी तर माग किती तोमतो राहिले तेच्या कडे तीन दिवसा नंतर तर आता तो सुरु करतो ५३१ टमाटान बरोबर

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(src)="1"> ( सारंगी संगीत )
(trg)="1"> ( सारंगी संगीत )

(src)="2"> ( संगीत समाप्ति )
(trg)="2"> ( संगीत समाप्ति )

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(src)="1"> सुप्रभात आज मैं यहाँ कहना आया हूँ स्वयं संचालित उड्नेवाली बीच बाल्स के बारे में| नहीं , एक चुस्त हवाई रोबोट , इसके जैसा| मैं आपको इससे बनाने की चुनौतियों के बारे में थोड़ा बताना चाहते हूँ| और कुछ दिल दहलानेवाले सुयोग इस तकनीक को लागू करने के लिए| तो यह रोबोट बिना आदमी के एरिअल वाहनों से सम्बंधित है| हालांकि , वाहन जो आप यहाँ देख रहे है , वह बड़े हैं| उनका वज़न हजारो पाउंड है , और किसी भी तरह से चुस्त नहीं है| वे स्वयं संचालित भी नहीं है| वास्तव में , कई ऐसे वाहने उड़ान के कर्मचारियों द्वारा संचालित किये जाते है जिनमे कई सारे विमान - चालक शामिल हो सकते है , जैसे की सेंसर के ऑपरेटर और मिशन समन्वयकों| हम इस तरह का रोबोट की विकसित करने में रुचि रखते हैं -- यहाँ है दो तस्वीरे -- उन रोबोट्स की जो आप खरीद सकते है| ये है हेलीकाप्टर चार घूर्णक वाले और वे अंदाज़ से एक मीटर के माप के है और कई पाउंड वजन है| और इसलिए हम इनको सेंसर और प्रोसेसर से फिट करते है , ताकि यह रोबोट्स अन्दर भी उड्ड सकते है
(trg)="1"> शुभ प्रभात . आज मी इकडे आलोय ते स्वयंचलित , उडणाऱ्या चेंडूंविषयी बोलायला . नाही- नाही , ह्या अशा चपळ , हवेत उडणाऱ्या यंत्र मानवांविषयी बोलायला . मला तुम्हाला सांगायचंय , थोडंसं हे बनवताना आलेल्या अडचणींबद्दल आणि काही जबरदस्त संधींबद्दल ह्या तंत्रज्ञानाच्या वापरासंदर्भात . तर , हे यंत्रमानव मनुष्य- विरहित यानांशी निगडीत आहेत . परंतु , इथे दिसणारी याने बरीच मोठी असतात . ती हजारो पाउंड वजनाची असतात , ती कुठल्याही अर्थी चपळ नसतात . इतकेच काय , ती स्वयंचलितदेखिल नसतात . खरं तर , ह्यापैकी बरीच याने चालवली जातात फ्लाइट- क्र्यू कडून , ज्यात असतात अनेक वैमानिक , सेन्सर्स ( नियंत्रित करणारे ) तंत्रज्ञ आणि मिशन को- ऑर्डिनेटर्स . आम्हाला कशात रस असेल तर तो असे यंत्रमानव बनविण्यात होता -- आणि ही इतर दोन चित्रे आहेत -- तयार , विकत मिळणार्‍या यंत्रमानवांची . तर ही अशी चार पंखांची हेलीकॉप्टर्स आहेत आणि त्यांचे माप अंदाजे एक मीटरभर लांब आहे आणि वजन आहे काही पाउंड्स . आणि असे आम्ही काही सेन्सर्स व प्रोसेसर्स बसविले आहेत , आणि हे रोबो घरातल्या घरात उडू शकतात जीपीएस शिवाय . हे यंत्र जे मी हातात धरलं आहे ते हे आहे , आणि ते बनवलंय दोन विद्यार्थ्यांनी , अ‍ॅलेक्स आणि डॅनियल . तर ह्याचं वजन थोडंसं अधिक आहे एक दशांश पाउंडपेक्षा . त्याला १५ वॅट इतकी उर्जा लागते . आणि जसं तुम्ही बघू शकता , ह्याचा व्यास सुमारे आठ इंच आहे . तर मी तुम्हाला पटकन एक प्रात्यक्षिक दाखवतो हे रोबो कसे चालतात त्याचं . तर ह्याला चार पंखे आहेत . हे सगळे पंखे एकाच वेगाने फिरवले , तर हा रोबो तरंगतो . ह्यातल्या प्रत्येक पंख्याची गती जर वाढवली , तर हा रोबो उडतो , वरच्या दिशेने गतिमान होतो . अर्थात्‍ , ह्या रोबोला झुकवलं , थोडंसं आडवं करुन , तर तो ह्या दिशेने गतिमान होईल . तर ह्याला वळविण्यासाठी दोन पर्याय आहेत . ह्या चित्रात तुम्हाला दिसेल की चौथा पंखा जास्त वेगाने फिरतोय आणि दुसरा पंखा कमी वेगाने फिरतोय . आणि असं होतं तेव्हा त्या गतीमुळे हा रोबो कलंडतो . आणि याउलट , तुम्ही तिसऱ्या पंख्याची गती वाढविली आणि पहिल्या पंख्याची गती कमी केली , तर हा पुढे सरकतो . आणि सगळ्यात शेवटी , तुम्ही परस्परविरुद्ध पंख्यांच्या जोड्या फिरवल्या दुसऱ्या जोडीपेक्षा अधिक वेगाने , तर रोबो उभ्या अक्षाभोवती गिरकी घेतो . तर ह्यात बसविलेला प्रोसेसर खरंतर लक्ष ठेवतो , कुठल्या हालचालींची गरज आहे ह्यावर आणि त्यांचा मेळ घालतो आणि पंख्यांच्या मोटारींना काय आज्ञा द्यायच्या ते ठरवतो सेकंदाला सहाशे वेळा ह्या वेगाने . तर अशा पद्धतीने ही वस्तू चालते . तर ह्या डिझाईनचा एक महत्वाचा फायदा म्हणजे , तुम्ही ह्याचा आकार लहान करत गेलात , तर हा रोबो नैसर्गिकरीत्याच चपळ बनतो . तर इथे ´आर´ ही आहे ह्या रोबोची मुलभूत लांबी . ती खरं बघता ( पंख्याच्या ) व्यासाच्या अर्धी आहे . आणि अश्या बऱ्याच भौतिक बाबी बदलतात

(src)="2"> GPS के बिना| यह रोबोट जो मैंने हाथ में पकड़ा है यह है , इसको दो छात्रों ने बनाया है , आलेक्स और डानिएल| इसके वज़न एक पाउंड से दस गुना कम है| यह १५ वाट पॉवर का इस्तमाल करता है| जैसे की आप देख सकते है , इसका व्यास ८ इंच है| में आपको जल्दी से जानकारी देता हूँ यह रोबोट्स कैसे चलते है| इसके चार घूर्णक है| यदि आप एक ही रफ्तार से इन घूर्णकको घुमाएंगे , रोबोट होवर करता है| यदि आप हर एक घूर्णक की गति बढ़ाएंगे , तोह वोह ऊपर उड़ेगा , तेज़ी से और ऊपर उड़ेगा ज़रूर , यदि वह रोबोट झुका हुआ होता , क्षैतिज की ओर झुका हुआ , तोह वह इस दिशा में तेज़ी से उड़ेगा| तो उसको झुकाने के लिए , दो तरीके है| इस तस्वीर में आप देख सकते है की चौथा घूर्णक ज्यादा तेज़ी से घूम रहा है और दूसरा घूर्णक कम तेज़ी से घूम रहा है| और जब ऐसा होता है एक क्षण आता है जब रोबोट रोल करने लगता है| और दूसरी तरह से , यदि आप तीसरे घूर्णक की गति बढ़ाएंगे और पहले घूर्णक की गति घटाएंगे , तो वह रोबोट आगे उड़ेगा| और अंत में , यदि आप विपरीत जोड़ी वाले घूर्णकको को घुमाएंगे दूसरी जोड़ी से ज्यादा तेज़ , वह अनुलंब अक्ष की ओर झुकता है तो एक बोर्ड प्रोसेसर अनिवार्य रूप से देखता है किस प्रस्ताव की आवश्यकता है और इन प्रस्तावों को जोड़ता है और जान लेता है की घूर्णक को क्या सूचनाएं देनी हैं एक सेकंड में ६०० बार| मूल रूप में यह इस तरीके से चलता है| इस डिजाईन का एक फायदा है की , जब आप पैमाने पर नीचे उतरें तो वह रोबोट स्वाभाविक रूप से चुस्त हो जाता है| यहाँ R रोबोट की लम्बाई है| यह वास्तव में आधा व्यास है| और बहुत सारे भौतिक मापदंड हैं जो बदलते हैं जब R कम होता है| सबसे महत्वपूर्ण है जड़त्व या गति के लिए प्रतिरोध| तो यह पता चला है , यह जड़त्व , जो कोणीय गति को नियंत्रित करता है , १/ ५ R तक हो जाता है तो आप जितना कम R को बनाओगे उतनी अधिक गति से जड़ता कम हो जायेगी तो एक परिणाम के रूप में , कोणीय त्वरण , जो ग्रीक अक्षर अल्फ़ा द्वारा चिह्नित है , १/ R बन जाता है| यह R का विपरीतत आनुपातिक है| जितना कम आप उसे बनाओगे उतनी अधिक जल्दी से वह घूम सकता है| यह इन विडियो में साफ दिखाई देगा| दाईं ओर निचे आप एक रोबोट देख सकते है एक ३६० डिग्री फ्लिप प्रदर्शन कर रहा है एक आधे सेकंड से भी कम समय में| बहुत सारे फ्लिप्स , थोडा ज्यादा समय| तो यहाँ बोर्ड प्रोसेसर एक्सलेरोमेतेर्स से प्रतिक्रिया हो रही हैं और बोर्ड पर गय्रोस और गिनती करता है , जैसा पहले बताया था , आदेशों को ६०० बार एक सेकंड में रोबोट को संतुलित करने के लिए बाई ओर , आप देख रहे है Daniel रोबोट को ऊपर हवा में फैंक रहा है| इससे साबित होता है की यह बहुत मजबूत नियंत्रण है| आप जैसे भी फेके कोई फरक नहीं पड़ता , रोबोट वापिस आ जाता है| तो इस तरह के रोबोट को निर्माण क्यों करे ? ऐसे रोबोट्स के बहुत सरे अनुप्रयोग है| आप उनको ऐसे इमारतों के अन्दर भेज सकते है घुसपैठियों को पहले ढूँढने के लिए , या बिओचेमिकल रिसाव को ढूँढना , या गैसीय रिसाव| उनका उपयोग निर्माण जैसे अनुप्रयोगों के लिए भी इस्तमाल कर सकते है| ऐसे रोबोट्स है जो बीम , कोलुम्न्स उठा सकते है घन आकार जैसे संरचना को बना सकते है| मैं आपको इसके बारे में थोडा और बताऊंगा| यह रोबोट्स कार्गो को ट्रांसपोर्ट में मदद कर सकते है| यह रोबोट्स में एक छोटी समस्या है उनके पेलोड उठाने की क्षमता इसीलिए आपको कई सरे रोबोट्स की ज़रुरत पड़ेगी पेलोड को उठाने के लिए| यह तस्वीर हमारे एक नये प्रयोग की है -- वास्तव में इतनी नयी नहीं है --
(src)="3"> Sendai में की हुई भूकंप के कुछ ही समय बाद| इस प्रकार के रोबोट्स टूटी हुई इमारतों में भेजे जा सकते है प्राकृतिक आपदाओं के बाद नुकसान का आकलन करने के लिए , या प्रतिक्रियाशील इमारतों में विकिरण के स्तर को मैप करने के लिए| एक मौलिक समस्या है जो रोबोट को हल करना है यदि वेह स्वायत्त रह सकते है की अनिवार्य रूप से पता लगाना कैसे पॉइंट अ से पॉइंट बी तक पोहोच सकते है| अब यह चुनौतीपूर्ण हो जाता है क्योंकि इस रोबोट की गतिशीलता काफी जटिल हैं| वास्तव में , वे एक १२ - आयामी अंतरिक्ष में रहते हैं| तो हम एक छोटी सी चाल का उपयोग करेंगे| हम इस घुमावदार 12 आयामी अंतरिक्ष लेते है और परिणत करते है एक फ्लैट चार आयामी अंतरिक्ष में| और वह चार आयामी अंतरिक्ष में एक्स , वाई , ज़ेड और यओ अंगल है| यह रोबोट योजना करता है कम से कम प्रक्षेपवक्र का| आपको भौतिक विज्ञान याद दिलाने के लिए , आपके पास स्थिथि , व्युत्पन्न , गति है , फिर त्वरण , और फिर झटका और फिर काट है तो यह रोबोट काट को कम करता है| तो यह प्रभावी ढंग से एक निर्विघ्ऩ और सुंदर गति को पैदा करता है| और वह यह बाधाओं से बचते हुए करता है| यह कम से कम प्रक्षेपवक्र इन फ्लैट अंतरिक्ष में वापस बदल जाते हैं इस जटिल 12 आयामी अंतरिक्ष में| जो यह रोबोट को करना आवश्यक है नियंत्रण और निष्पादन के लिए| में आपको कुछ उदाहरण दिखाना चाहता हूँ यह कम से कम प्रक्षेपवक्र कैसे दिखते हैं इस पहले विडियो में , आप देखेंगे एक रोबोट पॉइंट अ से पॉइंट बी तक जाते हुए एक मध्यवर्ती पॉइंट के माध्यम से|
(trg)="2"> ' आर´ कमी करत जाल तशा . त्यातली सर्वांत महत्त्वाची एक म्हणजे जडत्व किंवा गती- विरोध . तर असं सिद्ध झालंय की , गतिरोध उर्जा , जी वर्तुळाकार गतीवर नियंत्रण ठेवते , ही ´आर´च्या पाचव्या घाताप्रमाणे बदलते . म्हणजे त्रिज्या जितकी लहान ठेवाल , तेवढ्याच नाट्यमयरित्या वस्तूचे जडत्व कमी होते . परिणामतः , त्याचा कोणीय प्रवेग , ज्याला इथं ग्रीक अक्षर ´अल्फा´ने संबोधलंय , तो बनतो एक भागिले ´आर ' . तो त्रिज्येशी ( आर ) व्यस्त प्रमाणात असतो . जितका लहान ´आर´ बनवाल , तितक्या चटकन्‌ तुम्ही वळवू शकता . ह्या व्हिडीओमधून हे स्पष्ट होईल . खालच्या उजव्या कोपर्‍यात तुम्हाला एक यंत्रमानव दिसेल ३६० अंशांची कोलांटी घेताना ते ही अर्ध्या सेकंदाच्या आत . बऱ्याच कोलांट्या , अगदी थोड्याश्या जास्त वेळात . तर इथे बोर्डवरचे प्रोसेसर्स माहिती मिळवतायत गतीमापकांकडून आणि बोर्डवरच्या गायरोकडून आणि आकडेमोड करतायत , मी आधी सांगितल्याप्रमाणं , ६०० सूचना प्रती सेकंद इतक्या वेगानं हा रोबो स्थिर करण्यासाठी . तर डावीकडे तुम्हाला दिसेल डॅनियल हा रोबो वर हवेत भिरकावताना . आणि इथं दिसून येईल त्याचं नियंत्रण किती पक्कं आहे . त्याला कसंही भिरकवलं तरी , तो रोबो स्वतःला सावरतो आणि त्याच्याकडे परत येतो . तर हे असे रोबो बनविण्याची काय गरज आहे ? खरं तर अशा रोबोंचे बरेच उपयोग आहेत . तुम्ही त्यांना अश्या इमारतींच्या आत पाठवू शकता प्राथमिक टेहळणी करायला , घुसखोरांची , किंवा जैविक रसायनांच्या गळतीचा शोध घ्यायला , वायूंच्या गळतीचा . तुम्ही त्यांचा वापर करु शकता बांधकामांसारख्या क्षेत्रातही . तर हे आहेत रोबो , बीम , कॉलम वाहून नेणारे आणि घनाकृती वास्तू बांधणारे . मी तुम्हाला ह्याबद्दल थोडी अधिक माहिती देतो . हे रोबो अवजड सामान वाहून नेण्याकरिता देखील वापरता येऊ शकतात . पण ह्या लहान यंत्रमानवांच्या अडचणींपैकी एक म्हणजे त्यांची वजन वाहण्याची क्षमता . तर तुम्हाला अनेक रोबो लागतील अवजड सामान वाहण्यासाठी . हे चित्र आहे आम्ही अलिकडेच केलेल्या एका प्रयोगाचे -- खरंतर आता अगदीच अलिकडचा नाही म्हणता येणार -- सेन्दाए मध्ये भूकंपानंतर लगेचच केलेला . तर हे असे यंत्रमानव ढासळलेल्या इमारतींमध्ये पाठवता येतात नैसर्गिक आपत्तीनंतर किती हानी झाली आहे ते तपासायला , किंवा आण्विक इमारतींमध्ये सोडता येतात किरणोत्सर्गाची पातळी मोजायला . तर एक मूलभूत समस्या जी ह्या यंत्रमानवांना सोडवावी लागते , स्वनियंत्रित बनण्यासाठी , ती म्हणजे , शोधून काढणं एका बिंदुपासून दुसऱ्या बिंदूपर्यंत कसं जायचं . तर हे जरा आव्हानात्मक बनतं कारण ह्या यंत्रमानवाचे नियंत्रण करणारे सूत्र फार क्लिष्ट आहे . खरं तर , ते १२- मितींच्या पोकळीत जगतात . मग आम्ही एक युक्ती करतो . आम्ही ही १२- मितींची पोकळी घेतो आणि रुपांतर करतो एका सपाट ४- मितींच्या जागेत . आणि हा ४- मितीय पृष्ठभाग बनलेला असतो X , Y , Z अक्षांश आणि उभ्या अक्षांशाभोवतीच्या कोनाचा . आणि मग हा यंत्रमानव किमान क्षणिक विक्षेपमार्ग आखतो . भौतिकशास्त्राची आठवण करून देण्यासाठी सांगतो , तुमच्याकडे आहे स्थळ , व्युत्पादन , गती , शिवाय प्रवेग , आणि त्यानंतर येतो धक्का आणि त्यानंतर येते क्षणिक झेप . तर हा रोबो क्षणिक झेप कमीत कमी ठेवतो . परिणामतः होतं असं की हालचाल अगदी सुलभ आणि सुडौल होते . आणि तो हे सगळं अडथळे चुकवत करतो . तर ह्या सपाट पृष्टभागातील किमान क्षणिक विक्षेपमार्गाचे रुपांतर पुन्हा करण्यात येते ह्या क्लिष्ट १२- मितींच्या पोकळीत , जे ह्या रोबोला करावं लागतं नियंत्रण आणि मग कृतीसाठी . तर काही उदाहरणं मी दाखवेन हा किमान क्षणिक विक्षेपमार्ग म्हणजे काय याची . आणि पहिल्या चित्रफितीमध्ये , तुम्हाला दिसेल हा यंत्रमानव एका बिंदुकडून दुसर्‍या बिंदूकडे जाताना एका मध्यवर्ती बिंदूमधून .

(src)="4"> यह रोबोट स्पष्ट रूप से सक्षम है किसी भी वक्र प्रक्षेपवक्र को क्रियान्वित करने को| यह परिपत्र प्रक्षेपवक्र है जहा रोबोट २ G को खीचता है| यहाँ ऊपर गति को देखने वाला केमेरा है जो रोबोट को बताता है वह कहाँ है एक सेकंड में १०० बार| यह रोबोट को बाधाओं के बारे में भी बताता है| और वेह चलती हुई बाधाएं भी हो सकती है| और यहाँ आप देखेंगे डानिएल हूप को ऊपर उड़ाते हुए , जबकि रोबोट हूप की स्थिति की गणना कर रहा है और यह पता लगाने की कोशिश कर रहा की कैसे सबसे अच्छे रूप से वह हूप के अन्दर से जा सकता है| एक शैक्षिक के रूप में , हम हमेशा हुप के अन्दर से कूदने का प्रशिक्षण करते हैं , हमारी प्रयोगशालाओं के लिए धन जुटाने के लिए और अब हम यह रोबोट से करवाते है| तालियाँ एक और बात जो रोबोट कर सकते हैं है की वह प्रक्षेपवक्र के टुकड़े याद रखता है जो वह सीखता है या पूर्व क्रमादेशित होता है| यहाँ आप देख सखते है यह रोबोट एक चलती गति का संयोजन करके जो गति को बढ़ता है और फिर अपनी ओरिएंटेशन बदल देता है और फिर ठीक हो जाता है| तो यह ऐसा करने के लिए मजबूर है क्योंकि खिड़की में यह अंतर चौड़ाई में केवल थोड़ा ही रोबोट से बड़ा है| जैसे की जब एक डुबकी लगानेवाला स्प्रिंगबोर्ड पर खड़ा है और वह गति पाने के लिए छलांग लगता है , और फिर इस पिरुएट करता है , इस दो और एक आधे कलाबाज़ी के माध्यम से और काफी आसानी से वापिस आ जाता है , उसी तरह यह रोबोट भी ऐसा ही कर रहा है| वह जानता है कैसे प्रक्षेपवक्र के टुकड़े को जोड़ा जा सकता है ये काफी मुश्किल कामो को करना| मैं अब गियर बदलना चाहते हूँ | इन रोबोट का एक अलाभ है उनका छोटा आकार जैसा की मैंने आपको पहले कहा था की हम बहुत सारे रोबोट को इस्तमाल करना चाहते है इस अलाभ को टालने के लिए| एक कठिनाई है की आप इतने सारे रोबोट को कैसे समन्वय में ला सकते है ? इसीलिए हमने प्रकृति में देखा| मैं आपको एक छोटा विडियो दिखाना चाहता हु अफेनोगास्टर चींटीयो के बारे में प्रोफेस्सर स्टेफेन प्रात्त के प्रयोगशाला में एक वास्तु को उठाते हुए| यह एक अंजीर का टुकड़ा है| वास्तव में जब आप अंजीर रस के साथ किसी भी वस्तु पे लगायेंगे तो यह चींटियों उन्हें वापस अपने घोंसला में ले जाएगा| तो इन चींटियों का कोई भी केंद्रीय समन्वयक नहीं है| वे अपने बाजु वाले की प्रस्तुति को महसूस कर सकते है| वहाँ कोई स्पष्ट संचार नहीं है| पर क्योंकि वे अपने बाजु वाले की प्रस्तुति को महसूस कर सकते है और वास्तु को भी उनमे आपस में समन्वय है| इस तरह का समन्वय हम अपने रोबोट में लाना चाहते है| ताकि जब हमारे पास एक रोबोट है जो अन्य रोबोट से घेरा हुआ है -- रोबोट इ और ज को देखिये -- हम चाहते है की यह रोबोट अपने आपस के अंतर को मानीटर करे जब वेह पैटर्न में उड़ रहे हो| और तब हम सुनिश्चित करना चाहते हैं की यह अंतर स्वीकार्य स्तर पर है| फिर से यह रोबोट इस ग़लती को मानीटर करता है और नियंत्रण आदेशो की गणना करता है एक सेकंड में १०० बार , जो मोटर आदेशों को एक सेकंड में ६०० बार में अनुवाद करता है| यह होना चाहिए विकेन्द्रीकृत तरीके से भी| फिर से , यदि आपके पास बहुत सारे रोबोट है , यह असंभव है यह सब जानकारी केंद्रीय रूप से समन्वय किया जा सकता है की सब रोबोट एक काम को जल्दी समाप्त कर सके| इसके अलावा रोबोट उनके कार्यों को केवल स्थानीय जानकारी पर आधार करें , जो वे अपने पड़ोसियों के प्रस्थुती से महसूस कर सकते है| और आखिर में और हम चाहते है की यह रोबोट उदासीन हो की उनके पड़ोसियों कौन हैं . इससे हम गुमनामी कहते है| अगला मैं आपको दिखाना चाहता हू एक विडियो ऐसे २० रोबोट के बारे में जो पैटर्न में उड्ड रहे है| वे अपने पड़ोसियों के स्थिति को मोनिटर कर रहे है| वे अपने पैटर्न को बनाये रखते है| वह पैटर्न बदल सकते है| वह तलीय , या तीन आयामी पैटर्न हो सकते है| जैसा की आप यहाँ देख सकते है वे तीन आयामी पैटर्न से तलीय पैटर्न में टूट जाते है| और बाधाओं में से उड़ने के लिए वे पैटर्न को उसी वक्त अनुरूप कर सकते है फिर से , वह रोबोट आपस में काफी नज़दीक आते ह| जैसे की आप यह ८ आंकड़े के आकर की उडान में देख सकते है , वे एक दूसरे से एक इंच की दूरी में आते हैं| और , वायुगतिकीय बातचीत के बावजूद इन प्रोपेलर ब्लेड की वे स्थिर उड़ान को बनाए रखने में सक्षम होते हैं | तालियाँ एक बार आप जान लेंगे कैसे पैटर्न में उड़ा जा सकता है आप वस्तुओं मिलकर उठा सकते हैं| तो यह दिखता है की हम दो गुना , तीन गुना , चार गुना रोबोट की ताकत को बढ़ा सकते है सिर्फ उन्हें अपने पड़ोसियों के साथ टीम में कम करने से , जैसे की आप यहाँ देख सकते हैं| इसका एक नुकसान है की , जैसे आप बढ़ाएंगे जैसे बहुत सारे रोबोट एक वस्तु को उठाएँगे , आप अनिवार्य रूप और प्रभावी ढंग से जड़ता में वृद्धि कर रहे हैं , और इसलिए आप उसकी कीमत चुकायेंगे ; वह उतने चुस्त नहीं है| लेकिन आप पेलोड ले जाने की क्षमता के संदर्भ में लाभकर है| दूसरा प्रयोग जो मैं आपको दिखाना चाहता हूँ -- फिर से , यह हमारी प्रयोगशाला में है| यह कम कुएन्तिन लिंडसे ने किया है जो एक छात्र है| तो उसके एल्गोरिथ्म , अनिवार्य रूप से , इन रोबोट को बताता है कैसे स्वायत्त रूप से घन संरचना को बनाया जा सकता है पुलिंदा जैसे तत्वों से| तो यह एल्गोरिथ्म रोबोट को बताता है कौनसे हिस्से को उठाना है और कहा रखना है| इस विडियो में आप देख सकते है -- यह १० , १४ गुना तेज़ दिखाया गया है -- इन रोबोट को तीन अलग संरचनाओं को बनाते हुए| और फिर , सब कुछ स्वायत्त है , कुएन्तिन को सिर्फ ब्लूप्रिंट को लाना है उस डिज़ाइन का जो वह बनाना चाहता है| यह सब प्रयोग जो आपने अब तक देखे है , यह सब प्रदर्शनों , गति को कब्ज़ा करने वाले कैमरों की मदद से किये गए है| तो क्या होता है जब आप अपनी प्रयोगशाला को छोड़ के बाहर असली दुनिया में आते है ? और अगर GPS नहीं है ? तो यह रोबोट के पास एक कैमरा है और एक लेजर रेडार , एक लेजर स्कैनर भी है| और वह इन सेंसर का इस्तमाल करता है वातावरण का नक्शा बनाने के लिए| उस नक़्शे में विशेश्तैएन शामिल हैं -- जैसे की दरवाज़े , खिडकिया , लोग , फर्नीचर -- और वह अपने खुद की स्थिथि के बारे में जान सकता है उनके विशेषताएँ के अनुसार| तो वहाँ कोई वेद्यिक समन्वय प्रणाली नहीं है| समन्वय प्रणाली रोबोट के आधार पर परिभाषित किया गया है वो कहाँ है और किसे देख रहा है| वह उन विशेषताएँ के अनुसार नेविगेट करता है| तो मैं आपको एक क्लिप दिखाना चाहता हूँ फ्रांक शेन के बनाये हुए अल्गोरिथम और प्रोफेस्सर नेथन माइकल जो दिखता है एक रोबोट को पहली बार एक ईमारत में जाते हुए और इस नक़्शे को बनाते हुए| वह रोबोट आकृति का अंदाज़ लगा सकता है| वह नक्षा बनाता है| वह अपनी स्थिथि का अंदाज़ लगा सकता है एक सेकंड में १०० बार हमें नियंत्रण एल्गोरिदम का उपयोग करने के लिए अनुमति देता है जिनके बारे में मैंने पहले बताया था| तोह यह रोबोट असल में आज्ञा फ्रांक से ले रहा है| लेकिन वह रोबोट अपने आप , कहा जाना , जान सकता है| तो मान लीजिए मैं इससे एक इमारत में भेजना चाहता हूँ और मुझे पता नहीं यह ईमारत कैसा दीखता है में रोबोट को अंदर भेज सकता हूँ , वे नक्शा बनता है और वापिस आ कर मुझे बताता है की वह ईमारत कैसा दीखता है| तोह यहाँ यह रोबोट इस समस्या का केवल हल नहीं निकाल रहा है की इस नक़्शे में कैसे पॉइंट अ से पॉइंट बी तक जा सकता है बल्कि वह अंदाज़ लगता है हर बार सबसे अच्छा पॉइंट बी कौसा है| तो अनिवार्य रूप से यह जानता है कहाँ जाना है ऐसे जगहों को ढूँढना जिनकी जानकारी बहुत कम है| और इस तरह वह नक़्शे को बनाता है| में आपको छोड़ना चाहता हूँ एक आखरी प्रयोग के साथ| और इस तकनीक के कई प्रयोग है | मैं एक प्रोफेसर हूँ , और शिक्षा के बारे में भावुक हूँ| इस तरह के रोबोट वास्तव में बदलाव ला सकते है हमारी पढाई में क से १२ कक्षा तक| परन्तु हम दक्षिणी कैलिफोर्निया में है , जो लॉस एंजिंल्स से नजदीक है , इसीलिए अंत में मैं आपको कुछ मनोरंजक दिखाना चाहता हूँ| में समाप्त करना चाहता हूँ एक संगीत विडियो के साथ| में आपके सामने प्रस्तुत करना चाहता हूँ आलेक्स और डानिएल , जीनोने यह विडियो बनाया है| तालियाँ इससे पहले की में यह विडियो आपको दिखाऊ , में आपको बताना चाहता हूँ की यह उन्होंने पिछले ३ दिनों में बनाया है क्रिस का फ़ोन आने के बाद| और यह रोबोट जो विडियो को बजाते है पूरी तरह से स्वयं संचालित है| आप देखेंगे नौ रोबोट छह विभिन्न उपकरणों को बजाते हुए| और येह खास रूप से TED २०१२ के लिए बनाया गया है| आइये देखिये|
(trg)="3"> म्हणजे हा रोबो अर्थातच समर्थ आहे कुठलेही वळणदार मार्गक्रमण करण्यास . तर ह्या वर्तुळाकार मार्गाकक्षा आहेत जिथे हा यंत्रमानव सुमारे दोन ´G ' अक्षरे रेखाटतो . इथे आपण हालचाली टिपणारे कॅमेरे वरती बसविले आहेत जे त्या रोबोला त्याच्या स्थितीची माहिती देतात , सेकंदाला शंभर वेळा . ते यंत्रमानवाला मार्गातल्या अडथळ्याबद्दलही माहिती पुरवितात . आणि हे अडथळे हलणारेसुद्धा असू शकतात . आणि इथे तुम्ही बघू शकता की डानियेल हि चकती हवेत भिरकावितो आहे आणि यंत्रमानव त्या चकतीच्या स्थितीचा अचूक अंदाज घेतोय आणि तिच्या आतून कसा मार्ग काढायचा ह्याची आकडेमोड करतोय . तर विद्यार्थीदशेत असताना , आम्हाला अडथळ्यांतून मार्ग काढण्याचं नेहमीच प्रशिक्षण दिलं जातं जेणेकरून आमच्या प्रयोगशाळेसाठी निधी उभा करू शकू , आणि आम्ही आमच्या यंत्रमानवांकडूनही ते करून घेतोय .
(trg)="4"> ( टाळ्या ) आणखी एक गोष्ट हे यंत्रमानव करू शकतात ती म्हणजे लक्षात ठेवणं , पूर्वी मार्गक्रमण केलेला भाग जो त्याने शिकलेला किंवा त्यात भरलेला असतो . तर इथे तुम्ही बघता कि हा यंत्रमानव चालना प्राप्त करता करता आपली दिशा बदलतो आणि ( त्यातून ) सावरतो सुद्धा . त्याला हे करावं लागतं कारण इथल्या ह्या खिडकीची लांबी त्याच्या स्वतःच्या लांबीपेक्षा थोडीशीच जास्त आहे . ज्याप्रमाणे एखादा जलतरणपटू चालना प्राप्त करण्यासाठी उंचावरून उडी मारतो आणि वेटोळे घेत ह्या अडीच कोलांट्या उड्या मारत सुंदररित्या ( शेवटी ) स्वतःला सावरतो , तसंच काहीसं हा यंत्रमानव इथे करतो . त्याला हे ज्ञात असतं की छोट्या छोट्या विक्षेपमार्गांना एकत्र करून हे बऱ्यापैकी कठीण काम कसं करायचं ते . मला इथे ( आपले लक्ष ) थोडेसे दुसरीकडे वळवायचे आहे . ह्या छोट्या यंत्रमानवांच्या तोट्यांपैकी एक म्हणजे ह्याचा आकार . आणि मी तुम्हाला आधीच सांगितलंय की आपल्याला खूप- खूप रोबो वापरावे लागतील लहान आकाराच्या ह्या मर्यादेवर मात करण्यासाठी . तर एक समस्या म्हणजे अश्या अनेक यंत्रमानवांमध्ये सुसूत्रता कशी साधणार ? आणि इथे आम्ही निसर्गाचा आधार घेतला . तर मला तुम्हाला एक चित्रफित दाखवायची आहे अफेनोगास्टर नावाच्या वाळवंटी मुंग्यांची प्राध्यापक स्टिवन प्रॅट यांच्या प्रयोगशाळेत , एक वस्तू वाहून नेत असताना . हा तर अंजीराचा एक तुकडा आहे . खरं तर तुम्ही कुठल्याही वस्तूला गोड रस लावा आणि मुंग्या त्याला वारूळापर्यंत ओढत नेतील . तर ह्या मुंग्यांचा कोणीही मध्यवर्ती समन्वयक नसतो . त्या आपल्या शेजाऱ्याचा अंदाज घेतात . इथे कुठल्याही प्रकारचा प्रत्यक्ष संवाद नसतो . पण त्या शेजाऱ्यांचा कानोसा घेत असल्यामुळे , आणि वस्तूचा अंदाज घेत असल्यामुळे , त्यांच्या गटामध्ये अदृश्य समन्वय साधला जातो . तर अश्या प्रकारचा समन्वय आम्हाला आमच्या रोबोंमध्ये हवाय . तर जेव्हा आपल्याकडे एक रोबो आजूबाजूला शेजार्‍यांच्या घोळक्यात असेल -- आणि जसे हे यंत्रमानव ´आय´ आणि ´जे´ -- आपल्याला असं हवंय की त्या रोबोंनी लक्ष ठेवायचंय त्यांच्यातल्या अंतरावर एका विशिष्ट आकाराच्या थव्यात उडताना . आणि तुम्हाला ह्याचीही खबरदारी घ्यायची आहे की हे अंतर सुरक्षित अंतराच्या मर्यादेमध्ये आहे . तर पुन्हा हे रोबोच ह्या एरर वर लक्ष ठेवतात आणि आकडेमोड करतात नियंत्रण आदेशांची सेकंदाला १०० या वेगाने , ज्यांचे नंतर रुपांतर होते मोटारीच्या आज्ञांमध्ये , सेकंदाला ६०० इतक्या वेगाने . त्यामुळे हे करावे लागते काहीश्या विकेंद्रित मार्गांनी . परत , जर तुमच्याकडे खूप- खूप यंत्रमानवांचा ताफा असेल तर ( एखादे ) काम करण्यासाठीची माहिती मध्यवर्ती स्वरूपात जलद गतीने सगळ्या रोबोंपर्यंत पोहोचविणे अशक्यप्राय असते . शिवाय प्रत्येक यंत्रमानवाला त्याच्या हालचालीचा निर्णय घ्यायचा असतो त्याच्या स्थानिक माहितीवरच , जी त्याला त्याच्या शेजाऱ्याकडून मिळते . आणि अखेरीस , आम्हाला हवंय की हे यंत्रमानव त्यांच्या शेजाऱ्याबद्दल साशंक असावं . ह्यालाच आपण निनावीपणा म्हणतो . आता मला तुम्हाला एक चित्रफित दाखवायची आहे ज्यात असे २० यंत्रमानव विशिष्ट आकाराच्या थव्यात उडताना दिसतील . ते त्यांच्या शेजाऱ्याच्या परिस्थितीवर लक्ष ठेवून आहेत . ते थव्याचा आकारही शाबूत ठेवत आहेत . थव्याचा आकार बदलू शकतो . एक- प्रतलीय थवे बनवू शकतात , ते त्रि- मितीय आकारात बनवू शकतात . जसं तुम्हाला इथे दिसेल , की ते त्रिमितीय थवा मोडून सपाट थव्यात येतात आणि अडथळ्यातून मार्ग काढण्यासाठी ते उडता उडताच थव्याचा आकार बदलू शकतात . मग पुन्हा , हे यंत्रमानव एकमेकाच्या खूप जवळ येतात . तुम्ही ह्या आठ आकड्याच्या उड्डाणात बघू शकता की ते एकमेकांच्या फक्त इंचभर दूर इतक्या जवळ येतात आणि त्यांच्या पंखांच्या वायुगतीशास्त्रीय देवघेवीनंतरही ह्या फिरत्या पात्यांच्या , ते स्थिर जागा शाबूत ठेवतात .
(trg)="5"> ( टाळ्या ) एकदा का तुम्हाला विशिष्ट आकाराच्या थव्यात कसं उडायचं हे कळलं , की तुम्ही एकत्रितपणे वस्तू उचलू शकता . ह्यातून आपल्याला असं दिसतंय की आपण दुप्पट , तिप्पट , चौपट करु शकतो ह्या रोबोंचं बळ फक्त शेजार्‍यांशी त्यांचा समन्वय साधून , इथं दिसतंय त्याप्रमाणं . असं करण्याचा एक तोटा म्हणजे , जसजशी तुम्ही ह्याची व्याप्ती वाढविता -- जर तुमच्याकडे खूप यंत्रमानव एखादी वस्तू वाहून नेत असतील , तर तुम्ही परिणामतः जडत्व वाढवित असता , आणि त्याची किंमत द्यावी लागते , ते इतके चपळ रहात नाहीत . पण तुम्ही वाहून नेण्याची क्षमता वाढविता . मला आणखी एक उपयोग तुम्हाला दाखवायचा आहे -- परत , हे आमच्या प्रयोगशाळेतील आहे . हे माझ्या एका पदवी शिक्षण घेणाऱ्या विद्यार्थ्याने , क्वेंतीन लिंडसे ने केलेले काम आहे . त्याने बनविलेली आज्ञावली ह्या यंत्रमानवाना सांगते कशी स्वतंत्ररित्या उभारायची घनाकृती रचना बांधीव घटकांपासून . तर ही आज्ञावली रोबोला सांगते काय उचलायचे , केव्हा आणि कुठे ठेवायचे . तर ह्या चित्रफितीमध्ये तुम्हाला दिसेल , जी १० ते १४ पट अधिक वेगाने दाखविली जात आहे -- तुम्ही बघू शकता की हे यंत्रमानव तीन वेगवेगळ्या रचनांची बांधणी करत आहेत . आणि हे सगळं स्वयंचलित आहे , आणि क्वेंतीनला काय करायचंय तर फक्त त्यांना आराखडा द्यायचाय त्याला बांधायच्या डिझाइनचा . तर आतापर्यंत तुम्ही पाहिलेले हे सगळे प्रयोग , ही सगळी प्रात्याक्षिके , हालचाली टिपणाऱ्या यंत्रणेच्या मदतीने केली आहेत . पण काय होतं जेव्हा तुम्ही प्रयोगशाळेतून बाहेर पडता आणि बाहेरच्या जगात जाता ? आणि तिकडे जीपीएस नसेल तर मग काय ? त्यासाठी हा यंत्रमानव सुसज्ज आहे एक कॅमेरा आणि किरणांच्या सहाय्याने अंतर मोजणारे यंत्र , किरणे मोजणारे यंत्र ह्यांनी . आणि ह्या सेन्सर्सचा उपयोग करून तो सभोवतालचा नकाशा तयार करू शकतो . त्या नकाशात असते माहिती -- दरवाजे , खिडक्या , लोकं , फर्निचर ह्यांची -- आणि मग तो आपलं स्थान शोधून काढतो ह्या वस्तूंच्या संदर्भाने . इथे कुठलीही वैश्विक अक्षांश- रेखांश यंत्रणा नसते . ही यंत्रणा बेतलेली असते , त्या यंत्रमानवावर , तो कुठे आहे आणि कुठे बघतोय ह्यावर . आणि त्यानुसार तो आपली पुढची हालचाल ठरवितो . तर मला तुम्हाला एक क्लिप दाखवायची आहे आज्ञावलींची , ज्या बनवल्या फ्रान्क शेन आणि प्राध्यापक नाथन माइकल यांनी ज्यात हा यंत्रमानव दाखवलाय एका इमारतीमध्ये अगदी पहिल्यांदाच शिरताना आणि उडता- उडताच हा नकाशा बनविताना . त्यात हा ठरवितो कि ह्या इमारतीची काय काय वैशिष्ट्ये आहेत .

(src)="5"> संगीत
(trg)="9"> ( संगीत )

(src)="6"> तालियाँ
(trg)="10"> ( टाळ्या )

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(src)="1"> मुझे भारत के बारे में बात करनी है विचारों के विकास के माध्यम से . अब मुझे विश्वास है कि यह इसे देखने का एक दिलचस्प तरीका है क्योंकि , हर समाज में , विशेष रूप से एक खुले लोकतान्त्रिक समाज में , केवल जब विचार जड़ लेते हैं कि चीज़े बदलती हैं . धीरे धीरे विचार विचारधारा में बदलते हैं , लाते हैं नीतियां जो लाती हैं कार्यवाही .
(trg)="1"> मी भारताबद्दल बोलेन क्रमशः कल्पनांच्या माध्यमातून . आता माझ्या दृष्टीनं , हा गमतीशीर भाग आहे कारण प्रत्येक समाजात , खासकरुन एका खुल्या लोकशाही समाजात , जेव्हा कल्पना रुजु लागतात , तेव्हाच परिस्थिती बदलते . हळूहळू कल्पना मतप्रणालीकडे झुकतात , पुढे धोरणांकडे आणि त्यातून कृतींकडे .

(src)="2"> 1930 में इस देश के एक महान अवसाद आया , जो राज्य और सामाजिक सुरक्षा के सभी विचारों को लाया , और अन्य सभी चीजें जो रूजवेल्ट के समय में हुई .
(trg)="2"> १९३० मध्ये हा देश एका महामंदीला सामोरा गेला , ज्यातून पुढे राज्य व सामाजिक सुरक्षिततेच्या कल्पनांकडे झुकला , आणि अशा इतर सर्व गोष्टी ज्या रुझवेल्टच्या काळात घडल्या .

(src)="3"> 1980 के दशक में रीगन क्रांति आई , जिससे अविनियम आया . और आज , वैश्विक आर्थिक संकट के बाद , नियमों का एक नया ढांचा था कि राज्य को कैसे हस्तक्षेप करना चाहिए . तो विचार स्थिति बदलते हैं . और मैंने भारत को देखा और कहा , वहाँ वास्तव में चार प्रकार के विचार हैं जो वास्तव में भारत पर एक प्रभाव डालते हैं . पहले , मेरे मन में , हैं " विचार जो कि आ चुके हैं . " ये विचार जिन्होंने एक साथ कुछ लाया है वह जिसने भारत को आज का रूप दिया . दूसरा समूह " प्रगति में विचार " वह विचार जो हमने स्वीकार किये हैं लेकिन अभी तक लागु नहीं किये . तीसरा समूह हैं विचार जिनके बारे में हम बहस करते हैं यह वह विचार हैं जिनके बारे में हम लड़ते हैं , वैचारिक लड़ाई , तरीकों को ले कर . और चौथी बात , जो मुझे विश्वास है कि सबसे महत्वपूर्ण है , विचार जिनकी हमें आशा करनी चाहिए . क्योंकि जब आप एक विकासशील देश हैं दुनिया में जहाँ आप अन्य देशो की समस्याएं देख सकते हैं , वास्तव में आप अंदाजा लगा सकते हैं उन्होंने क्या किया अलग तरीके से . अब मैं भारत के मामले में मानता हूँ कि वहाँ छह विचार हैं जो आज के लिए जिम्मेदार हैं . पहले वास्तव में लोगों का दृष्टिकोण है .
(trg)="3"> १९८० मध्ये रीगन क्रांती झाली , जिच्यातून अनियमन पुढं आलं . आणि आज , जागतिक आर्थिक संकटानंतर , संपूर्ण नवीन नियमावली निघाली राज्यानं कसा हस्तक्षेप करावा याबद्दल . म्हणजे कल्पना राज्यांमध्ये बदल घडवून आणतात . आणि मला भारताकडे बघून वाटलं , खरोखर चार प्रकारच्या कल्पना आहेत ज्यांचा खरोखरच भारतावर प्रभाव आहे . माझ्या मते , पहिली म्हणजे ज्यांना मी म्हणतो ´उपस्थित कल्पना ' . या कल्पनांनी काहीतरी जुळवून आणलंय ज्यायोगे भारतामध्ये सांप्रत स्थिती आली आहे . दुसर्‍या प्रकारच्या कल्पनांना मी म्हणतो ´चालू कल्पना . ' या कल्पना स्वीकारल्या गेल्या आहेत पण अजून अंमलात आणल्या गेल्या नाहीत . तिसर्‍या प्रकारच्या कल्पना ज्यांना मी म्हणतो वादग्रस्त कल्पना - ज्यांवर आम्ही भांडतो अशा कल्पना , अंमलबजावणीमधले तात्त्विक मतभेद . आणि चौथी गोष्ट , जी माझ्या मते सर्वात महत्त्वाची आहे ,
(trg)="4"> " अपेक्षित कल्पना . " कारण एका विकसनशील राष्ट्रासाठी जगातल्या इतर देशांच्या समस्या पाहू शकत असताना तुम्हाला खरंतर अनुमान लावता येतं त्यांनी काय केलं आणि त्याहून वेगळा मार्ग कसा काढायचा . आता भारताच्या संदर्भात माझ्या मते सहा कल्पना आहेत ज्यायोगे तो सद्यपरिस्थितीपर्यंत येऊन पोचला आहे . सर्वात पहिली म्हणजे लोकांचे समज .

(src)="4"> ' ६० और ´७०के दशक में हम लोगों को एक बोझ के रूप में देखते थे . एक दायित्व के रूप में जानते थे . आज हम एक परिसंपत्ति के रूप में लोगों की बात करते हैं . हम मानवीय पूंजी के रूप में लोगों की बात करते हैं . और मैं मानसिकता में इस परिवर्तन को , लोगो को बोझ की तरह जानने से मानवीय पूंजी , भारतीय मानसिकता में मौलिक परिवर्तन है . और मानवीय पूंजी की यह सोच में परिवर्तन तथ्य से जुड़ा है कि भारत एक जनसांख्यिकीय लाभांश के माध्यम से जा रहा है . स्वस्थ्य- देखबाल में जैसे सुधार होता है , शिशु मृत्यु दर नीचे जाती है , प्रजनन दर गिरना शुरू होता हैं . और भारत यह देख रहा है . भारत के पास होगा एक जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ कई युवा लोग अगले 30 वर्षों के लिए . इस जनसांख्यिकीय लाभांश के बारे में अद्वितीय है कि भारत दुनिया में अकेला देश होगा इस जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ . दूसरे शब्दों में , यह एक बूढी दुनिया में अकेला जवान देश होगा . और यह बहुत महत्वपूर्ण है . उसी समय अगर आप भारत में जनसांख्यिकीय लाभांश को हटा दे , वहाँ वास्तव में दो जनसांख्यिकीय श्रेणी है . एक दक्षिण और पश्चिम में है , जो पहले से ही पूरी तरह से २०१५ तक व्यय किया जा रहा है , क्योंकि देश के इस भाग में , प्रजनन दर पश्चिम यूरोपीय देश के लगभग बराबर है . तो फिर वहाँ पूरा उत्तरी भारत है , जो भविष्य के जनसांख्यिकीय लाभांश का बड़ा हिस्सा होगा . लेकिन एक जनसांख्यिकीय लाभांश उतना ही अच्छा है जितना आपका मानवीय पूंजी में निवेश . सिर्फ अगर लोग शिक्षित हैं , उनके पास अच्छा स्वास्थ्य है , बुनियादी ढांचा है , काम पर जाने के लिए सड़के हैं , अध्ययन करने के लिए रात में रोशनी है - केवल उन मामलों में आप वास्तव में लाभ पा सकते है एक जनसांख्यिकीय लाभांश का . दूसरे शब्दों में , अगर आप वास्तव में एक जनसांख्यिकीय पूंजी में निवेश नहीं कर रहे हैं , वही जनसांख्यिकीय लाभांश एक जनसांख्यिकीय आपदा हो सकती है . इसलिए भारत एक महत्वपूर्ण बिंदु पर है या तो यह लाभ उठा सकता है इस जनसांख्यिकीय लाभांश का या यह एक जनसांख्यिकीय आपदा की ओर जा सकता है . भारत में दूसरी बात परिवर्तन है उद्यमियों की भूमिका का . जब भारत स्वतंत्र हुआ उद्यमियों को देखा गया एक बुरे रूप में , वह लोग जो फायदा उठाएँगे . लेकिन आज , ६० वर्ष से उद्यमशीलता की वृद्धि की वजह से , उद्यमि भूमिका ढ़ाचा बन गए हैं , और वे समाज को बड़ा योगदान दे रहे हैं . यह परिवर्तन योगदान दे रहा है जीवन शक्ति और पूरी अर्थव्यवस्था के लिए . तीसरी बड़ी बात , मुझे विश्वास है , जिसने भारत को बदल दिया है अंग्रेजी भाषा की ओर हमारा रवैया है . अंग्रेजी भाषा साम्राज्यवाद की भाषा के रूप में देखी गयी थी . लेकिन आज वैश्वीकरण के साथ , आउटसोर्सिंग के साथ , अंग्रेजी आकांक्षा की भाषा बन गई है . इसने इससे वह बना दिया जिससे सब सीखना चाहते हैं . और अब तथ्य यह है कि हमारा अंग्रेजी होना एक बड़ी सामरिक सम्पन्ति बन गया है . अगली बात प्रौद्योगिकी है . चालीस साल पहले , कंप्यूटर देखा गया निषिद्ध रूप में , उससे हम डरते थे , वह नौकरियों कम करता था . आज हम एक ऐसे देश में रहते हैं जो अस्सी लाख मोबाइल फोन एक महीने में बेचता है , उन मोबाइल फोन का ९० प्रतिशत प्रीपेड फोन है क्योंकि लोगों के पास क्रेडिट इतिहास नहीं है . उन प्रीपेड फोन के चालीस प्रतिशत प्रत्येक पुनर्भरण पर १० रूपये से कम डालते हैं . यह पैमाना है जिस पर प्रौद्योगिकी ने आज़ाद किया और सुलभ बना दिया . और इसलिए प्रौद्योगिकी चली गयी है निषिद्ध रूप से डरावनी से , सशक्तिकरण करने वाली चीज़ पर . बीस साल पहले , जब वहाँ बैंक कंप्यूटरीकरण पर एक रिपोर्ट थी उन्होंने रिपोर्ट को नाम नहीं दिया था कंप्यूटर पर एक रिपोर्ट , वे उन्हें कहते थे " लेजर की पोस्टिंग मशीनें . वे वास्तव में संघ को नहीं बताना चाहते थे कि वह कंप्यूटर हैं . और जब वे और अधिक उन्नत , अधिक शक्तिशाली कंप्यूटर चाहते थे वे उन्हें " उन्नत लेजर पोस्टिंग मशीनें " बुलाते थे . तो हम उन दिनों से एक लंबा सफर तय कर चुके हैं टेलीफोन सशक्तिकरण का एक साधन है , और वास्तव में भारतीयों की प्रौद्योगिकी के बारे में सोच बदल गई है . और फिर मुझे लगता है कि अन्य बिंदु है कि भारतीयों आज बहोत अधिक वैश्वीकरण के साथ आरामदायक हैं .
(trg)="5"> ६० व ७० च्या दशकात आपण लोकांचा ओझं म्हणून विचार केला . आपण लोकांचा जबाबदारी म्हणूनच विचार केला . आज आपण लोकांचा संपत्ती म्हणून विचार करतो . आपण लोकांना मानवी भांडवल असं संबोधतो . आणि माझा असा विश्वास आहे की विचारसरणीतील हा बदल लोकांकडं ओझ्याच्या भावनेतून बघण्यापासून , मानवी भांडवलापर्यंत , हा भारतीय विचारसरणीतील मुलभूत बदलांपैकी एक आहे . आणि मानवी संपत्तीच्या विचारामधील हा बदल या वास्तवाशी निगडीत आहे की भारत एका डेमोग्राफिक डिव्हिडंड मधून जात आहे . जसजशा आरोग्य सुविधा सुधारत जातील , अर्भक मृत्युचं प्रमाण घटत जाईल , जन्मदर कमीकमी होऊ लागेल . आणि भारतात हे होत आहे . तसतसा भारतात तयार होईल खूप मोठा युवावर्ग , जो अर्थव्यवस्थेच्या प्रगतीला चालना देईल पुढच्या ३० वर्षांसाठी . या डेमोग्राफिक डिव्हिडंड मधील वैशिष्ट्य म्हणजे भारत हे जगातील एकमेव राष्ट्र असेल जिथे आर्थिक प्रगतीला इतकी जोरदार गती मिळेल . थोडक्यात , वृध्दत्वाकडं झुकणार्‍या या जगात ते एकमेव तरुण राष्ट्र असेल . आणि हे फार महत्त्वाचं आहे . याच अनुषंगानं भारतातील या डेमोग्राफिक डिव्हिडंड ची उकल केली असता खरंतर दोन डेमोग्राफिक आलेख दिसून येतील . एक आहे दक्षिण व पश्चिम भारताचा जो लवकरच पूर्णपणे वधारलेला दिसेल २०१५ पर्यंत कारण देशाच्या त्या भागात , जन्मदर जवळजवळ पाश्चिमात्य- युरोपियन देशांतील दराइतकाच आहे . आणि मग येतो संपूर्ण उत्तर भारत , जो असणार आहे भविष्यातील डेमोग्राफिक डिव्हिडंड च्या फुगवट्याचा भाग . परंतु हा डेमोग्राफिक डिव्हिडंड इतकाच चांगला आहे जितकी तुमच्या मानवी संपत्तीमधील गुंतवणूक . लोकांना शिक्षण मिळालं तरच , त्यांचं आरोग्य चांगलं राहिलं , त्यांना पायाभूत सुविधा मिळाल्या , त्यांना कामाला जाण्यासाठी रस्ते मिळाले , त्यांना रात्री अभ्यास करण्यासाठी दिवे मिळाले - या आणि अशाच परिस्थितीत तुम्हाला खरोखर फायदा होईल डेमोग्राफिक डिव्हिडंड चा . थोडक्यात , तुम्ही जर मानवी साधनसंपत्ती मध्ये गुंतवणूक केली नाही , तर हाच डेमोग्राफिक डिव्हिडंड डेमोग्राफिक डिझास्टर ( अनर्थ ) बनू शकतो . म्हणून भारत अशा नाजूक वळणावर आहे जिथे तो आपल्या डेमोग्राफिक डिव्हिडंड चा पुरेपूर फायदा उचलू शकतो किंवा डेमोग्राफिक अनर्थाच्या खाईत कोसळू शकतो . भारतातील दुसरी गोष्ट म्हणजे बदल उद्योजकांच्या भूमिकेतील . जेव्हा भारताला स्वातंत्र्य मिळालं तेव्हा उद्योजकांकडं बघितलं जायचं वाईट समूह म्हणून , पिळवणूक करणारे लोक म्हणून . पण आज , ६० वर्षांनंतर , उद्योजकतेतील भरभराटीमुळं , उद्योजकांकडं आदर्श म्हणून पाहिलं जातंय . आणि ते समाजाला प्रचंड योगदान करीत आहेत . या देवाणघेवाणीतून भर पडली आहे चैतन्यामध्ये आणि एकूणच अर्थव्यवस्थेमध्ये . तिसरी मोठी गोष्ट ज्यामुळं माझ्या मते भारतात परिवर्तन घडून आलं ती म्हणजे आमचा इंग्रजी भाषेकडं बघण्याचा दृष्टीकोन . इंग्रजी भाषेकडं साम्राज्यवाद्यांची भाषा म्हणून बघितलं जायचं . पण आज जागतिकीकरणामुळं , आऊटसोर्सिंगमुळं , इंग्रजी ही महत्त्वाकांक्षेची भाषा बनली आहे . यामुळं ती सर्वांना शिकावीशी वाटू लागली आहे . आणि आम्हाला इंग्रजी येतं ही वस्तुस्थिती आता बनत आहे एक अतिशय मोक्याचं साधन . त्यानंतरची गोष्ट आहे तंत्रज्ञान .
(trg)="6"> ४० वर्षांपूर्वी , संगणक समजले जात प्रतिबंधित वस्तू , अशी वस्तू जिचा धाक होता , अशी वस्तू जिच्यामुळं रोजगार कमी झाले . आज आपण अशा देशात राहतो जिथं विकले जातात आठ दशलक्ष मोबाईल फोन एका महिन्यात , ज्या मोबाईल फोन्सपैकी ९० टक्के प्रीपेड फोन आहेत कारण लोकांची मागील पतयोग्यता नाही . त्या प्रीपेड फोन्सपैकी ४० % रीचार्ज केले जातात प्रत्येक वेळी २० सेंटहून कमी दरात . हे प्रमाण आहे तंत्रज्ञानाच्या मुक्ततेचं आणि सहजसाध्यतेचं . आणि म्हणून तंत्रज्ञान विस्तारत गेलं काहीतरी अमान्य असण्यापासून आणि भीतीदायक असण्यापासून , काहीतरी समृद्धीकारक असण्यापर्यंत .
(trg)="7"> २० वर्षांपूर्वी , जेव्हा बॅंकेच्या संगणकीकरणावर अहवाल बनवला गेला , त्यांनी त्या अहवालाला म्हटलं नाही संगणकांवरील अहवाल . त्यांनी त्याला म्हटलं नोंदी राखण्याचं यंत्र . त्यांची इच्छा नव्हती की कामगार संघटनांना कळावं ते खरंच संगणक आहेत . आणि जेव्हा त्यांना हवे होते अधिक प्रगत , अधिक शक्तीशाली संगणक त्यांनी नाव वापरलं आधुनिक नोंदी राखण्याचं यंत्र असं . तर आपण अशा काळापासून बरेच पुढे निघून आलो आहोत जिथं टेलिफोन बनलाय सबलीकरणाचं साधन आणि खरंच भारतीयांची तंत्रज्ञानाकडं बघण्याची दृष्टी बदलून टाकली आहे . आणि मग माझ्या मते अजून एक गोष्ट म्हणजे भारतीय आज खूपच सहजतेनं घेतायत जागतिकीकरण . परत , २०० वर्षं काढल्यानंतर इस्ट इंडीया कंपनी आणि त्यांच्या बादशाही सत्तेखाली , भारतीयांची जागतिकीकरणाबद्दल खूप नैसर्गिक प्रतिक्रिया होती हे साम्राज्यवादाचं एक रुप आहे अशा समजातून . पण आज जसजशा भारतीय कंपन्या परदेशी जाऊ लागल्यात जसजशे भारतीय जगात कुठंही जाऊन काम करु लागलेत , तसतसा भारतीयांचा विश्वास जबरदस्त वाढला आहे आणि त्यांना कळून चुकलंय की जागतिकीकरणामध्ये तेदेखील सहभागी होऊ शकतात . आणि या वास्तवामुळं की परिस्थिती आमच्या बाजूनं आहे , कारण या वृद्धत्वाकडं झुकणार्‍या जगात फक्त आम्हीच एक तरुण देश आहोत , जागतिकीकरण भारतीयांसाठी अधिकच आकर्षक बनत चाललंय . आणि अखेरीस , भारतानं लोकशाहीची मुळं घट्ट रुजवली आहेत .

(src)="5"> २०० से अधिक वर्षों के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के साम्राज्यवादी शासन के अधीन रहने के बाद , भारतीयों का वैश्वीकरण की ओर एक बहुत ही स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी कि यह साम्राज्यवाद का एक रूप थी . लेकिन आज , जैसे भारतीय कंपनियों विदेश जाती हैं , और दुनिया भर में भारतीय कार्य करते हैं , भारतीयों को बहुत अधिक विश्वास आया है और वह महसूस करते हैं कि वैश्वीकरण में वह भाग ले सकते हैं . और तथ्य यह है कि जनसांख्यिकी हमारे पक्ष में हैं , क्योंकि हम बूढी हो रही दुनिया में अकेले युवा देश हैं , भूमंडलीकरण सभी भारतीयों के लिए और अधिक आकर्षक बना देती है . और अंत में , भारत में लोकतंत्र गहन हुआ है . जब लोकतंत्र भारत ६० साल पहले आया यह एक विशिष्ट अवधारणा थी . यह कुछ लोग थे जो लोकतंत्र लाना चाहते थे क्योंकि वे विचार लाना चाहते थे यूनिवर्सल मतदान और संसद और संविधान वगेहरा . लेकिन आज लोकतंत्र एक नीचे से ऊपर की प्रक्रिया बन गयी है जहां हर कोई एहसास करता है एक आवाज होने के लाभ का एक खुले समाज में होने का लाभ . और इसलिए लोकतंत्र गुथा हुआ बन गया है . मैं इन छह कारकों को मानता हूँ - जनसांख्यिकीय पूंजी के रूप में जनसंख्या को देखने के कारण , भारतीय उद्यमियों की वृद्धि , आकांक्षा की भाषा के रूप में अंग्रेजी की वृद्धि , सशक्त बनाने में प्रौद्योगिकी की भूमिका , सकारात्मक कारक के रूप में वैश्वीकरण , और लोकतंत्र का गहन होना , इन्होने योगदान दिया है कि भारत आज आगे बढ़ रहा है उन दरों पर जो कभी नहीं देखे गए . लेकिन , फिर हम आते हैं उन विचारों पर जो प्रगति में हैं . यह वो विचार हैं जिनके लिए समाज में कोई तर्क नहीं है , लेकिन आप उन चीजों को लागू करने में सक्षम नहीं हैं . और वास्तव में यहाँ चार चीजें हैं . एक शिक्षा का सवाल है . किसी कारण से , शायद पैसे की कमी , प्राथमिकताओं की कमी , एक बड़ी धार्मिक संस्कृति होने की वजह से , प्राथमिक शिक्षा को कभी आवश्यक ध्यान नहीं दिया गया था . लेकिन अब मुझे विश्वास है कि यह एक बिंदु तक पहुँच चूका है जहाँ यह बहुत महत्वपूर्ण बन गया है . दुर्भाग्य से सरकारी स्कूल कार्य नहीं करते , तो बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं . यहां तक ​​कि भारत की मलिन बस्तियों में 50 प्रतिशत से अधिक शहरी बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे हैं . तो वहाँ स्कूलों से कार्य करना एक बड़ा चैलेंज है . लेकिन , वहाँ एक विशाल इच्छा है गरीब सहित सब लोग में , अपने बच्चों को शिक्षित करने की . तो मेरा मानना ​​है कि प्राथमिक शिक्षा एक विचार है जो आ गया है लेकिन अभी लागू नहीं हुआ है . इसी तरह , बुनियादी सुविधाएँ , एक लंबे समय तक , बुनियादी सुविधाएँ प्राथमिकता नहीं थीं . आप में से जो भारत गए हैं उन्होंने देखा है . निश्चित रूप से यह चीन की तरह नहीं है . लेकिन आज मुझे विश्वास है कि बुनियादी सुविधाओं में है कुछ जिस पर सहमति है और जो लोग लागू करना चाहते हैं . यह राजनीतिक बयानों में परिलक्षित होता है .
(trg)="8"> ६० वर्षांपूर्वी जेव्हा भारतात लोकशाही आली तेव्हा ती एक अभिजनवादी संकल्पना होती . मूठभर लोक होते ज्यांना लोकशाही आणायची होती कारण त्यांना ही कल्पना आणायची होती सार्वत्रिक मतदानाची आणि संसदेची आणि घटनेची वगैरे . पण आज लोकशाही बनली आहे सर्वंकष प्रक्रिया जिथं प्रत्येकाला समजले आहेत अभिव्यक्ती स्वातंत्र्याचे फायदे , मुक्त समाजव्यवस्थेचे फायदे . आणि म्हणून लोकशाही रुजली आहे खोलवर . माझ्या मते हे सहा घटक - लोकसंख्या हे मानवी भांडवल आहे या समजाचा उदय , भारतीय उद्योजकांचा उदय , इंग्रजीचा महत्त्वाकांक्षी भाषा म्हणून उदय , सबलीकरणासाठी तंत्रज्ञान , जागतिकीकरण एक सकारात्मक घटक , आणि लोकशाहीचं बळकटीकरण - यांचं योगदान आहे ज्यायोगे भारत आज प्रगती करतोय पूर्वी कधीही न पाहिलेल्या वेगानं . परंतु असं म्हटल्यावर , मग आपण येतो चालू कल्पनांकडं . या अशा कल्पना आहेत ज्यांच्याबद्दल समाजात कोणतेही मतभेद नाहीत , पण तुम्हाला त्या अंमलात आणता येत नाहीत . आणि खरंच इथं चार गोष्टी आहेत . एक आहे शिक्षणाचा प्रश्न . काही कारणास्तव , काहीही कारणं असोत , पैशाचा अभाव , प्राधान्यत्वाचा अभाव , पूर्वापार चालत आलेल्या धर्म- संस्कृती मुळं प्राथमिक शिक्षणावर द्यायला हवा तितका भर कधीच दिला गेला नाही . पण माझ्या मते आता ती वेळ आली आहे जेव्हा ती गोष्ट अतिशय महत्त्वाची बनलीय . दुर्दैवानं सरकारी शाळा कार्यक्षम नाहीत , म्हणून आज मुलं खाजगी शाळांमध्ये जात आहेत . भारताच्या झोपडपट्ट्यांमध्येदेखील शहरी मुलांपैकी ५० टक्क्यांहून अधिक खाजगी शाळांमध्ये जात आहेत . तर त्या शाळांना कार्यक्षम बनवणं हे एक मोठं आव्हान आहे . पण असं म्हणताना , एक अतिशय तीव्र अभिलाषा आहे गरीबांसहित प्रत्येकाची , आपल्या मुलांना शिकविण्याची . म्हणून माझ्या मते , प्राथमिक शिक्षण ही अशी कल्पना आहे जी सुचली आहे पण अजून अंमलात आणली गेली नाही . त्याचप्रमाणं , पायाभूत सुविधा . बर्‍याच कालावधीसाठी , पायाभूत सुविधांना प्राधान्य देण्यात आलं नव्हतं . तुमच्यापैकी जे भारतात आले आहेत त्यांनी हे बघितलं आहे . हे चित्र नक्कीच चीन सारखं नाही . पण आज माझ्या मते अखेर पायाभूत सुविधा अशी कल्पना आहे जिच्याबद्दल एकमत झालं आहे आणि लोक ती अंमलात आणू इच्छितात . राजकीय वक्तव्यांमध्ये त्याची झलक दिसते आहे .

(src)="6"> २० साल पहले राजनीतिक नारा था , " रोटी , कपड़ा , और मकान , " जिसका मतलब था , " रोटी , कपड़ा और मकान " . और आज का राजनीतिक नारा है , " बिजली , सड़क , पानी , " जिसका मतलब है " बिजली , सड़क और पानी . " और यह मानसिकता में बदलाव है जहां बुनियादी सुविधाएँ अब स्वीकार कर ली गयी हैं . तो मुझे विश्वास है कि यह एक विचार है जो आ गया है , लेकिन लागू नहीं हुआ . तीसरी बात फिर शहरों में है . क्योंकि गांधी गांवों में विश्वास करते थे और क्योंकि ब्रिटिश शहरों से राज करते थे , इसलिए नेहरू नई दिल्ली को एक अभारतीय शहर के रूप में देखते थे . हम एक लंबे समय तक हमारे शहरों की उपेक्षा करते रहे हैं . और उसका नतीजा आप देख सकते हैं . लेकिन आज , अंत में , आर्थिक सुधारों के बाद , और आर्थिक विकास , यह प्रस्ताव कि शहर इंजन है आर्थिक विकास के , शहर रचनात्मकता के इंजन हैं , शहर नवविचार के इंजन हैं , अंत में स्वीकार कर लिया गया है . और मुझे लगता है कि अब आप हमारे शहरों में सुधार लाने की ओर कदम देख रहे हैं . फिर से , एक विचार जो आ गया है मगर लागु नहीं हुआ है . अंतिम बात , एकल बाजार के रूप में भारत को देखना है - क्योंकि जब आप भारत को एक बाजार के रूप में नहीं देखते , तुम आप एक एकल बाजार के बारे में परेशान नहीं थे , क्योंकि इससे फर्क नहीं पड़ता था . और इसलिए आप एक स्थिति में थे जहां हर राज्य के पास अपने उत्पादों के लिए अपने बाजार थे . हर प्रांत का कृषि के लिए अपना बाजार था . अब तेजी से नीतियां कराधान और बुनियादी ढाचे की , एक एकल बाजार के रूप में भारत बनाने की ओर बढ़ रही हैं . तो वहाँ आंतरिक वैश्वीकरण हो रहा है , जो बाहरी वैश्वीकरण के बराबर महत्वपूर्ण है . मेरा मानना ​​है कि इन चार कारकों प्राथमिक शिक्षा , बुनियादी ढांचा , शहरीकरण , और एक एकल बाजार भारत में वह विचार हैं जिन्हें स्वीकार कर लिया गया है , लेकिन लागू नहीं किया गया है . फिर है वह विचार जो विचार संघर्ष में हैं . विचार जिन पर हम बहस करते हैं . तर्क है जो गतिरोध हैं . क्या है वोह विचार ? एक मुझे लगता है , वैचारिक मुद्दे हैं . ऐतिहासिक भारतीय पृष्ठभूमि की वजह से , जाति व्यवस्था में , और इस वजह से की कई लोगों को जो बाहर छोड़ दिए गए , राजनीति का बड़ा हिस्सा इस बारे में हैं कि कैसे सुनिश्चित करें कि हम उन की पूर्ती करें . और यह आरक्षण और अन्य तकनीक का कारण हैं . यह कारण है कि हम अनुवृत्ति देते हैं , और सभी लेफ्ट और राईट तर्क जो हैं . भारतीय समस्याएँ विचारधाराओं से जुड़ी हैं जाति और अन्य बातों की . यह नीति गतिरोध पैदा कर रही है . यह कारक हैं जो हमें हल करना है . दूसरा है श्रम नीति , जो मुश्किल बना रही है उद्यमियों के लिए कंपनियों में नौकरियों बनाने में कि भारतीय श्रमिक का ९३ प्रतिशत असंगठित क्षेत्र में है . उनके पास कोई लाभ नहीं है : सामाजिक सुरक्षा नहीं है ; पेंशन नहीं है , हेल्थ , उन चीजों में से कोई भी नहीं है . यह ठीक होना ज़रूरी है , क्योंकि जब तक आप इन लोगों को औपचारिक कर्मचारियों में नहीं लाते हैं , आप बहोत लोगों को बेदखल कर रहे हैं . इसलिए हमें नए श्रम कानून बनाने की जरूरत है , जो आज जैसे कठिन नहीं हैं . साथ ही बहुत अधिक लोगों के औपचारिक क्षेत्र होने की नीति बनाये , और लाखों लोगों के लिए नौकरियों बनाएँ जो हमें करने की जरूरत है . तीसरी बात हमारी उच्च शिक्षा है . भारतीय उच्च शिक्षा पूरी तरह नियंत्रित है . बहुत मुश्किल है एक निजी विश्वविद्यालय शुरू करना . बहुत मुश्किल है एक विदेशी विश्वविद्यालय के लिए भारत में आना . परिणाम स्वरुप हमारी उच्च शिक्षा भारत की मांगों के साथ तालमेल नहीं रख रही है . इससे बहोत परेशानिया उत्तपन हो रही हैं . लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वह विचार हैं जिनका हमें अंदाजा होना चाहिए . यहाँ भारत पश्चिम की ओर देख सकता है और कहीं और , और देख सकते है कि क्या किया जाना चाहिए . पहली बात है , हम बहुत भाग्यशाली हैं कि प्रौद्योगिकी ऐसे बिंदु पर है जहां यह और अधिक उन्नत है अन्य देशों की तुलना में जब उनका विकास हुआ . तो हम शासन के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकते हैं . हम प्रत्यक्ष लाभ के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकते हैं . हम पारदर्शिता , और कई अन्य चीजों के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर सकते हैं . दूसरी बात है , स्वास्थ्य के मुद्दे . भारत में उतना ही भयानक है हृदीय मुद्दे की स्वास्थ्य समस्याएँ , मधुमेह की , मोटापे की . तो कोई फायदा नहीं है वहाँ गरीब देश के रोगों को बदल अमीर देश के रोगों को लाने का . इसलिए हमें पूरी तरह से स्वास्थ्य पर पुनर्विचार करना है . हमें वास्तव में एक रणनीति बनाने की आवश्यकता है ताकि हम स्वास्थ्य की अन्य चरम की और न जाये . इसी प्रकार पश्चिम में आज आप देख रहे हैं पात्रता की समस्या - सामाजिक सुरक्षा , चिकित्सा , चिकित्सा- सहायता की लागत . इसलिए जब आप एक युवा देश हैं , आप के पास मौका है एक आधुनिक पेंशन प्रणाली बनाने का ताकि आप पात्रता समस्याएं नहीं बनाएँ आने वाले समय के लिए . और फिर , भारत के पास आसान विकल्प नहीं है अपने वातावरण को गन्दा बनाने का , क्योंकि यहाँ पर्यावरण और विकास को साथ चलाना है . सिर्फ एक विचार देने के लिए , दुनिया को स्थिर होना है प्रति वर्ष २० गिगाटन पर . नौ अरब की आबादी पर हमारी औसत कार्बन उत्सर्जन प्रति वर्ष दो टन होनी चाहिए . भारत प्रति वर्ष दो टन पर आ चूका है . लेकिन अगर भारत आठ प्रतिशत पर बढ़ता है , प्रति वर्ष प्रति व्यक्ति आय २०५० तक १६ गुना बाद जाएगी . तो हम कह रहे हैं :
(trg)="9"> २० वर्षांपूर्वीच्या राजकीय घोषणा होत्या , " रोटी , कपडा , मकान , " म्हणजेच " अन्न , वस्त्र आणि निवारा . " आणि आजची राजकीय घोषणा आहे , " बिजली , सडक , पानी " म्हणजेच " वीज , पाणी आणि रस्ते . " आणि हा बदल आहे विचारसरणीतला जिथं पायाभूत सुविधा आता स्वीकारण्यात आल्या आहेत . म्हणून मला असं वाटतं की ही एक उपस्थित कल्पना आहे फक्त ती अंमलात आलेली नाही . तिसरी गोष्ट म्हणजे पुन्हा शहरे - कारण की गांधींचा विश्वास खेड्यांमध्ये होता आणि ब्रिटिश शहरांतून राज्य चालवत होते . म्हणून नेहरुंनी नवी दिल्लीकडं एक अ- भारतीय शहर म्हणून पाहिलं . बर्‍याच कालावधीसाठी आम्ही आमच्या शहरांकडं दुर्लक्ष केलं आहे . आणि त्याचेच परिणाम तुम्हाला आजच्या परिस्थितीत दिसतील . पण आज अखेर आर्थिक सुधारणांनंतर , आणि आर्थिक प्रगतीनंतर , मला वाटतं हा समज की शहरं ही इंजिनं आहेत आर्थिक प्रगतीची , शहरं ही इंजिनं आहेत निर्मितीची , शहरं ही इंजिनं आहेत नाविन्याची , हा अखेर मान्य झाला आहे . आणि मला वाटतं की तुम्हाला शहरांच्या सुधारणेसाठी पावलं उचललेली दिसतील . ही अजून एक कल्पना जी सर्वमान्य असून तिच्यावर काम करण्यात आलं नाही . शेवटची गोष्ट म्हणजे भारताचा एकत्रित बाजारपेठ म्हणून विचार कारण जेव्हा तुम्ही भारताचा एक बाजारपेठ म्हणून विचार केला नाही , तेव्हा तुम्ही खरंच एकत्रित बाजारपेठेची दखल घेतली नाही , कारण ती फारशी दखलपात्र नव्हती . आणि म्हणून तुमच्यासमोर ही परिस्थिती आली जिथं उत्पादनांसाठी प्रत्येक राज्याची आपली स्वतःची बाजारपेठ होती . प्रत्येक प्रांताची स्वतःची कृषी बाजारपेठ होती . वाढीबरोबर आता धोरणं कर- आकारणीची आणि पायाभूत सुविधा वगैरे , भारताला एकत्रित बाजारपेठ बनविण्याच्या दृष्टीनं वाटचाल करीत आहेत . म्हणजेच एका प्रकारे अंतर्गत जागतिकीकरणही सुरू आहे , जे बाह्य जागतिकीकरणाइतकंच महत्त्वाचं आहे . माझ्या मते हे चार घटक , जसे प्राथमिक शिक्षण , पायाभूत सुविधा , शहरीकरण , आणि एकत्रित बाजारपेठ , या माझ्या मते भारतातील अशा कल्पना आहेत ज्या सर्वमान्य असूनही प्रत्यक्षात उतरु शकल्या नाहीत . त्याशिवाय माझ्या मते काही वादग्रस्त कल्पनाही आहेत . अशा कल्पना ज्याबद्दल आमच्यात मतभेद आहेत . या अशा वादांमुळं आम्ही प्रगतीला खीळ घालतो . या कल्पना कोणत्या ? एक आहे , माझ्या मते , आमचे तात्त्विक मुद्दे . भारताच्या ऐतिहासिक पार्श्वभूमीमुळं , जातीव्यवस्थेमध्ये , आणि या वस्तुस्थितीमुळं की असे खूप लोक आहेत ज्यांना वंचित ठेवलं गेलं आहे , राजकारणाचा बराचसा भाग याची काळजी घेण्यात जातो की त्या मुद्द्याची दखल घेतली जावी . आणि त्याची परिणती आरक्षण व इतर पद्धतीत होते . हे आमच्या लोकांना देण्यात येणार्‍या अर्थसहाय्याशी देखील निगडीत आहे , तसंच आमच्या सर्व डाव्या आणि उजव्या युक्तिवादांशी देखील . भारताच्या बर्‍याच समस्या निगडीत आहेत या तत्त्वांशी जातव्यवस्था वगैरेच्या . या धोरणामुळं अडथळे निर्माण होतात . हा एक प्रश्न आहे ज्याचं निराकरण केलं गेलं पाहिजे . दुसरा म्हणजे आमचे कामगार कायदे , जे अवघड करुन टाकतात उद्योजकांसाठी कंपन्यांमध्ये विशिष्ट रोजगार निर्मिती करायला , जिथं भारतीय कामगारांपैकी ९३ टक्के असंघटीत क्षेत्रात आहेत . त्यांच्यासाठी कसल्याही सुविधा नाहीत . त्यांच्यासाठी सामाजिक सुरक्षा नाही . त्यांच्यासाठी निवृत्तीवेतन नाही , त्यांच्यासाठी आरोग्य सुविधा नाहीत , अशा कोणत्याही गोष्टी नाहीत . हे सुधारलं पाहिजे कारण जोपर्यंत या लोकांना आणलं जात नाही मुख्य कामगार प्रवाहात , आपल्या हक्कांपासून पूर्णपणे वंचित असणारा असा जनसमुदाय तुम्ही निर्माण करता . म्हणून आम्हाला बनवले पाहिजेत नवे कामगार कायदे , जे सध्याच्या कायद्याइतके कठीण नसतील . त्याचबरोबर , भरपूर लोकांना मुख्य प्रवाहात आणणारी धोरणं असतील , आणि ज्यांना रोजगाराची गरज आहे अशा लक्षावधी लोकांसाठी रोजगार निर्मिती करतील . तिसरी गोष्ट म्हणजे आमच्याकडचं उच्च शिक्षण . भारतातील उच्च शिक्षणक्षेत्र पूर्णतः नियमबद्ध आहे . एखादं खाजगी विद्यापीठ सुरु करणं खूप अवघड आहे . एखाद्या परदेशी विद्यापीठासाठी भारतात येणं खूप अवघड आहे . परिणामतः आमच्याकडील उच्च शिक्षण भारताच्या गरजांची पूर्तता करण्यास कमी पडत आहे . यातून अनेक समस्या उद्भवत आहेत , ज्याची आम्ही दखल घेतली पाहिजे . पण माझ्या मते सर्वात महत्त्वाच्या कल्पना म्हणजे अपेक्षित कल्पना . यासाठी भारताला बघावं लागेल घडामोडींकडं पश्चिमेतल्या आणि इतर ठिकाणच्या , आणि ठरवावं लागेल काय करायचं आहे ते . सर्वप्रथम , आम्ही अतिशय भाग्यवान आहोत की तंत्रज्ञान अशा टप्प्यावर आहे जिथं ते खूपच जास्त प्रगत आहे तेव्हापेक्षा जेव्हा इतर देश प्रगतीपथावर होते . तर आम्ही शासनयंत्रेसाठी तंत्रज्ञान वापरु शकतो . आम्ही थेट लाभासाठी तंत्रज्ञान वापरु शकतो . आम्ही पारदर्शक कारभारासाठी आणि अशा अनेक गोष्टींसाठी तंत्रज्ञान वापरु शकतो . दुसरी गोष्ट म्हणजे , आरोग्याचा मुद्दा . भारतामध्ये आहेत तितक्याच भयानक आरोग्य समस्या हृदयविकारांच्या , मधुमेहाच्या , लठ्ठपणाच्या . तर मग काहीच अर्थ नाही , गरीब देशांतील आजारांच्या जागी श्रीमंत देशांतील आजारांना स्थान देण्यात . म्हणूनच आम्हाला फेरविचार करायला हवा आमच्या एकूणच आरोग्यविषयक दृष्टीकोनाचा . आम्हाला खरंच अशी योजना राबवली पाहिजे जेणेकरुन आम्ही आरोग्यविषयक दुसर्‍या टोकावर जाऊन पोहोचू नये . त्याचबरोबर आज पाश्चिमात्य देशात तुम्हाला दिसतील समस्या हक्कांच्या - सोशल सिक्युरीटीची किंमत , मेडीकेअरची किंमत , मेडीकेडची किंमत यांविषयी . म्हणजेच एक तरुण राष्ट्र म्हणून , तुम्हाला परत संधी आहे एक आधुनिक वेतन यंत्रणा राबवायची . जेणेकरुन भविष्यात अशा हक्कांविषयी समस्या उद्भवू नयेत . आणि वरुन भारताला परवडणार नाही आपलं वातावरण खराब करणं कारण त्याला वातावरण आणि विकास यांचा मेळ घालायचा आहे . तुमच्या माहितीसाठी , जगासाठी मर्यादा आहे काही २० गिगाटन्स प्रतिवर्षी इतकी . नऊ अब्ज लोकसंख्येसाठी आपलं सरासरी वार्षिक कार्बन उत्सर्जन असलं पाहिजे साधारण दोन टन . भारत अगोदरच वार्षिक दोन टनपर्यंत पोचला आहे . पण जर भारत आठ- एक टक्क्यानं वाढत राहिला , तर दरडोई वार्षिक उत्पन्न १६ पट वाढेल २०५० पर्यंत . तर आम्ही म्हणतोय की , उत्पन्न १६ पटीनं वाढेल आणि कार्बन अजिबात न वाढता . म्हणूनच आम्हाला मुळातूनच फेरविचार करावा लागेल आमच्या पर्यावरणविषयक दृष्टीकोनाचा , ऊर्जाविषयक दृष्टीकोनाचा , विकासाचे आराखडे बनवण्याच्या एकंदर दृष्टीकोनाचा . आता याचा तुमच्याशी काय संबंध ?

(src)="7"> १६ गुना आय और कार्बन में कोई विकास नहीं . इसलिए हम मौलिक रूप से पर्यावरण पर पुनर्विचार करेंगे , जिस तरह से हम ऊर्जा को देखते हैं , जिस तरह से हम विकास के पूरे नए मापदंड बनाते हैं . अब यह आप के लिए महत्वपूर्ण क्यों है ? क्यों १० हजार मील दूर से आपको फर्क पड़ता है ? सबसे पहले , इस वजह से यह एक अरब से अधिक लोगों का प्रतिनिधित्व करता है . एक अरब लोग , विश्व की जनसंख्या का १/ ६ . यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह एक लोकतंत्र है . और यह साबित करना महत्वपूर्ण है कि विकास और लोकतंत्र असंगत नहीं हैं , कि आप एक लोकतंत्र में , एक खुले समाज में , विकास कर सकते हैं . यह महत्वपूर्ण है क्योंकि अगर आप इन समस्याओं को सुलझा पाते हैं , आप दुनिया में गरीबी की समस्याओं को हल कर सकते हैं . यह महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया की पर्यावरण समस्याओं को हल करने के लिए इसकी जरूरत है . यदि हम वास्तव में एक बिंदु पर आना चाहते हैं , हम वास्तव में अपने कार्बन उत्सर्जन पर रोक लगाना चाहते हैं , हम वास्तव में ऊर्जा का उपयोग कम करना चाहते हैं - यह भारत जैसे देशो में हल किया जाना है . आप अगर विकास को देखो पश्चिम में २०० से अधिक वर्ष , औसत विकास दर दो प्रतिशत के बराबर रही होगी . यहाँ हम आठ से नौ प्रतिशत पर बढ़ रहे देश के बारे में बात कर रहे हैं . और वह एक बड़ा फर्क है . जब भारत ३- ३ . ५ प्रतिशत पर बढ़ रहा था और जनसंख्या दो प्रतिशत से , इसकी प्रति व्यक्ति आय हर ४५ साल में दोगुनी हो रही थी . जब आर्थिक विकास आठ प्रतिशत चला जाता है और जनसंख्या वृद्धि १ . ५ प्रतिशत पर गिरता है , तो प्रति व्यक्ति आय हर नौ साल में दोगुनी होती है . दूसरे शब्दों में , आप निश्चित रूप से तेजी से अग्रेषण कर रहे हैं पूरी प्रक्रिया को एक अरब लोगों की समृद्धि में जाने की . और आप के पास एक स्पष्ट रणनीति होनी चाहिए जो दुनिया के लिए और भारत के लिए महत्वपूर्ण है . यही कारण है कि मुझे लगता है कि आप सभी को इसके साथ समान रूप से चिंतित होना चाहिए , जैसे मैं हूँ . बहुत बहुत धन्यवाद .
(trg)="10"> १० हजार मैलांवर घडणार्‍या या सर्वाचा तुमच्याशी काय संबंध ? एक , संबंध आहे कारण एक अब्जाहून अधिक लोकांशी हे निगडीत आहे . एक अब्ज लोक , जगाच्या लोकसंख्येच्या एक षष्टांश . संबंध आहे , कारण इथं लोकशाही आहे . आणि हे सिध्द करणं महत्त्वाचं आहे की विकास व लोकशाही विजोड नाहीत , की तुम्ही लोकशाही राबवू शकता , की तुम्ही मुक्त समाजव्यवस्थेत राहू शकता , आणि तरीही तुम्ही विकास साधू शकता . हे महत्त्वाचं आहे , कारण जर तुम्ही या समस्यांचं निराकरण केलंत तर तुम्ही दारिद्र्याच्या जागतिक समस्येचं निराकरण करु शकता . हे महत्त्वाचं आहे कारण त्याची तुम्हाला गरज आहे जागतिक पर्यावरण समस्या सोडवण्यासाठी . जर आपल्याला खरंच निष्कर्षाप्रत यायचं असेल , जर आपल्याला खरंच कार्बन उत्सर्जनावर नियंत्रण ठेवायचं असेल . आपल्याला खरंच ऊर्जेचा वापर कमी करायचा असेल . अशा समस्या भारतासारख्या देशांमध्ये सोडवल्या गेल्या पाहिजेत . तुम्हाला माहित्येय , विकासाकडं एक नजर टाकली तर पश्चिमेकडं २०० वर्षांमध्ये , सरासरी विकासदर साधारण दोन टक्के असेल . इथं आपण अशा देशांबद्दल बोलतोय जे आठ ते नऊ टक्क्यानी प्रगती करत आहेत . आणि त्यामुळं याचं महत्त्व खूप जास्त आहे . जेव्हा भारताचा विकासदर होता तीन , साडेतीन टक्के आणि लोकसंख्या वाढत होती दोन टक्क्यांनी , तेव्हा त्याचं दरडोई उत्पन्न दर ४५ वर्षांनी दुप्पट होत होतं . जेव्हा आर्थिक वाढ आठ टक्क्यांवर जाते आणि लोकसंख्या वाढीचा दर उतरतो दीड टक्क्यांपर्यंत , तेव्हा दरडोई उत्पन्न दुप्पट होतं दर नऊ वर्षांनी . थोडक्यात , जलदगतीवर जाते ही संपूर्ण प्रक्रीया एक अब्ज लोकांच्या संपन्नतेकडं जाण्याची . आणि तुमचं धोरण स्पष्ट असायला हवं , जे महत्त्वाचं आहे भारतासाठी आणि जगासाठी . म्हणूनच मला वाटतं की तुम्ही सर्वांनी लक्ष दिलं पाहिजे याकडं , माझ्याइतकंच . अतिशय आभारी आहे .

(src)="8"> ( अभिवादन )
(trg)="11"> ( टाळ्या )

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(src)="1"> चीनी भाषा का एक शब्द है " ज़ियांग " जिसका अर्थ होता है अच्छी गंध यह किसी फूल , भोजन या ऐसी किसी भी चीज़ का वर्णन कर सकता है लेकिन यह हमेशा चीज़ों का सकारात्मक वर्णन होता है इसका मंदारिन के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा में अनुवाद करना कठिन है हमारे पास फ़िजी- हिंदी भाषा का एक शब्द है जिसे " तालानोआ " कहते हैं वास्तव में यह वह अनुभव है , जो आपको शुक्रवार देर रात में होता है , अपने मित्रों से घिरे हुए मंद हवा से गुज़रते हुए , लेकिन यह केवल इतना ही नहीं है , यह छोटी सी बातचीत का एक तरह का जोशपूर्ण और मित्रवत संस्करण है हर उस चीज़ के बारे में जो आपके दिमाग में आ सकती है एक यूनानी शब्द है , " मेराकी " जिसका अर्थ अपनी आत्मा , अपने संपूर्ण अस्तित्व को उस कार्य में लगाना है जो आप कर रहे हैं , चाहे वह आपका शौक हो या आपका कार्य हो आप जो भी कर रहे हैं , आप उसे प्यार से कर रहे हैं लेकिन ये उन सांस्कृतिक चीजों में से एक है , जिनका मैं कभी भी अच्छा अनुवाद नहीं कर पाया/ पाई
(trg)="1"> चीनीमध्‍ये " Xiang " एक शब्‍द आहे त्‍याचा अर्थ ते सुवासिक आहे ते एक फूल , खाद्यपदार्थ , खरोखर काहीही वर्णन करू शकते परंतु गोष्‍टींचे ते नेहमी एक सकारात्‍मक वर्णन करते मंदारीन व्‍यतिरिक्त कशामध्‍येही अनुवाद करणे कठीण आहे आमच्‍याकडे या शब्‍दास फिजी- हिंदीमध्‍ये " तलानोआ " म्‍हणतात खरोखर आपल्‍याला शुक्रवारी रात्री , ऊशीरा आपल्‍या मित्रांच्‍या सान्निध्‍यात मंद वार्‍यात शूटिंग करत असल्‍यासारखे वाटते , परंतु ते तसे नाही , आपण चौकटीबाहेर ज्‍या सर्व गोष्‍टींचा विचार करू शकता त्‍याबद्दल ही गप्पागोष्‍टींची उबदार आणि मित्रत्‍वाचे स्‍वरूप आहे
(trg)="2"> " मेराकी " या ग्रीक शब्‍दाचा अर्थ खरोखर आपला आत्‍मा , आपले सर्वस्‍व आपण जे काही करत आहात त्‍यामध्‍ये ठेवणे मग एकतर ती आपली आवड असेल किंवा आपले कार्य असेल आपण ज्‍यासाठी करता त्‍यासाठी ते प्रेमाने करता परंतु हे त्‍या सांस्‍कृतिक गोष्‍टींपैकी आहे , ज्‍यामध्‍ये मी कधीही चांगल्‍या अनुवाद करण्‍यास सक्षम नाही

(src)="2"> " मेराकी , " जुनून के साथ , प्यार के साथ आपके शब्द , आपकी भाषा , कहीं भी 70 से अधिक भाषाओं में लिखें
(trg)="3"> " मेराकी , " तळमळीने , प्रेमाने

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(src)="1"> ( यांत्रिक शोर ) ( संगीत )
(trg)="1"> ( यांत्रिक आवाज ) ( संगीत )

(src)="2"> ( तालियाँ )
(trg)="2"> ( टाळ्यांचा गजर )

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(src)="1"> कुछ वर्षों पहले मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी उदास दिनचर्या में फंसा हुआ था , इसलिए मैंने महान अमेरिकन दार्शनिक ; म़ोरगन स्परलोंक के दिखाए रास्ते पर चलने का फैसला किया , और 30 दिनों तक कुछ नया करने का प्रयास किया | यह विचार बहुत ही सरल है | ऐसे किसी चीज के बारे में सोचिये जिसे आप हमेशा अपने जीवन में करना चाहते थे और उसे अगले 30 दिनों तक करने का प्रयास कीजिये | यह पता चला है कि 30 दिन पर्याप्त समय है , कोई नयी आदत डालने या किसी आदत को छुड़ाने के लिए अपने जीवन में से -- जैसे कि समाचार देखना | इस 30 दिन की चुनौतियों के दौरान मैंने कुछ बातें सीखी हैं | पहला था कि , बजाय इसके के महीने यूँ ही भूलते हुए गुजर जाएँ वह समय बहुत ज्यादा यादगार था | यह उस चुनौती का एक हिस्सा था जिसमे प्रतिदिन मैंने एक फोटो ली और मुझे याद है मैं उस दिन कहाँ था और क्या कर रहा था | मैंने यह भी पाया कि जैसे जैसे मैं 30 दिनों की कठिन चुनौतियों को अपनाने लगा मेरा आत्म विश्वास बढ़ता गया | मैं एक कंप्यूटर पर काम करके कुर्सियां तोड़ने वाले बेवकूफ से एक ऐसा आदमी बना जो साइकल से काम पर जाता है मजे करने के लिए | यंहा तक की पिछले साल मैं किलिमंजारो अफ्रीका में उच्चतम पर्वत पर पैदल चढ़ा | मैं कभी इतना उत्साही नहीं था मेरी इस 30 दिन की चुनौतियों को प्रारंभ करने से पहले मुझे यह भी पता चला कि यदि आप किसी चीज को पाने की दिली तमन्ना रखते हो तो आप उसे 30 दिन में कर सकते हो | क्या कभी आपने एक उपन्यास लिखने के बारे में सोचा है ? हर नवम्बर में हजारों लोग 50 , 000 शब्दों का उपन्यास 30 दिनों में लिखने का प्रयास करते हैं | होता यह है कि आप को एक दिन में 1 , 667 शब्द एक महीने तक लिखने होते हैं | तो मैंने किया | वैसे राज की बात यह है कि तब तक सोने नहीं जाना होता था जब तक आप एक दिन के शब्दों को पूरा नहीं लिख लेते | आप को शायद सोने न मिले पर आप अपनी उपन्यास पूरी कर लेंगे | अब क्या मेरी किताब अमेरिका की अगली प्रसिद्ध उपन्यास होगी ? बिलकुल नहीं , मैंने इस एक माह में लिखा है | यह बहुत ही ख़राब है | पर मैं अपनी पूरी जिंदगी में , अगर जॉन होगमैन से TED पार्टी में मिलता हूँ , तो मुझे यह नहीं कहना होगा कि
(trg)="1"> काही वर्षांपूर्वी , मला जाणवले की मी चाकोरीबद्ध जीवन जगतोय , म्हणून मी थोर अमेरिकन विचारवंत मॉर्गन स्परलॉक ह्यांच्या पावलांवर पाऊल ठेवून चालायचे ठरविले , म्हणून मी थोर अमेरिकन विचारवंत मॉर्गन स्परलॉक ह्यांच्या पावलांवर पाऊल ठेवून चालायचे ठरविले , आणि ३० दिवस काहीतरी नवीन करायचे ठरविले . कल्पना अगदी साधी सोपी आहे . आयुष्यात नेहमीच कराव्याश्या वाटलेल्या कुठल्यातरी गोष्टीचा विचार करा आणि पुढचे ३० दिवस ती करायचा प्रयत्न करा . असा आहे की , ३० दिवस हा अगदी बरोबर कालावधी आहे तुमच्या आयुष्यात नवीन सवय लावून घेण्यासाठी किंवा जुनी सवय सोडण्यासाठी -- उदाहरणार्थ बातम्या पाहणे . तुमच्या आयुष्यात नवीन सवय लावून घेण्यासाठी किंवा जुनी सवय सोडण्यासाठी -- उदाहरणार्थ बातम्या पाहणे . तुमच्या आयुष्यात नवीन सवय लावून घेण्यासाठी किंवा जुनी सवय सोडण्यासाठी -- उदाहरणार्थ बातम्या पाहणे . ही ३० दिवसांची आव्हाने पेलवताना मी काही गोष्टी शिकलो . पहिली गोष्ट म्हणजे , महिनोन महिने असेच विस्मृतीत जाण्यापेक्षा , हा काळ अधिक संस्मरणीय होता . महिनाभर रोज एक छायाचित्र काढण्याच्या आव्हानाचा हा एक भाग होता . आणि मला व्यवस्थित आठवतेय की मी कुठे होतो आणि त्या दिवशी काय करत होतो . माझ्या हे पण लक्षात आले की जसजशी मी आणखी आणि अधिक कठीण ३०- दिवसांची आव्हाने स्विकारण्यास सुरुवात केली तसा माझा आत्मविश्वास वाढला . माझे रुपांतर मेजाला चिकटलेल्या संगणकी किड्यातून फक्त मजेसाठी सायकलने कामावर जाणाऱ्या व्यक्तीमध्ये झाले . फक्त मजेसाठी सायकलने कामावर जाणाऱ्या व्यक्तीमध्ये झाले . मागच्या वर्षी तर मी आफ्रिकेतील सर्वात उंच पर्वत - किलीमंजारो - सर केला . मागच्या वर्षी तर मी आफ्रिकेतील सर्वात उंच पर्वत - किलीमंजारो - सर केला . ही ३०- दिवसांची आव्हाने सुरु करण्यापूर्वी मी कधीच एवढा धाडसी नव्हतो . ही ३०- दिवसांची आव्हाने सुरु करण्यापूर्वी मी कधीच एवढा धाडसी नव्हतो . मला असाही उलगडा झाला की तुम्हाला अगदी मनापासून काही हवे असेल , तर तुम्ही ३० दिवस काहीही करू शकता . तुम्हाला कधी कादंबरी लिहावीशी वाटली ? दर वर्षी नोव्हेंबर मध्ये , हजारो लोक त्यांची स्वतःची ५०००० शब्दांची कादंबरी अगदी सुरुवातीपासून लिहायचा प्रयत्न करतात , ३० दिवसांमध्ये . तसं पाहिलं तर , तुम्हाला फक्त प्रत्येक दिवशी १६६७ शब्द लिहायचे असतात , एक महिनाभर . मी ते केले . आणि गुपित असं आहे की , झोपायचंच नाही तुम्ही त्या दिवसाचे सगळे शब्द लिहिले नाहीत - तोपर्यंत . शक्य आहे की तुमचा निद्रानाश होईल . पण तुम्ही कादंबरी नक्की लिहून पूर्ण कराल . आता माझं पुस्तक काय पुढची थोर अमेरिकन कादंबरी आहे का ? नाही . मी ती एका महिन्यात लिहिली . ती अतिशय वाईट आहे . पण माझ्या उर्वरित आयुष्यात , जर मी जॉन हॉजमन यांना टेडच्या एखाद्या पार्टीत भेटलो तर , मला असं म्हणावं लागणार नाही की ,

(src)="2"> " मैन एक कंप्यूटर वैज्ञानिक हूँ | " नहीं अगर मुझे कहना होगा तो मै कह सकता हूँ कि " मैं एक उपन्यासकार हूँ " ( हंसी ) एक आखरी बात जो मैं बताना चाहूँगा | इससे मैंने यह सिखा कि जब मैंने छोटे , कायम रहने वाले परिवर्तन किये ऐसे कार्य जो मैं करते रह सकता था , उनकी हमेशा साथ रहने की संभावना बहुत अधिक होती है बड़ी चुनौतियों को अपनाने में कोई गलत बात नहीं है उसमे तो ज्यादा मजा है | पर उनके हमेशा सांथ रहने की संभावना कम होती है | जब मैंने शक्कर 30 दिनों के लिए छोड़ी तब इकतीसवां दिन कुछ ऐसा था | ( हंसी ) तो मेरा सवाल आप लोगों से यह है कि : आप किस बात का इंतजार कर रहे हो ? मेरा विश्वास कीजिये 30 दिन यूँ निकल जायेंगे चाहे आप उसे पसंद करें या ना करें तो क्यों ना कुछ सोचा जाये जो आप हमेशा करना चाहते थे और उसे अगले 30 दिनों तक करने का प्रयास करते हैं | धन्यवाद ( अभिवादन )
(trg)="2"> " मी एक संगणक शास्रज्ञ आहे . " नक्कीच नाही , मला वाटलं तर मी म्हणू शकेन की ´मी एक कादंबरीकार आहे . "
(trg)="3"> ( हशा ) मला सांगायला आवडेल अशी शेवटची गोष्ट म्हणजे मी शिकलो की , जेव्हा मी छोटे , चालू ठेवण्याजोगे बदल केले , जे मी नेहमी करू शकत होतो , तेव्हा ते बहुतेककरून टिकून राहिले . मोठ्या किंवा विक्षिप्त आव्हानांमध्ये चुकीचे काहीच नाही . खरंतर त्यांची मजाच काही और आहे . पण शक्यतो ती टिकणार नाहीत . जेव्हा मी ३० दिवस साखर वर्ज्य केली , एकतिसावा दिवस असा होता .
(trg)="4"> ( हशा ) माझा तुम्हाला प्रश्न असा आहे : तुम्ही कशाची वाट पाहताय ? मी हमी देतो की पुढचे ३० दिवस कोणासाठी थांबणार नाहीत तुम्हाला आवडो या नावडो , मग तुम्हाला नेहमीच कराव्याश्या वाटणाऱ्या गोष्टीचा विचार करायला काय हरकत आहे . मग तुम्हाला नेहमीच कराव्याश्या वाटणाऱ्या गोष्टीचा विचार करायला काय हरकत आहे . आणि पुढचे ३० दिवस त्यासाठी प्रयत्न करून बघा . आणि पुढचे ३० दिवस त्यासाठी प्रयत्न करून बघा . धन्यवाद .

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(src)="1"> ( तालियां ) मेरा नाम आयशा चौधरी है और मैं पंद्रह वर्ष की हूं | मैं एक इम्यून डेफिशियेंसी के साथ पैदा हुई थी , और सिर्फ एक वर्ष तक नेरे जीवित रहने की उम्मीद हुई थी | छह माह की उम्र में मुझे बोने मेरो ट्रांसप्लांट ( अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण ) से गुजरना पड़ा | हाल ही में मुझे पलमोनरी फाइब्रोसिस नाम की गंभीर बीमारी ने घेर लिया है |इस बीमारी में फेफड़ा करा हो जाता है | यह ट्रांसप्लांट का साइड इफ़ेक्ट है | बेमारियों की वजह से मेरी जिंदगी चुनौतियों से परिपूर्ण है | मैंने कई बार महसूस किया है कि मैं किसी डूबते जहाज के बीच में बैठी हूं | आज मैं आपसे जिंदगी की पांच ज़रूरी सीख के बारे में बोलूंगी , जिन्हें मैंने अपनी जीवन के उतार- चढाव से सीखा है | पहली सीख है , चमत्कार मैं विश्वास करना | चमत्कार अच्छी चीजें हैं जीके होने की सम्भावना काफी कम होती है | दस लाख में एक संभावना थी कि मैं इम्यून डेफिशियेंसी पैदा होउंगी | मेरे साथ ऐसा हुआ | लेकिन तभी एक चमत्कार हुआ | इस बात कि सिर्फ तीस प्रतिशत सम्भावना थी कि मैं बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद बच पाऊँगी | मैं बच गई | इस बात की सिर्फ दस प्रतिशत संभावना थी कि मैं बॉन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद बच पाऊंगी | मैं बच गई | और अब केवल चालीस प्रतिशत उम्मीद है कि मेरा फेफड़ा ठीक होगा | लेकिन मैं विश्वास रखती हूँ कि ऐसा हो सकता है , क्योंकि मैं चमत्कार में यकीन करती हूँ | ( तालियां ) दूसरी सीख जो मुझे मिली वह यह है कि , आपको हमेशा उस ही पल में जीना चाहिए | यह मेरी छह महीने की तस्वीर है | आप देख सकते हैं कि मेरी नाक में एक ऑक्सीजन ट्यूब लगा है | इन सब के वावजूद मेरे चेहरे पर बड़ी मुस्कान है | यह सब इसलिए है क्यूंकि मैंने अपने नए पप्पी ( पालतू कुत्ता ) रोलो को गोद में ले रखा है | जब भी मैं उसे गले से लगाती हूं , खुशियों से भर जाती हूं | सभी दर्द और निराशा जो कि काफी , पुरजोर प्रतीत होती है उस एक पल में पिघल सी जाती है | अगर आप सामने पड़ी जिंदगी की ओर देखेंगे तो आप उन अंतहीन समस्याओं को पाएँगे जिनसे आखिरकार आपको झूझना है | लेकिन , अगर आप जिंदगी को दिन ब दिन , घंटा दर घंटा या पल - प्रतिपल देखेंगे तो आप पाएँगे की आपकी खुशिया कई गुना बढ़ने लगी है | जब मैं बिस्तर पर पढ़ी थी और हिलने या स्कूल जाने भी सक्षमनहीं थी , तो मैंने उन चीजों के बारे में जोर देकर सोचा जिन्हें मैं कर सकती थी | मैं बैठ सकती थी और अपने चेहरे पर मुस्कराहट लाने में सफल होती थी | मैं एक मॉडल बनना चाहती थी | मैं यह देखने कि इच्छा थी कि , कैसे होगा जब मेरी तसवीरें कहीं बाहर लगी होंगी | आप इस तस्वीर में देख सकते हैं कि , इसके वावजूद कि मैं उस व्हीलचेयर पर बैंठी हूँ और ऑक्सीजन ले रही हूँ . जैसे ही मैं वहां बैठी और कैमरे के लिए पोज दिया , मैंने उन हर बात को भुला दिया जिन्हें मैं नहीं कर सकती थी | यह मेरे लिए एक आनंदायक काम था | यह देखना बेहतरीन था कि एक फोटो शूट में क्या होता है | मैंने सीखा कि आपको वह करना चाहिए जो आप कर सकते है , न कि उन बातों के बारे में सोच कर अफ़सोस करना चाहिए जिसे आप करने में सक्षम नहीं हैं | तीसरी सीख मुझे मिली की अवसर हमेशा हासिल किया जा सकता है | पिछले कुछ वर्षो से अपने दोस्तों की तरह मैं नियमित रूप से स्कूल जाने में सक्षम नहीं हूं | और इस वर्ष मैं विषय के तौर पर गणित और कला का चयन किया है | मुझे काफी खाली समय मिल रहा है | लेकिन इस मुश्किल समय में मैंने कला के प्रति अपने जुनून को जारी रखने के लिए अवसर हासिल करने में सफलता पाई है | वास्तव में मैंने पाया कि बीमारी के समय में मैंने स्वस्थ दिनों की तुलना में ज्यादा स्केच और पेंट किये है | इस स्लाइड में दो कलाकृति हैं जिसे मैंने हाल ही में पूरा किया है | यह एक बच्चे की तस्वीर है | इसे हलके रंग से बनाया गया है | यह वास्तव में एक फोटो से लिया गया है , जिसे मैंने पारिवारिक कार्यक्रम के दौरान लिया था | दाई ओर एक कृति है जिसे मैंने अपने भाई द्वारा कम्पोज किये गए संगीत के एल्बम आर्ट के तौर पर बनाया है और उसके गाने का नाम , ´ द्रौजी एलीफैंट ( उंघते हुए हाथी ) है | मेरे लिए चौथी सीख यह है कि कभी सपने देखना न भूलें | यह व्हील चेयर पर मेरी तस्वीर है | यह तब कि है जब मैं दो कदम भी नहीं चल सकती थी | हर रात , मैं सपने देखती | मैं वोह कल्पना करती जो काफी छोटी चीजें प्रतीत हो सकती हैं | मैं लन्दन में दोस्तों के साथ खुद को बाजार में टहलने की कल्पना करती | अपने कजन कि शादी में खुद को बाजार में टहलने कि कल्पना करती | मैं चीजो की सुक्तम स्तर कल्पना करती थी | मेरे कपडे का रंग क्या होगा , किस गाने पर मैं नाचूंगी स्टेज कैसा होगा और मेरे परिवार के सदस्य जशन मना रह होंगे | मैं बगीचे में अपने दो कुत्तो के साथ दौड़ने का सपना देखती | मैं दुआ करती थी कि मै इस व्हील चेयर से उठ पाऊँ और अपने बाथरूम तक खुद चल कर जाऊं | मैं अपने दिमाग में उन हर चीजों का मूवी प्ले करती थी जो उस पल में पूरी तरह असंभव दिखती थी | और अनुमान लगाइये क्या हुआ ? मैं अपने दोस्तों के साथ लन्दन में बाजार में टहली | और मैं अपने कजिन कि शादी में नांची | और मैं व्हील चेयर से उठी | और मैं आपसे बात करने के लिए यहाँ खड़ी हू | दिमाग की शक्ति असीमित है | याद रखे , हर चीज दो बार होती है | एक बार आपके दिमाग में और एक बार वास्तविकता में | ( तालीयां ) आखिर में वह आखरी सीख जो मैंने सीखी वह यह है कि अगर हर चीज विफल होती दिखे तो एक कुत्ता पालें | पालतू जानवर सच में अच्छी दवा है | मैंने पाया कि कोबी जो कि एक लैब्राडोर है मेरी स्थति के प्रति काफी सहानुभूति रखता था | पिछले जनवरी में जब मैं चलने में असमर्थ थी कोबी खुद काफी बीमार हो गया | उसके पैर लड़खड़ाते थे और वह चल नहीं पाता था | मुझे महसूस हुआ कि मैं जिस दुःख से गुजर रही थी वह उसकी नक़ल कर रहा था | मैं उसे इस रूप में देखकर काफी परेशान हो गई थी | और सोचने लगी थी उसके साथ कुछ बुरा हो जाएगा | मैंने कोबी से चलने की आग्रह किया | मैंने उससे कहा कि अगर वह ऐसा करेगा तो में भी कुछ कदम चलने की कोशिश करूंगी | अगले सप्ताह तक कोबी ठीक हो गया और मेरे चारों ओर ख़ुशी से दौड़ने लगा | मैं उसे इस तरह देखकर काफी खुश हुई | क्यूंकि मैं दिल से यह जानती थी कि मैं भी एक दिन उसी तरह ठीक हो जाऊँगी जैसे कोबी हुआ | इसलिए जैसा कि हम जानते है , जिंदगी में कुछ न कुछ हमेशा होता है, गुनगुनाने के लिए | कुछ ऐसा होता है जिसे प्रति आभारी हुआ जा सकता है | मैं मुझे काफी प्यार करने वाले अपने पारिवार , दोस्तों , कुत्तो के प्रति आभारी हूँ | वास्तव में मैं उन चुनौतियों कि भी आभारी हूं जिन्हें जिंदगी ने मेरे सामने पेश किया है | इन चुनौतियों के बिना ऐसा नहीं हो पाता | और मुझे यह याकिन है कि मेरी आत्मा में कोई इन्द्रधनुष नहीं बनता अगर मेरी आखों में आंसू नहीं होते | मुझे सुनने के लिए बहुत- बहुत धन्यवाद | ( तालियां )
(trg)="1"> ...........

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(src)="1"> अब , यदि राष्ट्रपति ओबामा मुझे गणित का राजा बनने के लिये आमंत्रित करें तब मेरे पास उनके लिये एक सुझाव होगा जो कि मैं सोचता हूँ कि इस देश में गणित की शिक्षा को बहुत उन्नत बना देगा और इसको कार्यान्वित करना सुलभ है और कम खर्च वाला भी । गणित का जो पाठ्यक्रम हमारे यहाँ है , वह अंकगणित और बीजगणित की नीँव पर आधारित है और उसके बाद जो भी हम सीखते हैं वह उत्तरोत्तर एक ही विषय की ओर बढ़ता है । और उस पिरामिड के शिखर पर है - कैलकुलस ( समाकलन ) और मैं यहाँ यह कहता हूँ कि मेरे विचार से यह पिरामिड का ग़लत शिखर है । सही शिखर - जो छात्रों को , हर एक माध्यमिक शिक्षा स्नातक छात्र को जानना चाहिये वह - सांख्यिकीय होना चाहिये । संभावना- विज्ञान और सांख्यिकीय । ( तालियोँ की गड़गड़ाहट ) मेरा मतलब , मुझे ग़लत मत समझें , समाकलन एक महत्वपूर्ण विषय है । यह मानव बुद्धि की महान उत्पत्तियों में से एक है । प्रकृति के नियमों का उल्लेख समाकलन की भाषा में किया जाता है , और वे सभी छात्र जो , गणित , विज्ञान , अभियांत्रिकी , अर्थशास्त्र विषयों का अध्ययन करते हैं , उन्हें अवश्य ही अपने स्नातक के प्रथम वर्ष की समाप्ति तक समाकलन को सीखना चाहिये । परंतु मैं यहाँ , गणित के आचार्य की हैसियत से कहता हूँ कि बहुत कम व्यक्ति वास्तविकता में समाकलन का प्रयोग सचेत , अर्थपूर्ण रूप में , दैनिक जीवन में करते हैं । दूसरी ओर , सांख्यिकीय -- एक ऐसा विषय जो आप दैनिक जीवन में कर सकते है , और करना चाहिये । ठीक है न ? यह जोखिम ( को समझने के बारे में ) है , यह ( संभावनाओं को समझने के बारे में ) है । यह प्रेक्षणों ( डाटा ) को समझने का विज्ञान है । मेरा विचार है कि यदि हमारे विद्यार्थियों , सभी माध्यमिक शिक्षा विद्यार्थियों हमारे सभी अमरीकी नागरिकों को संभावना और सांख्यिकीय का ज्ञान होता तो हम ( आज ) ऐसी बिगड़ी हुयी अर्थवयवस्था में न होते जैसे आज हम हैं । न केवल यह -- धन्यवाद -- न केवल यह ( अपितु ) यदि यह सही ढंग से पढाया जाय तब यह मनोरंजक भी हो सकता है । मेरा मतलब संभावना विज्ञान और सांख्यिकीय यह खेल और द्यूत ( जुए ) का गणित है । यह लक्षणॉं ( आँकलन ) के विश्लेषण के बारे में है , यह भविष्य के अनुमान के बारे में है । देखिये , विश्व परिवर्तित हो चुका है एनालॉग से डिजिटल में । और यह समय है हमारे गणित के पाठ्यक्रम के बदलने का एनालॉग से डिजिटल में । अपने शास्त्रीय ( प्रचलित ) , निरंतर की गणित के रूप से अधिक नवीन , अनिरंतर ( discrete ) गणित असंभावितता की गणित का प्रेक्षणों की अनियमितता का और संभावना विज्ञान और सांख्यिकीय का सारांश में यह कि हमारे विद्यार्थी , बजाय इसके कि , समाकलन की तकनीक सीखें , मैं सोचता हूँ कि यह अधिक महत्वपूर्ण होगा कि वे सभी यह जानें कि दो सामान्य विचलनों का , औसत से क्या अर्थ है । और मैं वास्तव में मेरा मतलब यह ही है । धन्यवाद । ( तालियोँ की गड़गड़ाहट )
(trg)="1"> आता , जर अध्यक्ष ओबामा यानी मला पुढचा " गणित सम्राट " केला , तर मी त्याना असा एक प्रस्ताव देईन जो मला वाटतं या देशातील गणित शिक्षणात फार मोठी सुधारणा घडवून आणेल . आणि त्याची अंमलबजावणी करणेही सोपे आणि स्वस्त असेल . आपल्या गणिताच्या अभ्यासक्रमाचा पाया अंकगणित आणि बीजगणित आहे . आणि त्यानंतर आपण जे जे काही शिकतो ते एकाच विषयाकडे घेऊन जाते . आणि त्या प्रसूचीचा शिरोबिंदू असतो , कलनशास्त्र . आणि मी हे सांगायला इथे आलोय की माझ्या मते तो या प्रसूचीचा चुकीचा शिरोबिंदू आहे ... योग्य शिरोबिंदू - जो आपल्या सर्व विद्यार्थ्याना , प्रत्येक माध्यमिक शाळा उत्तीर्ण झालेल्याला माहीत असायला हवा -- तो म्हणजे संख्याशास्त्र : संभाव्यताशास्त्र आणि संख्याशास्त्र .
(trg)="2"> ( टाळ्यांचा कडकडाट ) माझे मत चुकीच्या अर्थाने घेऊ नका . कलनशास्त्र हा महत्त्वाचा विषय आहे . मानवी मनातून निर्माण झालेल्या महान गोष्टींपैकी एक . निसर्गाचे नियम कलनशास्त्राच्या भाषेत लिहिलेले आहेत . आणि गणित , शास्त्र , अभियांत्रिकी , अर्थशास्त्र शिकणार्‍या प्रत्येक विद्यार्थ्याने कॉलेजचं पहिलं वर्ष पूर्ण व्हायच्या आत कलनशास्त्र नक्कीच शिकले पाहिजे . पण , गणिताचा प्राध्यापक म्हणून मी इथे हे सांगायला आलोय , की फार थोडे लोक वास्तवात कलनशास्त्र जाणीवपूर्वक , अर्थपूर्ण प्रकारे , रोजच्या आयुष्यात वापरतात . पण , संख्याशास्त्र -- हा असा विषय आहे जो तुम्ही रोज वापरू शकता आणि , वापरला पाहिजे . हो ना ?
(trg)="3"> ( संख्याशास्त्र म्हणजे ) धोका . बक्षीस . अनियमितता . माहिती समजून घेणे . मला वाटतं जर आपल्या विद्यार्थ्याना , आपल्या माध्यमिक शाळेतील विद्यार्थ्याना -- जर सर्व अमेरिकन नागरिकाना -- संभाव्यताशास्त्र आणि संख्याशास्त्र माहीत असतं , तर आपण आज ज्या आर्थिक विचक्यात आहोत त्यात अडकलो नसतो . इतकंच नाही -- धन्यवाद -- इतकंच नाही ... [ तर ] योग्य पद्धतीने शिकवल्यास , ते आनंददायी होऊ शकते . मला असं म्हणायचंय , संभाव्यताशास्त्र आणि संख्याशास्त्र , म्हणजे खेळ आणि जुगाराचं गणित . कलाचा बारकाईने अभ्यास . भविष्याचे भाकीत . बघा , जग बदललंय एनलॉग पासून डिजिटल झालंय . आणि वेळ आली आहे आपला गणिताचा अभ्यासक्रम एनलॉग पासून डिजिटल होण्याची . पारंपारीक , सलग गणितापासून , अधिक आधुनिक , सुट्या पृथक गणिताकडे . अनिश्चिततेचं गणित , अनियमिततेचं , माहितीचं गणित -- आणि ते म्हणजे संभाव्यताशास्त्र आणि संख्याशास्त्र . सारांश असा की , आपल्या विद्यार्थानी कलनशास्त्राचे तंत्र शिकण्याऐवजी , मला वाटतं , त्या सर्वांना मध्यापासून प्रमाणित विचलनाचे दोन प्रकार कोणते ते कळणं हे जास्त महत्त्वाचं ठरेल . आणि माझ्या म्हणण्याचा हाच अर्थ आहे . धन्यवाद .

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(src)="1"> हम मनुष्यों ने हज़ारों सालों से जाना है , हमारे आस- पास के वातावरण को देखकर , कि यहां अन्य पदार्थ होते हैं| इन विभिन्न पदार्थों के अन्य गुण होते हैं| न केवल इनके पास अन्य गुण होते हैं , कुछ निश्चित तरीके से प्रकाश को दर्शाते हैं भी , और नहीं भी| या एक निश्चित रंग या तापमान के हों ; ठोस , द्रव या गैस हो किन्तु हम यह भी अवलोकन करने लगते हैं , कैसे वह कुछ निश्चित परिस्थितियों में एक दूसरे के साथ प्रतिक्रिया करते हैं| यहाँ कुछ पदार्थों की तस्वीरें हैं| यह हैं कार्बन ( C ) , अपने ग्रेफाइट के रूप में| यह हैं लीड ( Pb ) और यह है गोल्ड ( Au )
(trg)="1"> मानवाला आपल्या भोवतालच्या वातावरचे निरीक्षण करून हजारो वर्षापूर्वीपासून लक्षात आले आहे कि पृथ्वीवर विभिन्न प्रकारची मूलद्रव्ये आहेत आणि हि वेगवेगळी मूलद्रव्ये वेगवेगळे गुणधर्म दर्शवितात इतकेच नव्हे एखादे मूलद्रव्य विशिष्ट प्रकारे प्रकाश परावर्तीत करतो तर एखादा करतच नाही किवा मुल्द्रव्याला एक विशिष्ट रंग किंवा तापमान असते ते द्रव, वायू किंवा धातू रुपात असते शिवाय ते विशिष्ट परिस्थितीत एकमेकांशी कसे क्रिया करतात हेही आपल्याला पाहायला मिळते आणि हि काही मूलद्रव्यांची छायाचित्रे आहेत हा इथे कार्बन आहे , आणि इथे तो ग्राफाईट रुपात आहे आणि हे इथे आहे शिसे , आणि इकडे सोनं पाहू शकता ह्या सर्वांची चित्रे तुम्ही इथे पाहू शकता मला हे सर्व ह्या वैबसाईटवरून मिळाले आहेत हि मूलद्रव्ये त्यांच्या धातुरुपात आहेत असं वाटते कि त्याच्या विशिष्ट प्रकारची हवा आहे एका विशिष्ट प्रकारचे वायुकण आणि तुम्ही कोणत्या प्रकारचे वायुकण पाहत आहात , ते कार्बन आहे कि ओक्सिजन आहे कि नायट्रोजेन त्या सर्वांचे गुणधर्म वेगवेगळे असतात किंवा काही मूलद्रव्य द्रव स्वरुपात बदलतात जेंव्हा आपण त्याचं तापमान एका विशिष्ट मर्यादेपलीकडे वाढवितो जर सोने आणि शिशाचे तापमान पुरेसे वाढविले तर तुम्हाला ते द्रवरुपात मिळतिल आणि जर तुम्ही ह्या कार्बनला जाळलत तर तर तो वायुरूपात जाईल तो वातावरणात मुक्त होईल अशाप्रकारे तुम्ही त्याची रचना बदलू शकता तर हे सर्व माणूस पुरातन काळापासून पाहत आला आहे पण इथे एक प्रश्न उभा राहतो जो कि एक तात्विक प्रश्न आहे पण ज्याचे उत्तर आता आपण देऊ शकतो तो म्हणजे , जर आपण कार्बनचे सूक्ष्म सूक्ष्म तुकडे करत गेलो तर आपल्याला जो सुक्ष्मादि सूक्ष्म कण मिळेल त्याचे गुणधर्म कार्बनसारखेच असतील का ? आणि एखाद्या मार्गाने तुम्ही त्या कणाचे आणखी बारीक कणात रुपांतर केले तर तो कण कार्बनचे गुणधर्म गमावून बसेल काय ? आणि ह्याचे उत्तर आहे होय

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(src)="1"> देवियों और सज्जनों , TED में हम नेतृ्त्व और आंदोलन करने पर काफी चर्चा करते हैं . तो चलिए एक मुहिम को बनते देखते हैं , शुरु से अंत तक , तीन मिनट से भी कम समय में , और इससे कुछ सीखते हैं . सबसे पहले , आप बखूबी जानते हैं , कि एक नेता में वो बात होनी चाहिए कि वो सबसे अलग कुछ कर सके और अपना उपहास होता भी देख सके . लेकिन जो कुछ उसने शुरू किया , उसका अनुसरण करना आसान है . तो ये आया उसका पहला अनुगामी , जिसकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है . अब वो बाकी सभी को सिखाएगा कि अनुसरण कैसे करना है . अब देखिए नेता कैसे उसे अपने समान दर्जा देकर गले लगाता है . तो अब ये मुहिम केवल नेता की नहीं रही , ये उन दोनों की है , बहुवचन बन गई है . अब ये अपने दोस्तों को बुलाने लगा है . अगर आप ध्यान से देखें तो पहला अनुगामी असल में नेतृ्त्व का ही कुछ कमतर आंका हुआ स्वरूप है . इस तरह आगे बढ़कर साथ देने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए . पहला अनुयायी वह ऐसा व्यक्ति है जो एक अकेले सनकी को नेता बना देता है .
(trg)="1"> सभ्य स्त्री- पुरुषहो , या TED मंचावर आपण अनेक वेळा , नेतृत्वगुण आणि चळवळीची सुरुवात यावर चर्चा करतो . चला तर मग , एक चळवळ पाहू , सुरुवातीपासून शेवटपर्यंत , तीन मिनिटांच्या आत . आणि त्यातून काही धडे मिळवू . सर्वप्रथम तुम्हाला माहितच आहे की एका नेत्याकडे धाडस असावं लागतं , गर्दीत उठून दिसण्यासाठी आणि स्वतःचं हसं करून घेण्यासाठी ! पण तो जे काही करत आहे त्याचं अनुकरण करणं खूप सोप्पं आहे . तेंव्हा हा पहा आला , अतिशय महत्वाचा कार्यभाग असणारा त्याचा पहिला अनुयायी . तोच सर्वांना दाखवून देणार आहे की चांगला अनुयायी कसे व्हावे . आता लक्षात घ्या की नेता त्याला स्वतःच्या बरोबरीचं स्थान देतो . तेंव्हा हे आता एकट्या नेत्याचं कार्य राहिलं नसून ते त्यांचं ( दोघांचं ) झालं आहे . आता पहा , तो त्याच्या मित्रांना बोलावत आहे . जर तुम्ही नीट पाहाल तर पहिला अनुयायी हा खरंतर छुप्या नेतृत्वगुणाचे एक उदाहरण आहे . असं वेगळं उठून दिसण्यासाठीही धाडस लागतं . पहिला अनुयायीच एका एकांड्या शिलेदाराला नेतेपद मिळवून देत असतो .

(src)="2"> ( हंसी ) ( तालियाँ ) और अब दूसरा अनुगामी आता है . अब ये कोई एक सनकी या दो सनकी एक साथ नहीं हैं , बल्कि तीन , याने मजमा लग गया है , और मजमे का लगना एक ख़बर है . तो किसी मुहिम या आन्दोलन का सार्वजनिक होना ज़रूरी है . ये इसलिए ज़रूरी है , ताकि सिर्फ नेता ही नहीं , अनुगामी भी दिख सकें क्योंकि आप देखेंगे कि नए अनुगामी नेता का नहीं , बल्कि उसके अनुगामियों का अनुसरण करते हैं . अब यहाँ दो लोग और आ जाते हैं , और उसके तुरंत बाद तीन और आ जाते हैं . यहाँ से ये ज़ोर पकड़ने लगता है . यही उसके कायापलट का क्षण है . ये जद्दोजहद अब एक मुहिम बन चुकी है . ग़ौर कीजिए , जैसे- जैसे और लोग जुड़ने लगते हैं , जोखिम कम हो जाता है . तो जो लोग इसे दूर से ताक रहे थे , उनके पास दूर रहने की अब कोई वजह नहीं बचती . वो अलग- थलग पड़ना नहीं चाहेंगे . वो खिल्ली उड़ाया जाना भी नहीं चाहेंगे . पर अगर वो जल्दी करें , तो नज़र में चढ़ चुकी इस भीड़ का हिस्सा बन सकते हैं .
(trg)="2"> ( हशा ) ( टाळ्या ) आणि हा पहा दुसरा अनुयायी आला . आता हा एक वेडा किंवा हे दोन वेडे नाहीत , तर तिघांचा जमाव आहे आणि जमावामध्ये तर कुछ बात है . म्हणजे चळवळ ही लोकांना सामावून घेणारी असावी . फक्त नेता असून उपयोग नाही तर अनुयायी असणं महत्वाचं आहे , कारण तुम्ही पाहाल की नवीन अनुयायी आधीच्या अनुयायांची नक्कल करतात , नेत्याची नव्हे . हे बघा , अजून दोन लोकं आली आणि नंतर लगेचंच आणखी तीन लोकं . आता चळवळीला वेग आला आहे . हाच तो क्रांतीचा क्षण . आणि आता खरी चळवळ सुरु झाली आहे . म्हणजे पहा की जसजशी लोकं सामील होत जातात तसतशी चळवळ कमी धोकादायक होते . मग याआधी कुंपणावरून बघणाऱ्यांनाही तसं बघत बसण्याची गरज उरत नाही .
(trg)="3"> ( कारण आता ) ते गर्दीत वेगळे उठून दिसणार नाहीत . त्यांचं हसंही होणार नाही . पण त्यांनी घाई केली तर ते एका लक्षवेधी जमावाचा भाग होऊ शकतात .

(src)="3"> ( हंसी ) तो अब अगले ही पल आप उन लोगों को जुड़ते देख सकते हैं जो भीड़ के साथ ही चलना चाहेंगे ताकि कोई उनका इसलिए मज़ाक न बना सके कि वो इसमें शामिल नहीं हुए , और इस तरह एक आंदोलन आकार लेता है . चलिए इससे मिले कुछ सबक हम फिर से देखें . तो पहले , अगर आप उस तरह के हैं , मतलब बिना कमीज़ के अकेले नाचते हुए उस शख्स की तरह के , तो अपने शुरुआती अनुयायियों से समानता का व्यवहार रखने का महत्व याद रखिए ताकि मुहिम ही मुद्दा बने , आप नहीं . ठीक है , पर शायद हम यहाँ मिली असली सीख को अनदेखा कर रहे हैं . सबसे बड़ी सीख , अगर आपने ध्यान दिया हो -- क्या आप समझ पाए -- वो ये है कि नेतृत्व को अति महिमा- मण्डित किया जाता है , हाँ , सच है कि बिना कमीज़ वाले शख्स ने शुरुआत की थी , और उसे इसका पूरा श्रेय भी मिलेगा , पर असल में वो पहला अनुयायी था जिसने एक अकेले सनकी को नेता में तब्दील कर दिया . याने अगर हमें ये कहा जाए कि हम में से हर किसी को नेता बनना है , तो वास्तव में ये तरीक़ा कारगर नहीं होगा . अगर सच में आप किसी विषय पर आंदोलन छेड़ना चाहते हैं , तो आप में पीछे चलने की और दूसरों को अनुसरण करना सिखाने की काबिलियत होनी चाहिए . और अगर आपको कभी कोई सनकी कुछ अद्भुत करता दिख जाए , तो आगे बढ़ कर उसका साथ देने में पहल करने का दम दिखाइये . और उसके लिए सबसे सही जगह है , TED . धन्यवाद .
(trg)="4"> ( हशा ) म्हणून पुढच्या एका मिनिटभरात तुम्ही पाहाल की , हे सर्व बघे गर्दीबरोबरचं राहणं पसंत करतात . अन्यथा शेवटी त्यांचचं हसू होईल , सामील न झाल्यामुळे ! आणि अशाप्रकारे चळवळ सुरु होते . चला तर मग , यातून काही निष्कर्ष काढू . तर सर्वप्रथम , जर तुम्ही सदरा काढून एकट्या नाचणाऱ्या मुलासारखे असाल , तर तुमच्या पहिल्या काही अनुयायांना स्वतःच्या बरोबरीने वागवण्याचे महत्व लक्षात ठेवा . मग साहजिकच सारे चळवळीसाठी ठरते , न की स्वतःसाठी . बरं , पण इथे एक महत्वाचा धडा आपल्या हातून निसटण्याची शक्यता आहे . लक्षात घेतलं तर सर्वांत मोठ्ठा धडा -- तुम्ही पाहिलं का - - की नेतृत्वगुणाचे उदात्तीकरण केले जाते . हे खरचं आहे की सदरा काढून नाचणारा माणूस पहिला होता . आणि त्यालाच सर्व श्रेय मिळेल . पण खरं पाहता त्या पहिल्या अनुयायानेच त्या एकट्या मुर्खास नेतेपद मिळवून दिलं आहे . म्हणून ´नेते बना´ असं जे आपल्याला सांगितलं जातं , ते फारसं उपयोगी नाहीये . जर तुम्हाला खरोखरचं चळवळ सुरु करायची असेल , तर अनुसरण करायचं धाडस बाळगा आणि अनुसरण कसे करावे हे इतरांना दाखवून द्या . आणि एखादा " वेडा " माणूस काही महान कार्य करताना आढळला , तर बरोबर उभं राहून त्याला सामील होणारी प्रथम व्यक्ती होण्याचं धाडस दाखवा . आणि याकरिता एक सर्वोत्तम ठिकाण म्हणजे TED चा हा रंगमंच ! धन्यवाद !

(src)="4"> ( तालियाँ )
(trg)="5"> ( टाळ्या )

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(src)="1"> Hum sawal 27 per hai सवाल यह है , इनमें से कौन सा समीकरण सबसे अच्छा मैच करता है ग्राफ के साथ समीकरणों को तलाश में पहले , चलो देखते हैं हम क्या जानकारी ग्राफ से प्राप्त कर सकते हैं ग्राफ़ का y अवरोधन ( y - Intercept ) क्या है ? तो अगर हम ने कहा कि यह एक लाइन का समीकरण है , हम y कहा और ख - एमएक्स प्लस ख जहां ढलान और y के बराबर है y- अवरोधन है . बहुत देर हो चुकी है , मैं थोड़ा दबी हुई हो रही है . तो y- अवरोधन क्या है ? खैर , जब एक्स 0 के बराबर है , y 0 के बराबर है . तो यह 0 के बराबर होने जा रहा है .
(trg)="1"> आपण २७ व्या प्रश्न वर आहोत आणि प्रश्न असा आहे कि कोणते समिकरण योग्य प्रकारे दाखवते कि वरील तक्ता( ग्राफ ) त्याच्या शी( समीकरण ) संबंधित आहे पर्याय पाहण्याआधी पाहूया आपल्याला तक्त्या ( ग्राफ ) संबंधी काय समजते

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(src)="1"> इस video में हम French revolution के बारे में बात करेंगे और ना सिर्फ ही यह स्वतंत्रता है एक नवाब- शाही से , जैसे की American independence में हुआ था इसमें नवाब शाही का तख्ता पलट भी किया गया जो की दुनिया पे राज करती थी आपके विचार पे निर्भर करता है , पर American Revolution के प्रभाव से स्वतंत्रता की ज़रुरत महसूस की गयी , और विचार किया गया " आखिर ज़रुरत क्या है राजाओं की ? " इसलिए French Revolution पहला संग्राम था इस तरह का Europe में जो तख्ता पलट करने में कामयाब हुआ आइये देखें इसकी शुरुवात कैसे हुई ? देखते हैं France कैसा था १७८९ में जब French revolution की शुरुवात हुई एक .
(src)="2"> France गरीब था . आप अगर Louis XVI को देखें तोह ऐसा नहीं लगेगा की फ्रांस गरीब था
(src)="3"> Louis XVI के कपड़ों के पहनावा और ढंग .. और की पत्नी , Marie Antoinette के कपड़ों से वोह गरीब नहीं दीखते , जब की वे लोग Versalles के महल में रहते थे . जो की बहुत बड़ी शानदार मानी जाती है वे लोग बहुत ऐश- ओ- आराम की ज़िन्दगी बिता रहे थे ये महल Paris के बहुत गरीब suburb पे स्थित था पर उस समय यह गाँव २० - ३० किलो मीटर दूर स्थित था
(trg)="1"> या व्हिडीओत आपण फ्रेंच राज्यक्रांतीविषयी बोलणार आहोत . फ्रेंच राज्यक्रांती आणि जी गोष्ट या राज्यक्रांतीला विशेष महत्वाची ठरवते ती म्हणजे अमेरिकन राज्यक्रांतीप्रमाणे फ्रेंच राज्यक्रांतीने राजसत्तेकडून केवळ स्वातंत्र्य मागितले नाही तर राजसत्ता प्रत्यक्ष उलथवून लावली . ही राजसत्ता जगातील महाशक्तींचे नियंत्रण करत होती . त्यामुळे काही प्रमाणात हे तुमच्या दृष्टीकोनावर अवलंबून आहे . अमेरिकन राज्यक्रांती प्रथम घडली . तिने स्वशासनाची तत्त्वे मांडली . आणि आपल्याला राजाची गरज का असते इत्यादी . पण फ्रेंच राज्यक्रांती म्हणजे सर्वात प्रथम या तत्त्वांनी युरोपात पाय रोवला . आणि राजसत्तेला उलथवून टाकले . त्यामुळे ज्या प्रकारच्या वातावरणात ही घटना घडली ते समजून घेण्यासाठी १७८९ मध्ये फ्रान्स कसा होता याबद्दल बोलू . बहुसंख्यांक लोक याला राज्यक्रांतीची सुरुवात या दृष्टीने पाहतात . एक , फ्रान्स गरीब होता . फ्रान्स दरिद्री होता . आता , तुम्ही असा विचार करू नका की फ्रान्स गरीब होता जर तुम्ही लुई सोळावा जो फ्रान्सचा सम्राट होता त्याच्याकडे पाहिलेत , जर तुम्ही सोळाव्या लुईकडे आणि तो परिधान करत असलेल्या कपड्यांकडे पाहिलेत , जर तुम्ही त्याची पत्नी , मेरी अन्तोनेत कडे पाहिलेत , ते दरिद्री दिसत नाहीत . ते व्हर्सेलच्या राजवाड्यात राहत होते . जो अतिभव्य आहे . हा तो प्रचंड राजवाडा . जगातील अतिभव्य राजवाड्यांशी याची तुलना केली जाते . त्यांची जीवनशैली अतिशय सुबत्तेची होती . जर तुम्हांला हा कुठे आहे ते जाणून घ्यायची इच्छा असेल , तर हा जवळपास पॅरिसच्या उपनगरात आहे . पण त्यावेळी हे एक खेडे होते . पॅरिसपासून २० किंवा ३० किमी लांब ते काही दरिद्री वाटत नाहीत . पण फ्रान्सची खरी शासनव्यवस्था दरिद्री होती . आणि जेव्हा मी दरिद्री म्हणतो , ते कर्जात बुडालेले होते . त्यांनी केवळ दोन मोठी सैनिकी साहसे केली होती . पहिलं म्हणजे अमेरिकन क्रांती क्रांतिकारकांना मदत करण्यात त्यांनी मोलाची कामगिरी बजावली . कारण ब्रिटीश साम्राज्य थोडं बुडावं अशी त्यांची इच्छा होती . त्यामुळे फ्रान्सने विपुल सैनिकी मदत आणि साधनसामुग्री पाठवली आणि तुम्ही कल्पना करू शकता , हे स्वस्त नाही जेव्हा तुम्ही हे अटलांटिक महासागरावरून करत असाल . आणि अमेरिकन राज्यक्रांतीच्याही आधी १७६३ मध्ये संपलेले सप्तवार्षिक युद्ध त्याने फ्रेंच शासनाकडे असलेल्या संपत्तीला खरोखर ओहोटी लागली . आणि तुमच्या पैकी ज्यांचा अमेरिकन इतिहासाकडे अधिक कल आहे , सप्तवार्षिक युद्ध म्हणजे फ्रेंच आणि इंडिअन युद्धच . फ्रेंच आणि इंडिअन युद्ध म्हणजे सप्तवार्षिक युद्धाचे उत्तर अमेरिकन नाट्यगृह . पण सप्तवार्षिक युद्ध ही सर्वसामान्य संज्ञा आहे . कारण त्याच वेळी युरोपात एक संघर्ष चालू होता . फ्रेंच आणि इंडिअन युद्ध त्या संघर्षाचाच एक भाग होय . आणि त्याच वेळी फ्रेंच नागरिकांची उपासमार होत होती . त्यामुळे लोक उपाशी होते . सार्वत्रिक दुष्काळ पडला होता \ ते पुरेसं अन्नधान्य उत्पादित करत नव्हते . लोकांना खाण्यासाठी ब्रेड मिळत नव्हता . त्यामुळे तुम्ही कल्पना करू शकता . जेव्हा लोकांची उपासमार होते , ते आनंदी नसतात . आणि या दुःखावर मीठ चोळण्यासाठी तुम्ही बघू शकता , राजेरजवाडे अशाप्रकारे जगत होते . जर तुम्ही शेतकरी असाल तर तुम्ही त्यांच्या जमिनीवर काम करता , सर्व काम करता , तुम्ही त्यांना पिकाचा काही हिस्सा पाठवता आणि ते काहीही कर भरत नाहीत . त्यामुळे तुमच्या दृष्टिकोनातून , तुम्ही हा विचार का करता ते समजणं कठीण नाही . ते खरोखरच एक प्रकारची बांडगुळे होती . जी तुमची उपासमार होत आहे या गोष्टीकडे पूर्ण दुर्लक्ष करत होती . आणि तुम्ही सर्व कर भरत आहात . तुम्ही कल्पना करू शकता , लोक या गोष्टीबद्दल फारसे खूष नव्हते . आणि सर्वात वर , तुमच्या आजूबाजूला हे सर्व तत्त्वज्ञ आहेत , वैचारिक क्रांती/ प्रबोधनाबद्दल बोलणारे आणि ही एक प्रकारची चळवळ आहे जिथे लोक आणि लेखक आणि कवी आणि तत्त्वज्ञ यांच्या लक्षात येतं की , अरे ! कदाचित आपल्याला राजांची गरज नाही . कदाचित चांगलं काय आणि वाईट काय हे सांगण्यासाठी आपल्याला धर्मोपदेशकांची गरज नाही कदाचित लोक अचानक लोकांवर राज्य करू शकतील . आणि , अर्थातच वैचारिक क्रांतीचा मुख्य पुरावा म्हणजे अमेरिकन राज्यक्रांती हे एक प्रकारचे पहिलेच उदाहरण होते जेव्हा लोक उभे राहिले आणि म्हणाले , आम्हाला यापुढे या राजांची गरज नाही . आम्ही स्वतःच स्वतःला शासन करू इच्छितो . लोकांसाठी , लोकांकडून ही तात्वज्ञानिक चळवळ आजूबाजूला चालू होती . आता जर तुम्ही मला माझं मत विचाराल की सर्वात मोठी गोष्ट कोणती होती ती म्हणजे, मला वाटतं लोकांची उपासमार होत होती .. लोक उपाशी असताना काय करू इच्छित होते आणि हे बुद्धीवादापेक्षा जास्त महत्वाचं आहे . लोक म्हणाले , " ही प्रबोधनाची चळवळ आहे . " ही फ्रान्सची स्थिती होती . त्यांच्यापुढे आर्थिक समस्या होती . त्यामुळे एक परिषद बोलावली गेली फ्रान्समधील प्रमुख समाजघटकांची आपत्कालीन परिषद . काही प्रश्न सोडवण्याचा प्रयत्न करण्यासाठी आर्थिक समस्या आहे , लोकांची उपासमार होत आहे , तुम्ही काय करता ? त्यांनी इस्टेट जनरल्स ची सभा बोलावली . हे मी लिहून दाखवतो . इस्टेट जनरल्स ची सभा म्हणजे फ्रान्स मधील तीन समाज रचनांची सभा आता फ्रान्स मधल्या तीन इस्टेटस् किंवा समाज रचना कोणत्या होत्या ? तुम्ही त्यांना फ्रान्समधील ३ प्रमुख समाजघटक म्हणून बघू शकता पहिली इस्टेट( समाजघटक ) धर्मोपदेशकांची होती . दुसरी म्हणजे राजेरजवाडे आणि उमराव . तिसरीत उरलेले सर्व . उरलेले सर्व - वेगळ्या रंगात करतो . त्यामुळे सत्ता ही कशी एकाच दिशेने केंद्रित झाली होती त्याचा तुम्हा अंदाज येईल . पण या लोकांवर जास्तीतजास्त करांचं ओझं होतं . हे ते लोक होते जे सर्व काम करत होते . फ्रान्सची संपत्ती निर्माण करत होते , युद्धात मरत होते . आता अर्थातच इथे असलेले तिसऱ्या इस्टेटचे लोक संतप्त होते . आणि उमराव , राजा किंवा धर्मोपदेशक त्यांना त्याग करावे लागणार नाहीत .

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(src)="1"> यह मानव जाति के लिए एक सपना है एक पंछी की तरह उड़ान भरना . पक्षी बहुत फुर्तीले होते हैं . वे घूमने वाले उपकरणों के साथ नहीं उड़ , इसलिए वे केवल अपने पंख फड़फड़ा कर उड़ते हैं . तो हमने पक्षियों को देखा , और हमने एक मॉडल बनाने की कोशिश करी जोकि शक्तिशाली और बहुत कालका हो , और इसमें बहुत अच्छा वायुगति- विज्ञानिक गुण होना चाहिए जोकी अपने आप उड़ सके और केवल अपने पंख फड़फड़ा कर . तो क्या सबसे बेहतर होगा उपयोग करना हर्रिंग गुल, अपनी आजादी में समुद्र के चक्कर और उसमे छलांग लगाते हुए , और उसे एक नमूने के रूप में उपयोग करना . तो हमने एक टीम बनाई . वहाँ सामान्यज्ञ और विशेषज्ञ दोनों हैं वायुगति- विज्ञानं के क्षेत्र में ग्लाइडर्स निर्माण के क्षेत्र में . और निर्माण कार्य था एक बहुत हल्का अन्दर उड़ने वाला नमूना जोकि आपके सिर के ऊपर उड़ान भर सके . तो बाद में सावधान रहें .
(src)="2"> और यह एक मुद्दा था : इसे इतना हल्का बनाना कि किसी को भी चोट न लगे अगर यह नीचे गिर जाये . तो हम यह सब क्यों कर रहे हैं ? हम स्वचालन के क्षेत्र में एक कंपनी हैं , और हम बहुत हलकी संरचनाएं करना चाहते हैं क्युकी यह ऊर्जा कुशल है और हम अधिक जानना चाहते हैं वायुचालित और हवा के प्रवाह का तथ्य . तो अब मैं चाहता हूँ की आप अपनी सीट बेल्ट [ डाल ] लें और अपनी टोपी लगा लें . तो हम एक बार कोशिश करते हैं स्मार्टबर्ड को उड़ने की . धन्यवाद .
(trg)="1"> पक्ष्याप्रमाणे उडणं हे अवघ्या मानवजातीचं स्वप्न आहे पक्षी हे खूप चपळ असतात . ते आसाभोवती फिरणार्‍या अवयवांशिवाय फक्त पंखांची उघडझाप करून उडतात . म्हणून आम्ही पक्ष्यांचं निरीक्षण केलं आणि एक अशी प्रतिकृती बनवण्याचा प्रयत्न केला जी अतिशय हलकी असेल आणि जिचे वायुगतीशास्त्रीय गुणधर्म इतके उत्तम असतील की ती स्वबळावर नुसती पंखांची उघडझाप करून उडू शकेल . तर ह्यासाठी काय वापरणं उत्तम ठरेल ? हेरिंग नावाचा सागरी पक्षी जो मुक्तपणे समुद्रावर घिरट्या घालत झेपावतो ह्याशिवाय अजून कुठला आदर्श म्हणून वापरता आला असता ? त्यानंतर आम्ही संघाची बांधणी केली ज्यात सामान्य ज्ञान आणि वायुगतीशास्त्र क्षेत्रातील यंत्राविना चालणारी विमाने बनविण्यात तञ्ज्ञ असणाऱ्या व्यक्ती होत्या . आणि आमचं ध्येय होतं एक अतिशय हलकी प्रतिकृती बनविणं जी एका बंदिस्त खोलीत केवळ पंखाची उघडझाप करत तुमच्या डोक्यावरून उडू शकेल नंतर काळजी घ्या आणि हाच एक प्रश्न होता की तो इतका हलका असायला हवा की कोणाला इजा होता कामा नये जर तो ( कधी ) खाली पडला . आम्ही हे सगळं का करतोय ? आम्ही एक स्वयंचलित यंत्र बनवणारी संस्था आहोत आणि आम्हाला अश्या वजनाने अतिशय हलक्या रचना बनवायच्यात कारण त्या ऊर्जा कार्यक्षम असतात . आणि आम्हाला हवेचा दाब आणि प्रवाह याविषयी अधिक जाणून घ्यायची इच्छा आहे . तर मी आता तुम्हाला सतर्क राहण्याची विनंती करतो . आणि जरा डोक्याला चालना द्या . तर आपण हा स्मार्ट बर्ड ( smartBird ) उडविण्याचा एकदा प्रयत्न करूया . धन्यवाद .

(src)="3"> ( तालियाँ )
(trg)="2"> ( टाळ्यांचा कडकडाट )

(src)="4"> ( तालियाँ )
(trg)="3"> ( टाळ्यांचा कडकडाट )

(src)="5"> ( तालियाँ ) तो अब हम स्मार्टबर्ड को देख सकते हैं . तो यहाँ एक त्वचा के बिना है . इसके पंख दो मीटर के हैं . लंबाई एक मीटर और छह है , और वजन , केवल 450 ग्राम . और यह कार्बन फाइबर का है . बीच में एक मोटर है , और इसके एक गियर भी है . और हम गियर का उपयोग करते हैं मोटर के संचालन के हस्तांतरण के लिए . तो मोटर के भीतर , तीन हॉल सेंसर हैं , इसलिए हम जानते हैं , बिलकुल किस जगह इसका पंख है . और अगर अब हम ऊपर और नीचे चलाएं ...
(trg)="4"> ( टाळ्यांचा कडकडाट ) तर आता आपण स्मार्ट बर्ड ( smartBird ) कडे पाहू शकतो हा एक बाहेरचे आवरण नसलेला आहे त्याच्या पंखांचा विस्तार दोन मीटर आहे . लांबी एक दशांश सहा मीटर आहे आणि वजन फ़क़्त साडे चारशे ग्राम आहे आणि तो पूर्णपणे कार्बन धाग्यापासून पासून बनविलेला आहे . ह्याच्या मध्यभागी एक यंत्र आणि दाते आहेत . दात्यांचा वापर यंत्राच्या परिभ्रमणाचे स्थानांतर करण्यासाठी होतो . यंत्रामध्ये तीन " हॉल सेन्सर " ( Hall sensors ) आहेत जे पंखाची अचूक स्थिती दर्शवितात . आणि जर आता आपण वर खाली हालचाल केली

(src)="6"> संभावना है एक पंछी की तरह उड़ान भरने की . तो अगर तुम नीचे जाओ , प्रणोदन का एक बड़ा क्षेत्र है . और अगर आप ऊपर जाते हैं , पंख उतने बड़े नहीं हैं , और उठाना आसान है . अगली चीज़ हमने की , या चुनौतियों हमने उठाई इस चाल का समन्वय किया . हमें इसे पलटना है , ऊपर और नीचे चलने के लिए . एक विभाजित पंख है . विभाजित पंख के साथ हमें ऊपरी पंख पर उठाव मिलता है , और हमें निचले पंख पर प्रणोदन मिलता है . इसके अलावा , हम देखते हैं हम वायुगति- विज्ञानिक दक्षता कैसे मापते हैं . हमें ज्ञान था विद्युत दक्षता का और फिर हम गणना कर सकते हैं वायुगति- विज्ञानिक दक्षता की . इसलिए तो , यह निष्क्रिय मरोड़ से सक्रिय मरोड़ करने के लिए उठता है , ३० प्रतिशत से ८० प्रतिशत तक . अगली चीज़ हम करना चाहते हैं , हम नियंत्रण और विनियमित करना चाहते हैं पूरे ढांचे को . अगर आप इसे सिर्फ नियंत्रण और विनियमित करें , आप को वह वायुगति- विज्ञानिक दक्षता मिल जाएगी . तो ऊर्जा की समग्र खपत टेकऑफ़ पर २५ वाट है और उड़ान में १६ से १८ वाट . धन्यवाद .
(trg)="5"> तर ही शक्यता आहे की हे पक्ष्याप्रमाणे उडेल . जर तुम्ही खाली गेलात तर तुमच्याकडे स्वतःला पुढे ढकलण्यासाठी विस्तृत जागा आहे . आणि जर तुम्ही वर गेलात तर पंख जास्त मोठे नसल्यामुळे वर जाणं सुलभ होतं . ह्यापुढे आम्ही जे केलं किंवा ज्याचं आव्हान होतं आमच्यापुढे ( ते म्हणजे ) ह्या हालचालींमध्ये समन्वय साधणे . आपल्याला हे वळवून वर आणि खाली जायचं आहे . आपल्याकडे एक दुभागलेला पंख आहे . दुभागलेल्या पंखामुळे वरच्या पंखाकडे उचल मिळते आणि खालच्या पंखाकडे पुढे ढकलण्याची शक्ती मिळते . आपण हेसुद्धा बघत आहात की आम्ही वायुगतीशास्त्रीय कार्यक्षमता कशी मोजतो . आपल्याला विद्युतयांत्रिकी कार्यक्षमतेबद्दल ज्ञान आहे आणि त्यावरून आपण वायुगतीशास्त्रीय कार्यक्षमता मोजू शकतो . आणि त्यामुळे ती अकार्यान्वित ऊर्जेतून कार्यान्वित उर्जेत ३० ते ८० टक्के वृद्धिंगत होते . ह्यापुढे आपल्याला ह्या संपूर्ण रचनेवर नियंत्रण मिळवायचे आहे . वायुगतीशास्त्रीय कार्यक्षमता तेव्हाच मिळेल जेव्हा आपण ह्यावर नियंत्रण मिळवू शकू सर्व जमेस धरून , २५ watts ऊर्जा उड्डाण करताना आणि १६ ते १८ watts ऊर्जा उडत असताना खर्च होते . धन्यवाद .

(src)="7"> ( तालियाँ ) ब्रूनो गिउस्सानी : मरकुस , मुझे लगता है कि हमें इसे एक बार और उड़ना चाहिए . मरकुस फिशर : हाँ , ज़रूर .
(trg)="6"> ( टाळ्यांचा कडकडाट ) ब्रुनो जि´ सानी : मार्कस , मला वाटतं हे आपण आणखी एकदा उडवायला हवं . मार्कस फिशर : हो , नक्कीच .

(src)="8"> ( हँसी )
(trg)="7"> ( हश्या )

(src)="9"> ( हांफते हुए )
(trg)="8"> ( सगळे श्वास रोखतात )

(src)="10"> ( चीयर्स ) ( तालियाँ )
(trg)="9"> ( हर्षोदगार ) ( टाळ्यांचा कडकडाट )

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(src)="1"> मैं संवेदना के बारे में इस्लाम के दृष्टिकोण से बात कर रहा हूँ , और शायद मेरे धर्म के बारे में ऐसा नहीं समझा जाता कि संवेदना से गहरे जुड़ा हुआ है . हालांकि सच्चाई कुछ अलग है हमारे धर्मग्रन्थ क़ुरान में ११४ अध्याय हैं और हर अध्याय शुरू होता है उस शब्द से , जिसे हम कहते हैं बिस्मिल्लाह जो कि ईश्वर के नाम में , जो संवेदनापूर्ण हैं , और दयालु हैं या जैसा कि सर रिचर्ड बर्टन वो रिचर्ड बर्टन नहीं जिन्होंने एलिज़ाबेथ टेलर से शादी कि थी परन्तु वो सर रिचर्ड बर्टन जो उनसे १ शताब्दी पहले हुए थे और जिन्होंने पूरी दुनिया का भ्रमण किया था और कई साहित्यों का अनुवाद किया था वो उस शब्द का अनुवाद करते हैं " ईश्वर के नाम में , जो कि संवेदनशील और करुणापूर्ण हैं " और क़ुरान , जो कि मुसलमानों के लिए ईश्वर का मानवता को सन्देश है , उसकी एक कहावत में , ईश्वर अपने पैगंबर मुहम्मद से , जिनको हम पैगम्बरों कि श्रृंखला में अंतिम मानते हैं उस श्रृंखला में जो आदम से शुरू हुई , और नूह , मूसा , इब्राहिम और यीशु मसीह भी शामिल है , और जो मोहम्मद के साथ समाप्त हुई कहते हैं " ओह मोहम्मद , हमने आपको भेजा है केवल दया , और मानवता के लिए संवेदना का स्रोत बना कर " और हम मनुष्यों के लिए , और निश्चित रूप से हम मुसलमानों के लिए , जिनका लक्ष्य और उद्देश्य , पैगम्बर के रास्ते पर चल कर अपने आप को पैगम्बर की तरह बनाना है और पैगम्बर ने अपने एक कथन में कहा है
(trg)="1"> मी इस्लामच्या दृष्टीकोनातून अनुकंपेबद्दल बोलतोय , आणि कदाचित माझ्या श्रद्धेमागं खूप गहन विचार नसेलही कारण ती दयेच्या भावनेवरच आधारीत आहे . पण सत्य परिस्थिती वेगळीच आहे . आमच्या कुराण या पवित्र ग्रंथामध्ये ११४ अध्याय आहेत , आणि प्रत्येक अध्यायाचा आरंभ ´बिस्मिल्लाह´ नं होतो , त्या परमदयाळू , क्षमाशील ईश्वराच्या नामस्मरणानं , किंवा , सर रिचर्ड बर्टन यांनी म्हटल्याप्रमाणं , हे रिचर्ड बर्टन म्हणजे एलिझाबेथ टेलरचे पती नव्हेत , तर हे शंभर वर्षांपूर्वी होऊन गेलेले सर रिचर्ड बर्टन जे जगप्रवासी होते आणि कित्येक साहित्यकृतींचे भाषांतरकार होते , त्यांच्या शब्दांत , " करुणेनं ओतप्रोत भरलेल्या दयाळू ईश्वराच्या नामस्मरणानं . " आणि मुस्लिमांसाठी , ईश्वराचं मानवजातीशी संवाद साधण्याचं माध्यम असणार्‍या कुराणातील एका वचनात , ईश्वर बोलतोय आपल्या प्रेषित मोहम्मदाशी , जे अखेरचे प्रेषित मानले जातात , प्रेषितांच्या मालिकेतील , जी सुरु होते आदम पासून , नोवा , मोझेस , अब्राहम सहित येशू ख्रिस्तासहित , आणि संपते मोहम्मदापाशी , तो म्हणाला , " हे मोहम्मदा , आम्ही तुला पाठवलंच नसतं , जर आम्हाला मनुष्यजातीबद्दल रहम नसता , करुणा नसती . " आणि आपण सर्व मनुष्य प्राण्यांसाठी , आणि आम्हा मुस्लिमांसाठी नक्कीच , प्रेषितानं दाखविलेल्या मार्गावर चालण्यामागं ज्यांचं ध्येय , आणि ज्यांचं उद्दिष्ट स्वतःला त्या प्रेषितासारखं बनविणं हे आहे , आणि त्या प्रेषितानं आपल्या एका वचनात म्हटलं आहे ,

(src)="2"> " अपने आप को परमेश्वर के गुणों से सजाओ " . और क्योंकि परमेश्वर ने खुद कहा है कि करुणा उनकी प्राथमिक गुण है , वास्तव में , कुरान में कहा गया है कि , " ईश्वर ने खुद पर करुणा का नियम बनाया , " या , " करुणा के राजत्व में रहे " इसलिए , हमारा उद्देश्य और हमारा लक्ष्य करुणा का स्रोत करुणा के उत्प्रेरक , करुणा के पात्र , करुणा के वक्ता और करुणा के कर्ता बनना होना चाहिए . यह सब तो ठीक है , पर हम गलत कहाँ हो जाते हैं , और दुनिया में करुणा की कमी का स्रोत क्या है ? इसका जवाब जानने के लिए , हमे मुड़ कर देखना होगा अपने आध्यात्मिक पथ की ओर हर धार्मिक परंपरा में एक बाहरी और एक आंतरिक पथ होता हैं , या कहें की भीतर की चेतना और बाहर की चेतना का पथ भीतर की चेतना के पथ को इस्लाम में सूफ़ीवाद , या अरबी में तसव्वुफ़ कहा जाता है और ये हकीम या ये गुरु , सूफी परंपरा के ये आध्यात्मिक गुरु , हमारे पैगम्बर की शिक्षाओं और उदाहरणों को उद्धृत करते हैं , जो हमें सिखाता है कि हमारी समस्याओं का स्रोत कहाँ है , पैगम्बर ने जो युद्ध लड़े उनमें से एक में , उन्होंने अपने अनुयायियों से कहा , " हम छोटे युद्ध से लौट रहे हैं एक बड़ी लड़ाई , एक बड़े युद्ध की ओर . " और उन्होंने कहा , " ईश्वर के सन्देश वाहक , हम युद्ध से थक चुके हैं , हम एक बड़े युद्ध में कैसे जा सकते हैं ? " उन्होंने कहा , " यह आत्म की लड़ाई है , अहंकार की लड़ाई है . " मनुष्य की समस्याओं के स्रोत का लेना देना अहंकारवाद से है . मैं . प्रख्यात सूफी गुरु रूमी , आप में से ज्यादातर जिसे अच्छी तरह जानते हैं . की एक कहानी है जिसमे वह एक आदमी की बात करते हैं जो अपने एक दोस्त के घर जाता है और दरवाज़ा खटखटाता है , और एक आवाज़ जवाब देती है , " कौन है ? " " हम हैं " , या व्याकरण के लिहाज से ज्यादा सही , " यह मैं हूँ . " जैसा कि हम अंग्रेजी में कह सकते हैं . वह आवाज़ कहती है , " चले जाओ . " कई वर्षों के प्रशिक्षण , अनुशासन , खोज और संघर्ष , के बाद , वह वापस आता है , और काफी ज्यादा विनम्रता से फिर दरवाजा खटखटाता है वह आवाज़ पूछती हैं " कौन है वहां ? " वह कहता है , " ये तुम हो , ओ दिल तोड़ने वाले . " दरवाज़ा खुलता है और आवाज़ कहती है ,
(trg)="2"> " स्वतःला दैवी गुणांनी अलंकृत करा . " आणि ईश्वरानं स्वतःच सूचित केलं आहे की करुणा हा त्याचा मूळ गुणधर्म आहे , वास्तविक , कुराण असं सांगतं की , " ईश्वरानं स्वतःला दयाळू बनण्याचा आदेश दिला " अथवा , " स्वतःवर करुणेचा अंमल प्रस्थापित केला . " म्हणूनच , आपलं उद्दिष्ट आणि ध्येय असलं पाहिजे , करुणेचे स्रोत बनणं , करुणेचे संप्रेरक होणं , करुणेचे पाईक बनणं , करुणेचे प्रसारक बनणं , आणि करुणेचे कार्यकर्ते बनणं . हे सर्व ठीक आहे , पण आपलं चुकतं कुठं , आणि या जगात करुणाहीनतेचे स्रोत काय आहेत ? याचं उत्तर आपण अध्यात्मिक मार्गानं शोधूयात . प्रत्येक धार्मिक प्रथेमध्ये , एक बाह्य मार्ग असतो आणि एक अंतःमार्ग , किंवा उघड मार्ग आणि गुप्त मार्ग . इस्लामचा गुप्त मार्ग सुफीवाद , किंवा अरेबिक मध्ये तसव्वुफ म्हणून ओळखला जातो . आणि हे पंडीत अथवा गुरु , सुफी परंपरेचे धर्मगुरु , आमच्या प्रेषिताच्या शिकवणीचा आणि उदाहरणांचा दाखला देतात , की आपल्या समस्यांचं मूळ कुठं आहे . प्रेषितानं पुकारलेल्या एका लढाईत , त्यानं आपल्या अनुयायांना सांगितलं , " आपण छोट्या युद्धाकडून परतत आहोत मोठ्या युद्धाकडं , मोठ्या लढाईकडं . " आणि ते म्हणाले , " हे देवदूता , आम्ही लढाईला विटलो आहोत . अजून मोठ्या लढाईला आम्ही कसं तोंड देणार ? " तो म्हणाला , " ती स्वतःची लढाई असेल , अहंकाराशी लढाई . " मानवी समस्यांचं मूळ स्वार्थामध्येच असलं पाहिजे , ´मी´ मध्ये . प्रसिद्ध सुफी गुरु रुमी , जे तुमच्यापैकी बर्‍याचजणांना माहिती असतील , त्यांच्या एका गोष्टीत ते एका व्यक्तीबद्दल बोलतात जी एका मित्राच्या घरी जाते आणि दार ठोठावते , आणि एक आवाज येतो , " कोण आहे ? " " मी आहे , " किंवा व्याकरणदृष्ट्या अचूक सांगायचं तर , " तो मी आहे , " इंग्रजीमध्ये असंच म्हणतात . आतून आवाज येतो , " निघून जा . " कित्येक वर्षांच्या प्रशिक्षण , शिस्त , शोध व धडपडीनंतर , ती व्यक्ती परत येते , आणि अतिशय विनम्रतेनं , ती परत दार ठोठावते . आतून आवाज येतो , " कोण आहे ? " ती म्हणते , " तूच आहेस , पाषाणहृदयी . " धाडकन दार उघडतं , आणि आवाज येतो ,

(src)="3"> " अन्दर आ जाओ , क्योंकि इस घर में दो ´मैं´ के लिए जगह नहीं है . दो बड़े मैं , ये आँखें नहीं , बल्कि दो अहंकार . और रूमी की कहानियां आध्यात्म के मार्ग की उपमा हैं . ईश्वर की उपस्थिति में एक से ज्यादा मैं की जगह नहीं . और यह मैं देवत्व का है . हमारी परंपरा में एक शिक्षा जिसे हदीस ख़ुदसी कहते हैं , ईश्वर कहते है , " मेरे सेवक " , या " मेरे जीव , मेरे मानव जीव , जो मुझे प्यारा है उसके सहारे मेरे पास नहीं आता बल्कि उसके सहारे जो मैंने करने को कहा है और आप में से जो नियोक्ता हैं , वे अच्छी तरह जानते हैं की मैं क्या कहना चाहता हूँ आप चाहते हो कि आपके कर्मचारी वह ही करें जो आपने उनसे करने को कहा है , और अगर उन्होंने वह कर लिया तो वे और ज्यादा कर सकते हैं , लेकिन उसे नज़रंदाज़ मत करना कि तुमने उनसे क्या करने को कहा है , और ईश्वर कहते है , मेरे सेवक मेरे और करीब होते जाते हैं , मैंने जो उनसे करने को कहा है , उससे ज्यादा कुछ करके , हम उसे कुछ ज्यादा साख कह सकते हैं , जब तक मैं उसको प्यार नहीं करता , और जब मैं अपने सेवकों को प्यार करता हूँ " , ईश्वर कहते हैं , मैं वो आँखें बन जाता हूँ , जिनसे वह देखते हैं . कान जिनसे वह सुनते हैं . हाथ जिससे वह पकड़ते हैं . पैर जिससे वह चलते हैं . और दिल जिससे वह समझता या समझती हैं . " यह हमारे अहम् और देवत्व का वह समामेलन है . यह हमारे अध्यात्मिक मार्ग और हमारी सभी धार्मिक परम्पराओं का उद्देश्य और सबक है . मुसलमान यीशु को सूफीवाद का गुरु मानते हैं , महानतम पैगम्बर और संदेशवाहक जो आध्यात्मिक मार्ग पर जोर देने आया . जब वह कहता है , " मैं आत्मा हूँ , मैं रास्ता हूँ . " जब पैगम्बर मोहम्मद कहते हैं , " ' जिसने मुझे देखा है उसने ईश्वर को देख लिया , " ऐसा इस लिए क्यों कि वे ईश्वर के पुर्जे बन गए , वे ईश्वर की वाष्प का हिस्सा बन गए , ताकि ईश्वर की इच्छा उनके जरिये फ़ैली अपने स्व और अहम् के जरिये काम नहीं किया . धरती पर मानवीयता दी गयी है , यह हममें है . हमें बस यही करना है कि रास्ते से अपने अहम् हटा देना है , अपने अहंकरवाद रास्ते से हटा देना है . में निश्चित हूँ कि यहाँ मौजूद आप में से संभवतः सभी , या निश्चित ही आप में से बहुसंख्य , को हुआ होगा , जिसे आप आध्यात्मिक अनुभव कहते हैं , आपके जीवन में एक लम्हा , जब कुछ सेकंडों या शायद एक मिनट को , आपके अहम् की सीमायें ख़त्म हो गयीं , . और उस मिनट आपने खुद को ब्रह्माण्ड का हिस्सा महसूस किया , उस पानी से भरे जग में , हर एक इन्सान में , परम पिता में , और तुमने स्वयं को शक्ति , विस्मय के सानिध्य में पाया , सबसे गहरे प्यार , संवेदना और दया की सबसे गहरी भावना में जो तुमने अपनी जिंदगी में कभी महसूस किया है ये वह लम्हा है जो ईश्वर का हमें तोहफा है , एक तोहफा जब एक लम्हे के लिए वह सीमा हटा देता है , जो हमें मैं , मैं , मैं , हम , हम हम पर जोर देने देता है , और इसके विपरीत , रूमी की कहानी के व्यक्ति की तरह , हम कहते हैं , ´ ओह , ये सब तुम हो . ´ यह सब तुम हो , यह हम सब हैं . और हम , और मैं , हम सब तुम्हारे अंश हैं , सब निर्माता , सब उद्देश्य , हमारे अस्तित्व का स्रोत , और हमारी यात्रा का अंत . तुम हमारे दिलों को तोड़ने वाले भी हो . तुम वो हो जिसकी ओर हम सबको होना चाहिए , जो हमारे जीने का कारण होना चाहिए , और जिसके लिए हमें मरना चाहिए , औए जिसके लिए हमें पुनर्जन्म लेना चाहिए . ईश्वर को जवाब देने के लिए कि हम संवेदनशील रहे हैं . आज हमारा सन्देश , और आज हमारा उद्देश्य , और तुममे में से जो आज यहाँ हैं , और संवेदना के इस अधिकारपत्र का उद्देश्य याद दिलाना है . क्योंकि कुरान हमेशा हमें याद रखने को , एक दूसरे को याद दिलाने को कहती है , क्योंकि सत्य का ज्ञान हर एक इंसान के भीतर है . हम यह सब जानते हैं . हमारे पास इसका जरिया है . जंग इसे अवचेतना कह सकते थे . हमारी अवचेतना के जरिये , तुम्हारे ख्वाबों में , जिसे कुरान कहती है , हमारी निद्रा की स्थिति , अल्प मौत , अस्थाई मौत . अपनी निद्रा की स्थिति में हमें स्वप्न आते हैं , हमें आभास होता है , हम अपने शरीर के बाहर यात्रा करते हैं , हममे से बहुत , और हम अद्भुत चीजें देखते हैं . हम जैसा अंतरिक्ष जानते हैं , उसकी सीमाओं के परे यात्रा करते हैं , हम समय की जो सीमायें जानते हैं उसके परे . लेकिन यह सब हमारे लिए विधाता के नाम का गुणगान करने के लिए है जिसका मूल नाम दयावान , दयालु है . गौड , बोख , चाहे जिस नाम से पुकारो , अल्ला , राम , ॐ , नाम कोई भी हो सकता है जिससे तुम नाम देते हो या देवत्व की मौजूदगी प्राप्त करते हो , पूर्ण तत्व का केंद्र बिंदु है . पूर्ण प्रेम और दया और संवेदना , और पूर्ण ज्ञान और विवेक , जिसे हिन्दू सच्चिनंद कहते हैं . भाषा अलग है , पर उद्देश्य समान है . रूमी के पास एक और कहानी है तीन लोगों के बारे में , एक तुर्क , एक अरब , और मैं तीसरे का नाम भूल गया , पर मेरे वास्ते , वह एक मलय हो सकता है . कोई अंगूर मांग रहा है , जैसे कि एक अंग्रेज़ , कोई एनेब मांग रहा है और कोई ग्रेप्स मांग रहा है . और उनमें झगडा और बहस होती है क्योंकि , मुझे ग्रेप्स चाहिए , मुझे एनेब चाहिए , मुझे अंगूर चाहिए , यह जाने बगैर कि जिस शब्द का वह इस्तेमाल कर रहे हैं वह एक ही सच्चाई को अलग अलग भाषाओँ में बताता है . परिभाषा के अनुसार सिर्फ एक ही पूर्ण सच्चाई है , परिभाषा के अनुसार एक पूर्ण अस्तित्व है , क्योंकि परिभाषा के अनुसार पूर्ण , एकल है , और पूर्ण और एकल , . यह अस्तित्व का पूर्ण केन्द्रीकरण है , अवचेतना का पूर्ण केन्द्रीकरण है , जागरूकता , संवेदना और प्रेम का पूर्ण केन्द्रीकरण जो देवत्व के मूल भाव को पारिभाषित करता है . और वह होना भी चाहिए इन्सान होने का जो मतलब है , उसका मूल भाव . जो इंसानियत को पारिभाषित करता है , शायद शारीरिक रूप से , हमारा जीवतत्व है , लेकिन ईश्वर हमारी इंसानियत को हमारे अध्यात्म से , हमारी प्रकृति से पारिभाषित करता है . और कुरान कहती है , वह फरिश्तों से बात करता है और कहता है , जब मैंने मिट्टी से आदम का निर्माण पूरा कर लिया , और अपनी आत्मा से उसमें सांस फूंकी , और उसके सामने साष्टांग गिर गया . " फ़रिश्ते साष्टांग होते हैं , लेकिन मानव शारीर के समक्ष नहीं , बल्कि मानव आत्मा के समक्ष . क्यों ? क्योंकि आत्मा , मानव आत्मा , दैवी श्वास के एक हिस्से का मूर्त रूप है , दैवी आत्मा का एक टुकड़ा है . यह बाईबिल के कोष में भी वर्णित है जब हमें यह सिखाया जाता है कि हम दैवी तस्वीर में बनाये गए थे . ईश्वर का चित्र क्या है ? ईश्वर का चित्र पूर्ण अस्तित्व है . पूर्ण जागरूकता , ज्ञान और विवेक और पूर्ण संवेदना और प्रेम . और , इसलिए , हमें इन्सान होने के लिए , इन्सान होने का क्या मतलब है इसके सबसे बड़े मायने में , इन्सान होने का क्या मतलब है इसके सबसे खुशनुमा मायने में , मतलब यह है कि हमें उचित कारिन्दा होना पड़ेगा हमारे भीतर जो दैवी श्वास है उसका , और हमारे भीतर अस्तित्व के भाव के साथ परिपूर्ण होने के प्रयास , जीवित होने के , अस्तित्व के , विवेक के भाव , चेतना के , जागरूकता के , और भाव संवेदनशील होने का , प्रेम भरा होने का . यही है वह जो मैं अपने धर्म की परम्पराओं से समझता हूँ , यही है वह जो मैं दूसरे धर्म की परम्पराओं के अपने अध्धयन से समझता हूँ , और यह एक समान मंच है जिस पर हम सबको जरूर खड़े होना चाहिए , और इस मंच पर जब हम ऐसे खड़े होंगे , मुझे यकीन है कि हम एक अद्भुत दुनिया बना सकते हैं . और मुझे व्यक्तिगत तौर पर विश्वास है कि हम कगार पर हैं , कि आप जैसे लोग जो यहाँ हैं उनकी उपस्थिति और मदद से , हम ईसा की भविष्यवाणी को सच बना सकते हैं . क्यों कि उसने एक समय के बारे में बताया था जब लोग अपनी तलवारों को हल के फल में बदल देंगे और न युध्द सीखेंगे और न और कभी युध्द करेंगे . हम मानव इतिहास में ऐसे मुकाम पर पहुँच गए हैं , जब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है . हमें जरूर , जरूर ही अपने अहम् को गिराना होगा , हमारे अहम् पर नियंत्रण , चाहे वह एक का अहम् हो , व्यक्तिगत अहम् हो , परिवार का अहम् , राष्ट्र का अहम् , और सब परमेश्वर के गुणगान में जुटें , धन्यवाद् , ईश्वर आपको आशीर्वाद दे .
(trg)="3"> " आता आत ये , कारण या घरात दोन ´मी´साठी जागा नाही , दोन इंग्रजी आय ( I ) , आय म्हणजे डोळा नव्हे , दोन अहं साठी . आणि रुमीच्या कथा अध्यात्मिक वाटेवरील रुपकं आहेत . ईश्वराच्या उपस्थितीत , एका अहं पेक्षा जास्त जणांसाठी जागाच नसते , आणि तो अहं ईश्वरी असतो . एका शिकवणीमध्ये , जिला आमच्या परंपरेत हदिथ कद्सी म्हणतात , ईश्वर म्हणतो की , " माझा सेवक , " किंवा " माझी निर्मिती , मनुष्य प्राणी , तोपर्यंत माझ्या निकट येत नाहीत , जोपर्यंत ते करत नाहीत , जे मी त्यांना करायला सांगितलं आहे . " आणि तुमच्यातील मालक लोकांना माझं म्हणणं तंतोतंत कळेल . तुमच्या कामगारांनी तुम्ही सांगितलेलं काम करावं अशी तुमची इच्छा असते , आणि ते पूर्ण केल्यावर ते अधिक काम करु शकतात , पण तुम्ही त्यांना जे करायला सांगितलंय त्याकडं दुर्लक्ष न करता . आणि ईश्वर म्हणतो , " माझा सेवक माझ्या अधिकाधिक निकट येत राहतो , मी त्यांना सांगितलेलं अधिकाधिक करुन , " आपण त्याला जास्तीचं पुण्य म्हणू शकतो ,
(trg)="4"> " जोपर्यंत मी त्याच्यावर किंवा तिच्यावर प्रेमाचा वर्षाव करत नाही . आणि जेव्हा मी माझ्या सेवकावर प्रेम करतो , " ईश्वर म्हणतो , मी ते डोळे बनतो ज्यानं तो किंवा ती पाहू शकतात , ते कान ज्यानं तो किंवा ती ऐकू शकतात , तो हात ज्यानं तो वा ती पकडू शकतात , आणि तो पाय ज्यानं तो वा ती चालू शकतात , आणि ते हृदय ज्यानं त्याला वा तिला जाणीव येते . " आपली हीच ईश्वराबरोबरची एकरुपता आहे , जी आपल्या अध्यात्माची आणि सर्व श्रद्धा परंपरांची शिकवण व उद्दीष्ट आहे . मुस्लिम येशूला सूफी गुरु मानतात , तो महान प्रेषित व दूत जो अध्यात्मिक मार्गाचं महत्त्व पटवून द्यायला आला . जेव्हा तो म्हणतो , " मीच आत्मा आहे , आणि मीच मार्ग आहे , " जेव्हा प्रेषित मोहम्मद म्हणाले , " माझं दर्शन घेणार्‍याला ईश्वराचंच दर्शन घडतं , " कारण ते ईश्वराचं इतकं एकरुप साधन बनले , की ते ईश्वराचाच अंश बनले , इतकं की ईश्वरेच्छा त्यांच्याच माध्यमातून प्रकट झाली आणि त्यांनी स्वतंचं अस्तित्व आणि अहंकार सोडून दिले . करुणा ही आपल्यामध्ये असतेच . आपल्याला फक्त आपल्या अहंकाराला बाजूला सारायचं आहे , आपला स्वार्थ दूर लोटायचा आहे . मला खात्री आहे , कदाचित तुमच्यापैकी सर्वांनी , किंवा तुमच्यापैकी बहुतेकांनी , एक अशी अध्यात्मिक स्थिती अनुभवली आहे , तुमच्या आयुष्यातील तो क्षण , काही सेकंद , कदाचित एखादा मिनीट , जेव्हा तुमचा अहंकार गळून पडला . आणि त्या क्षणी , तुम्ही विश्वाशी एकरुपता अनुभवली , त्या पाण्याच्या भांड्याशी एकरुपता , सकल मानव प्राण्यांशी एकरुपता , त्या जगनिर्मात्याशी एकरुपता , आणि सर्वशक्तीनिशी , तो दरारा , गूढतम प्रेम , गूढ करुणेची व दयेची जाणीव जी तुमच्या आयुष्यामध्ये आजवर अनुभवली नव्हती . हाच क्षण म्हणजे आपल्याला मिळालेली दैवी देणगी आहे , अशी भेट की , एका क्षणासाठी , तो पुसून टाकतो ती सीमारेषा जी आपल्याला भरीस पाडते मी , मी , मी , माझं , माझं , माझं म्हणायला , आणि त्याऐवजी , रुमीच्या कथेतील व्यक्तीप्रमाणं , आपण म्हणतो , " अरेच्चा , हे तर सर्व तूच आहेस . " हे सर्व तूच आहेस . आणि हेच सर्व आपण आहोत . आणि आम्ही , मी , व आपण सारे तुझाच अंश आहोत . सर्व ईश्वरीय , सर्व उद्दिष्टं , आपला जीवनस्रोत , आणि आपला अंत . तू आमची हृदयं तोडणाराही आहेस . तूच आहेस ज्याच्याकडं आम्ही सर्वांनी बघायचं , ज्याच्या हेतूसाठी आम्ही जगायचं , आणि ज्याच्या हेतूसाठी आम्ही मरायचं , आणि ज्याच्या हेतूसाठी आमचं पुनरुत्थान केलं जाईल ईश्वराला उत्तर देण्यासाठी की आम्ही किती करुणामय जीव आहोत . आज आमचा संदेश , आणि आमचा उद्देश , आणि तुमच्यापैकी जे आज इथं आहेत , आणि या करुणेच्या सनदेचा उद्देश आहे , आठवण करुन देणं . कारण कुराण नेहमीच आम्हाला लक्षात ठेवायला उद्युक्त करतं , एकमेकांना आठवण करुन देण्यासाठी , कारण सत्यज्ञान हे प्रत्येक मनुष्यप्राण्यात असतं . आपण हे सर्व जाणतो . आपल्यासाठी हे सर्व उपलब्ध आहे . जंगनं त्याला सुप्त मन संबोधलं असेल . आपल्या सुप्त मनातून , तुमच्या स्वप्नांतून , ज्याला कुराणमध्ये म्हटलं आहे , आपली निद्रीतावस्था , दुय्यम मृत्यु , क्षणिक मृत्यु . आपल्या निद्रीतावस्थेत आपल्याला स्वप्नं पडतात , आपल्याला दिव्य दृष्टी मिळते , आपण आपल्या शरीराच्या बाहेरही भ्रमण करतो , आपल्यापैकी बरेचजण , आणि आपल्याला विस्मयकारक गोष्टी दिसतात . आपण आपल्याला ज्ञात अशा अवकाशाच्या मर्यादेबाहेर भ्रमण करतो , आणि आपल्याला ज्ञात असणार्‍या कालमर्यादेबाहेर . पण हे सर्व त्या जगनिर्मात्याचं गुणगान गाण्यासाठी ज्याचं मूळ नाव आहे करुणेनं ओतप्रोत भरलेला दयाळू ईश्वर . ईश्वर , बोख , तुम्हाला जे नाव द्यावं वाटेल ते , अल्लाह , राम , ओम , कुठलंही नाव ज्यायोगे तुम्ही संबोधता अथवा मिळवता दैवी अस्तित्व , तेच निःसंशय अस्तित्वाचं निश्चित स्थान आहे , निःसंशय प्रेम आणि दया आणि करुणा , आणि निःसंशय ज्ञान व विद्वत्ता , ज्याला हिंदू म्हणतात सच्चिदानंद . भाषा वेगळी असेल , पण उद्देश एकच आहे . रुमीची अजून एक कथा आहे तिघांबद्दल , एक तुर्क , एक अरब , आणि तिसरा कोण ते मी विसरलो , पण माझ्यामते , तो मलय असू शकतो . एकजण अंगूर मागत असतो , एक जण , एक इंग्रज समजू , एकजण एनेब मागत असतो , आणि एक जण ग्रेप्स मागत असतो . आणि त्यांच्यात भांडण आणि वादविवाद होतात कारण , मला ग्रेप्स हवेत , मला एनेब हवेत , मला अंगूर हवेत , हे न कळाल्यामुळं की ते म्हणत असलेले शब्द वेगवेगळ्या भाषांमध्ये एकाच वस्तूबद्दल बोलतात . निःसंशय वास्तव ही एकच संकल्पना आहे , निःसंशय अस्तित्व ही एकच संकल्पना , कारण निःसंशय म्हणजेच , एकमेव , आणि परिपूर्ण व एकमेवाद्वितीय . हेच परिपूर्ण अस्तित्वाचं केंद्रीकरण , हेच परिपूर्ण शुद्धीचं केंद्रीकरण , जाणीव , करुणा व प्रेमाचं निःसंशय स्थान हेच ठरवतं देवत्वाचे मुलभूत गुणधर्म . आणि तेच असले पाहिजेत मानवी अस्तित्वाचे मुलभूत गुणधर्म . कारण मानवजातीची व्याख्या , बहुदा जीवशास्त्रीयदृष्ट्या शरीरविज्ञानशास्त्र म्हणून होते , पण ईश्वर मानवतेची व्याख्या करतो आपल्या परमार्थानुसार , आपल्या स्वभावानुसार . आणि कुराणात म्हटलंय , तो देवदूतांशी बोलतो व म्हणतो ,
(trg)="5"> " जेव्हा मी मातीपासून आदम निर्माण केला , आणि त्यामध्ये माझे प्राण फुंकले , तेव्हा अतिशय थकून गेलो . " देवदूत थकतात , मानवी शरीरासमोर नव्हे , तर मानवी आत्म्यासमोर . का ? कारण त्या आत्म्यामध्ये , मानवी आत्म्यामध्ये , दैवी श्वासाचा एक अंश असतो , ईश्वरीय आत्म्याचा एक अंश . हे बायबलच्या शब्दकोशातही व्यक्त केलं आहे जेव्हा आपल्याला शिकवलं जातं की ईश्वरीय प्रतिमेतूनच आपली निर्मिती झाली . ईश्वराचं वर्णन कसं कराल ? ईश्वराचं वर्णन म्हणजे परिपूर्ण अस्तित्व , परिपूर्ण जाणीव आणि ज्ञान आणि विद्वत्ता आणि परिपूर्ण करुणा व प्रेम . आणि , म्हणूनच , आपल्याला मनुष्य बनण्यासाठी , मनुष्य बनण्याच्या व्यापक अर्थानं , मानवतेच्या सर्वात सुखी कल्पनेनं , म्हणजेच आपल्यालाही बनावं लागेल योग्य वाहक आपल्यातील ईश्वरी श्वासाचे , आणि अस्तित्वाच्या परिपूर्णतेचा स्वतःमध्ये शोध घेत , जगण्याचे , अस्तित्वाचे , विद्वत्तेच्या , शुद्धीच्या , जाणीवेच्या गुणधर्माचे , आणि करुणामय व प्रेमळ बनण्याच्या गुणधर्माचे . माझ्या श्रद्धा परंपरांमधून मला हेच समजतं , आणि इतर श्रद्धा परंपरांच्या माझ्या अभ्यासातून मला हेच समजतं , आणि अशा समान व्यासपीठावर आपण एकत्र आलं पाहिजे , आणि जेव्हा आपण यासारख्या व्यासपीठावर एकत्र येतो , तेव्हा मला खात्री पटते की आपण एक सुंदर जग निर्माण करु शकतो . आणि माझा वैयक्तिक विश्वास आहे की , आपण ती मर्यादा गाठली आहे , आणि तुमच्यासारख्या लोकांच्या उपस्थितीनं व मदतीनं , आपण ईसाही चं भाकीत सत्यात उतरवू शकतो . कारण त्यानं सांगून ठेवलाय असा काळ जेव्हा लोक त्यांच्या तलवारींचे नांगर बनवतील आणि अजून परत युद्ध करणार नाहीत . आपण मानवी इतिहासाच्या त्या स्थितीप्रत आलो आहोत , जिथं आपल्याकडं पर्याय नाही . आपल्याला आपला अहंकार उतरवलाच पाहिजे अहंकारावर नियंत्रण आणलंच पाहिजे , मग तो वैयक्तिक अहंकार असेल , व्यक्तिगत अहंकार असेल , कौटुंबिक अहंकार , की राष्ट्रीय अहंकार , आणि सर्वजण त्या एकमेवाद्वितीयाचं गुणगान गावोत . धन्यवाद , आणि देव तुमचं भलं करो .

(src)="4"> ( तालियों की ध्वनि )
(trg)="6"> ( टाळ्या )

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(src)="1"> फायरफोक्स में नया क्या है ? अब आप फायरफोक्स से अपने कार्य आसानी और अधिक तेज़ी से पूरा कर सकते है अब आप पुनः डिजाईन किये गए होमपेज और पसंदीदा मेनू तक आसानी से पहुंच सकते है | जैसे की डाऊनलोड , बुकमार्क्स , हिस्ट्री , add - ons , sync and सेट्टिंग [ नया टैब पेज ] हमने नए टैब पेज में काफी सुधार किये हैं ! अब आप नए टैब पेज के साथ हाल ही में उपयोग की हुई sites को एक क्लिक से खोल सकते है नए टैब पेज को खोलने के लिए अपने browser में ऊपर की और ´+ ' चिन्ह पर क्लिक करें नया टैब पेज हिस्टरी से हाल ही में खोली गयी websites को thumbnail के रूप में प्रदर्शित करेगा | अब आप नए टैब पेज में thumbnails को अपनी रुचिअनुसार खिंच के क्रम बदल सकते है साईट को एक स्थान पर स्थायी रखने के लिए pushpin पर क्लिक करे ! साईट को अपने स्थान से हटाने के लिए ´X ´ पर क्लिक करे ! उपरी दायीं ओर दिए गए ´grid ´ चिन्ह पर क्लिक करके आप पुनः रिक्त नए टैब पेज पर जा सकते है ! तुरंत डाउनलोड करे नए फायरफोक्स को और इन नयी सुविधाओ का लाभ उठाये !
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(src)="1"> तो मैने सोचा , " मैं मौत पर बात करूँगी । " आज का ख़ास विषय यही लगता है । असल में , मेरी बात मौत के बारे में नहीं है । वो तो होगी ही । मै ये कहना चाहती हूँ कि मैं हैरान हूँ उस अमूल्य विरासत पर लोग अपने पीछे छोड जाते हैं और में उस पर ही कुछ कहना चाहती हूँ । आर्ट बुच्वल्ड अपनी हास्य की विरासत को एक विडियो में छोड गये जो उन्के मरने के बाद आया । मरते वक्त वो बोले ,
(trg)="1"> मी विचार केला " मी मृत्यूबद्दल बोलेन " सध्याची ती एक टुमच आहे . खरे तर मृत्यूबद्दल नाही . तो तर अटळ , भयंकर आहे . पण मला बोलायचे आहे ते मला आकर्षण आहे मृत्युनंतर माणसे मागे जे ठेवतात त्याबद्दल . मला त्याच्याबद्दल बोलायचे आहे आर्ट बखवाल्ड याने विनोदाचा वारसा एका चित्रफीतीतुन मागे ठेवला आहे त्याच्या मृत्युनंतर प्रकाशित झालेल्या त्यात तो म्हणतो

(src)="2"> " हेलो ! मैं आर्ट बुच्वल्ड हूँ और मैं बस अभी अभी मरा हूँ । " और माइक , जो मुझे गुल्पगोस में मिले , जो टेड आयोजित यात्रा थी , वो इंटरनेट पर अपनी डायरी लिख रहे हैं कैंसर से अपनी लडाई की कहानी कहते हुये । और मेरे पिता हाथ की लिखाई की विरासत छोड गये चिट्ठियों और एक नोटबुक के ज़रिये । अपने आख़िरी दो सालों में , जो बीमारी में बीते उन्होंने मुझ पर अपने विचारों से एक नोटबुक भर डाली । उन्होनें मेरी अच्छाईयों और कमियों पर लिखा , और सुधार के नुस्ख़े सुझाये , ख़ास किस्सों की याद दिलाते हुए , और मुझे आइना सा दिखाते रहे । जब वो चले गये , मैने पाया कि कोई मुझे चिट्ठी ही नहीं लिखता हाथ- की- लिखाई लुप्त होती कला हो गयी है । मतलब ईमेल और सोचते हुये टाइप करते जान बढिया है मगर पुरानी आदतों को नई के लिये क्यों दरकिनार कर दें ? हम चिट्ठियाँ और ईमेल दोनों ही क्यूंँ नहीं लिख सकते हैं ? कभी कभी लगता है कि वो सारे साल जो व्यस्तता में बिना पिता से बात किये , हँसे- बोले निकल गये कोई ले ले , और बस एक बार उन्हें कस के गले लगाने दे , मगर अब देर हो चुकी है । मगर इन्हीं लम्हों में मैं उनके लिखे ख़त निकाल कर पढती हूँ , और वो काग़ज़ के टुकडे जो उन्होंने छुये थे , उन्हें छू कर उनसे जुडाव महसूस करती हूँ । हो सकता है कि हम सब को अपने बच्चों के लिये कुछ ज़ायदाद छोड्नी ही चाहिये , - रुपये- पैसे के अलावा अपनेपन से भरी चीजों की कद्र -- कोई ऑटोग्राफ़ की किताब , कोई छू जाने वाली चिट्ठी टेड में आये महत्वपूर्ण लोगों में से केवल कुछ ही अगर सुंदर सा काग़ज़ ले कर --
(src)="3"> -- जॉन , ये रि- सायकल्ड होगा -- एक ख़ूबसूरत सा ख़त लिखें किसी को जिस से प्यार हो , हो सकता है कि हम एक बदलाव ले आयें जहाँ हमारे बच्चे बकायदा सुलेख सीखने लगें । तो मेरा क्या प्लान है अपने बेटे के लिये ? - आटोग्राफ़ जोडना । और यहाँ आये लेखकों को मैं उनके लिये तंग भी कर चुकी हूँ -- और सी डी भी , ( ट्रेसी ! ) मैं अपनी नोटबुक छपवाना चाहती हूँ । जब मैने अपने पिता के शरीर को अग्नि के हवाले होते देखा , मैंने उनकी चिता के पास बैठ कर लिखा । जाने कैसे ये होगा पर मैं अपने और पिता के विचारों को एकत्र करूँगी एक किताब में और उसे अपने बेटे के लिये छपवा कर छोड जाऊँगी । अंत में अपनी कुछ पंक्तियाँ कहूँगी जो मैने पिता कें अंतिम संस्कार पर लिखीं भाषाविद मेरी भूलों को माफ़ करें , क्योंकि पिछले दस सालों में मैने इन्हें कभी नहीं खोला और आज यहाँ आने के लिये ही ख़ास निकाला । फ़्रेम में तस्वीर , बोतल में राख़ , बोतल मॆ जैसे भर दी हो आग़ , खोले असलियत का ढक्कन , कहती देखो , आया बडप्प्न , तुम देते सुनाई , मुझे होना है दृढ , मगर दम है घुट्ता , जाती हूँ लड भावनाओं से भरे - दहाडते ये समंदर , रूह को भिगोते , उभरते इस कदर फिर बढी हूं आगे , निखरती निडर जैसा तुमने कहा दिन भर हर पहर । हौसलों की फ़ुस्फ़ुसाहट , मेरे गम- भँवर में , तुम्हीं हो वो नौका , ले चलो तक सहर , जिये जाना अच्छा निरंतर निरंतर । " धन्यवाद !
(trg)="2"> " हाय , मी आर्ट बखवाल्ड , मी नुकताच मेलो आहे " आणि माईक , जो मला TED च्या गालापागोस सहलीत भेटला तो मागे ठेवतो आहे सायबर अंतरिक्षात नोंदी त्याच्या कॅन्सर च्या प्रवासाच्या . आणि माझ्या वडिलांनी मागे ठेवला आहे त्यांच्या हस्ताक्षराचा वारसा पत्रे आणि नोंदी यांच्या स्वरूपात . आयुष्याच्या शेवटच्या दोन वर्षात , जेह्वा ते आजारी होते , त्यांनी एक टाचण वही भरून माझ्याबद्दलचे विचार लिहिले . माझी बलस्थाने , माझ्या उणीवा याबद्दल लिहिले आणि सुधारण्याबद्दल हळुवार सुचना . विशिष्ठ घटनाचा उल्लेख करत , माझ्या पुढे आरसा धरला माझ्या आयुष्याचा . ते वारल्यावर माझ्या असे लक्षात आले कि आता मला कोणीच काही लिहित नाही हस्त लेखन ही लोप पावत चाललेली कला आहे मला टाइप करताना विचार करणे आणि इ मेल आवडते पण म्हणून जुन्या सवयी का सोडून द्यायच्या ? का आपण आयुष्यात पत्र लेखन आणि इ मेल या दोन्ही करत नाही ? काही वेळेला विनिमय करावा असे वाटते त्या वर्षांचा ज्या वेळी मी वडिलांच्या जवळ बसून गप्पा मारण्यात खूप दंग होते आणि विनिमय करावा एका मिठीच्या बदल्यात . पण उशीर झाला आहे . पण उशीर झाला आहे . पण अशा वेळी मी त्यांची पत्रे काढते आणि ती वाचते . त्यांनी हात लावलॆले पत्र आता माझ्या हातात असते आणि मला त्यांचा छटास्पर्श झाला असे वाटते . तर मग आपण आपल्या मुलांसाठी ठेवण्याची गरज आहे एक मौलिक वारसा , पण आर्थिक , सांपत्तिक नाही तर व्यक्तिगत छटा असलेली मुल्यवान गोष्ट स्वाक्षरी वही , अंतःकरणाला स्पर्शणारे पत्र . या शक्तिशाली TED च्या अंशमात्र श्रोत्यांनी जरी स्फूर्ती घेऊन एक सुंदर कागद विकत घेतला जॉन , तो पुनर्निर्मित असेल --- आणि एक छान पत्र लिहिले एकाद्या प्रिय व्यक्तीला , तर प्रत्यक्षात आपण एक क्रांतीची सुरुवात करू . ज्यात आपली मुले पत्र लेखनाच्या वर्गात जातील तर माझ्या मुलासाठी काय ठेवायची योजना आहे माझी ? मी स्वाक्षरी वह्या जमवत आहे आणि तुमच्यातील लेखक , श्रोत्यांमधल्या , मी तुमचा पिच्छा पुरविणार आहे सह्यांसाठी आणि CD सुद्धा , ट्रेसी मी स्वतःची वही प्रसिद्ध करणार आहे मी जेव्हा अग्नीच्या ज्वालांनी गिळलेले वडिलांचे शरीर पाहिले मी चितेच्या शेजारी बसून लिहिले मला कल्पना नाही मी कसे करणार याची पण मी त्यांचे आणि माझे विचार संकलित करण्यास बांधील आहे . एका पुस्तकात . आणि त्या प्रकाशित पुस्तकाचा वारसा मुलासाठी ठेवण्यास . मी हे संपविते , काही कडवी वाचुन , मी लिहिलेली माझ्या वडिलांच्या अन्त्य संस्काराच्या वेळी आणि भाषातज्ञहो , माझ्या व्याकरणाबद्दल मला क्षमा करा , कारण गेल्या दहा वर्षात मी त्याच्याकडे पहिले नाही . इथे येण्यापूर्वी मी प्रथमच ते बाहेर काढले . " चौकटीतील चित्र , बाटलीतील राख अमर्यादित उर्जा बाटलीत जखडलेली , भाग पाडते आहे मला वास्तवाला तोंड देण्यास भाग पाडते आहे मला , वयात येणे हाताळण्यास . मी ऐकते आहे आणि मला माहित आहे मी शक्तिवान व्हावे असे तुम्हाला वाटते पण या क्षणी माझे शोषण होते आहे , विळखा घातलेल्या आणि गुदमरविणार्या या संतप्त भावना प्रवाहाने आत्मा पावन करण्यासाठी आसुसलेल्या , बाहेर पडणार्या घट्ट रोवलेल्या , पुनः एकदा , लढणार्या आणि भरभराट होणार्या अगदी तुम्ही शिकविल्याप्रमाणे . तुमचे प्रोत्साहित करणारे कानगुज माझ्या गोंधळलेल्या नैराश्याला जवळ घॆवुन शहाणपणाच्या काठावर स्थिरावते आहे , पुनः जगण्यासाठी आणि पुनः प्रेम करण्यासाठी . " धन्यवाद ( टाळ्या )

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(src)="1"> Shuruat se Web saral , juda hua , khula aur surakshit tha jise banaya gaya achhai ki shakti ke roop me yeh ban sakta tha kuch aur bada , jinda , saans leta hua
(src)="2"> humse jude - humme apke sahare ki jarurat hai aaj hi daan karein
(trg)="1"> सुरुवातीला वेब ( जागतिक जाल ) साधे होते , जुळलेले होते खुले , सुरक्षित चांगल्याला बळ पुरवण्यासाठी निर्माण केलेले ते याहूनही उत्कृष्ट होऊ शकते . एक जिवंत , श्वासोच्छवास करणारी परिसंस्था मानवतेच्या सेवेसाठी नवीन शोध लागण्यासाठी सार्वजनिक स्त्रोत आणि संधी एक जागा- तुमची स्वप्नं निर्माण करण्यासाठी पण त्या सुरुवातीच्या दिवसांत एखाद्य परिसंस्थेप्रमाणेच वेब ला संगोपनाची आवश्यकता होती . जशीजशी त्याची वाढ होत गेली , उपभोक्त्यांना नवनव्या समस्या जाणवू लागल्या . पॉप - अप्स . व्हायरस . निवडीचे स्वातंत्र्य नसणे . भिंतींनी बंदिस्त असणारी मजकुराची उद्याने . हे वेब जाळे विरत होते . हे मंद , क्लिष्ट , घाबरवणारे होते . उपभोक्ते विचारू लागले ... वेब म्हणजे " हे " ? वेब याहून चांगले असू शकते का ? कोडिंग करणारे , डिझाईन करणारे , विचारवंत यांनी अंतर्भूत असलेला लोकांचा लहान समूह विश्वास ठेवत होता की असू शकते . त्यांच्याकडे एक साहसी कल्पना होती . की एक लहानशी बिना- नफा आणि जागतिक कम्युनिटी( समाज ) काहीतरी जास्त चांगले निर्माण करू शकते . आणि नवीन कल्पना आणि संशोधने वेब वर आणू शकते . त्यांनी याला मोझिला प्रोजेक्ट( प्रकल्प ) असे म्हटले . त्यांनी एक नवीन प्रकारचा वेब ब्राउझर बनवून सुरुवात केली . ज्याला आपण आज फायरफॉक्स नावाने ओळखतो . आणि त्यांनी याला विना- नफा बनवले . त्यामुळे जे लोक वेब वापरत होते त्यांना नेहमीच प्राधान्य दिले गेले . एका सॉफ्टवेअर पेक्षा हे एक व्यासपीठ अधिक होते . जे कोणीही त्यांच्या कल्पनांवर उभारणी करण्यासाठी वापरू शकते . त्रास कमी झाले . आज आपल्याला माहित असलेल्या वेब च्या पायाभूत संकल्पना निर्माण होऊ लागल्या आता वेब ही अशी जागा आहे जेथे तुम्ही कल्पना करू शकता अशा जवळजवळ सगळ्याची निर्मिती करू शकता मोझिला आणि फायरफॉक्स ही संधी लोकांना देण्यासाठीच निर्माण झाले आहेत . आणि उपभोक्त्यांच्या वतीने उभे राहण्यासाठी, जेथे निवड आणि ताबा बऱ्याच वेळा धोकादायक असतात . पण फायरफॉक्स जर फक्त सुरुवात असेल तर ? जर हा एका महाकाय गोष्टीचा भाग असेल तर ? उपभोक्त्यांची वैयक्तिकता आणि फायरफॉक्स भ्रमणध्वनी पासून ते अॅप्स आणि आयडेंटिटी आम्ही वेब च्या मर्यादा दररोज दूर करत आहोत . आणि आम्ही सॉफ्टवेअरच्याही पलीकडे जात आहोत . आम्ही वेब निर्माण करणाऱ्यांची पिढी घडवायला मदत करत आहोत . आमचा विश्वास आहे कि वेब ही अशी जागा आहे जेथे कोणीही आपली स्वप्नं उभारू शकतो . म्हणूनच आम्ही फायरफॉक्स बनवतो . म्हणूनच हजारो स्वयंसेवक आमची उत्पादने तयार करायला मदत करतात . म्हणूनच जगातील लाखो लोक आमचे सॉफ्टवेअर वापरतात . पण सर्वात महत्वाचे म्हणजे - ज्यासाठी आम्ही तुम्हाला नेहमीच प्राधान्य देतो . आणि जे देत नाहीत त्यांच्याविरुद्ध उभे राहतो . लाखो लोक आम्हाला मोझिला फायरफॉक्स साठी ओळखतात . पण आम्ही याहून खूपच जास्त आहोत . आम्ही विना- नफा आहोत . आपण सर्वं प्रेम करत असलेल्या वेब ला वाचवण्यासाठी संघर्ष करत आहोत . आमच्यात सहभागी व्हा - आम्हाला तुमच्या मदतीची गरज आहे . आजच देणगी द्या .

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(src)="1"> मुझे पता है कि आपको क्या लग रहा है । आप सोच रहे हैं कि मैं रास्ता भूल गयी हूँ , और अभी कोई मंच पर आयेगा और मुझे चुपचाप वापस अपनी सीट तक पहुँचा जाएगा । ( ठहाका ) दुबई में ये अक्सर मेरे साथ होता है ।
(trg)="1"> तुम्हाला काय वाटतय याची मला माहिती आहे . तुम्हाला वाटतय मी चुकलेय कुठेतरी . आणि आता एक मिनिटात कोणीतरी या व्यासपीठावर येऊन मला सोबत घेऊन माझे आसन दाखवण्यास मार्गदर्शन करेल .
(trg)="2"> ( टाळ्यांचा गजर ) हे मला दुबईत नेहेमीच अनुभवास मिळते . तुम्ही दुबईत सुट्टीवर आलात काय ?

(src)="3"> ( हँसी )
(trg)="3"> ( हास्य ) मुलांना भेटावयास आल्या आहात का ? किती दिवस आहात तुम्ही इथे दुबईत ? खरे तर , आम्हाला आशा आहे तुम्ही काही दिवस रहाल इथे दुबईत . मी तीस वर्षापासून खाडीप्रदेशातमध्ये ( गल्फ मध्ये ) राहतेय आणि शिकवते आहे .

(src)="4"> " बच्चों से मिलने आयी हैं ? " " कितने दिन रुकेंगी ? " असल में , मैं काफ़ी दिन और रुकना चाहती हूँ । मैं खाडी में रह रही हूँ और पढा रही हूँ करीब पिछले तीस साल से भी ज्यादा से । ( ठहाका ) और इतने समय में , मैनें बहुत सारे बदलाव देखे हैं । और इसकी संख्या काफ़ी चौंकाने वाली है । और आज मैं आपसे बात करना चाहती हूँ भाषाओं के खोने के बारे में और इंग्लिश के सारी दुनिया में फ़ैलने के बारे में । मैं आपको अपने एक दोस्त के बारे में बताना चाहती हूँ जो कि अबु धाबी में व्यस्कों को इंग्लिश पढाते हैं । और एक दिन , उन्होंने सोचा कि उन सब को बगीचे में ले जा कर प्राकृतिक वस्तुओं के नाम आदि सिखायेंगी । मगर असल में उन्हें ही सीखने को मिले तमाम अरब शब्द उन सब स्थानीय पौधों के , और उनके इस्तेमाल भी -- दवाई के रूप में , सौंदर्य प्रसाधन के रूप में , खाने में , आदि । इन विद्यार्थियों को ये जानकारी कहाँ से मिली थी ? ज़ाहिर है , अपने दादा- दादी , नाना- नानी से और परदादा , परनाना से भी । अलग से ये बताना ज़रूरी नहीं कि कितना महत्वपूर्ण है कि हम बातचीते करें पीढियों के बीच । मगर दुखद है कि , आज , भाषाओं मर रही हैं बहुत तेज़ दर से । हर १४ दिन में एक भाषा लुप्त हो जाती है । और ठीक वहीं , इंग्लिश विश्व- भाषा बन कर उभर रही है । क्या ये बातें संबंधित हैं ? मुझे नहीं पता । मगर मैं ये जानती हूँ कि मैनें बहुत सारे बदलाव देखे हैं । जब मैं पहली बार खाडी में आई , तो मैं कुवैत गयी उन दिनों में जब वहाँ जाना कठिन था । असल में , उतनी पुरानी बात नहीं है । थोडा ही पहले की बात है । मगर फ़िर भी , मुझे ब्रिटिश काउंसिल ने नौकरी दी थी २५ और अध्यापकों के साथ । और हम पहले गैर- इस्लामी लोग थे जिन्होने कुवैत के सरकारी स्कूलों में पढाया । हमें इंग्लिश पढाने के लिये लाया गया था क्योंकि सरकार देश को आधुनिक बनाना चाहती थी और नागरिको को क्षमता देना चाहती थी , शिक्षा के ज़रिये । और बिलकुल ही , यू . के . ने फ़ायदा उठाया तमाम सारे तेल के संसाधनों का । ओके । और जो बदलाव मैने देखा है वो ये है कि - कैसे इंगलिश पढाना बदला है दोनो ओर को फ़ायदे देने वाली क्रिया से इतने बडे वैश्विक व्यापार में , जो आज वो है । वो सिर्फ़ स्कूल के कोर्स में पढायी जाने वाली विदेशी भाषा नहीं रह गयी है । न ही वो बपौती रह गयी है इंग्लैण्ड की । वो ऐसी पार्टी बन गयी है जिसमें इंग्लिश बोलने वाले हर राष्ट्र को शामिल होना ही है । और क्यों न हो ? आखिरकार , सबसे बढिया शिक्षा -- विश्व के विद्यालयों की लिस्ट के हिसाब से --- उन विश्वविद्यालयों में -- जो कि यू . के . और यू . एस . में हैं । तो हर कोई इंग्लिश की पढाई करना चाहता है , ज़ाहिर तौर पर । मगर यदि आप इंगलिश के मूल- वक्ता नहीं हैं , तो आपको एक परीक्षा देनी होती है । क्या यह सही हो सकता है कि कि किसी विद्यार्थी को इसलिये दाखिला न मिले कि उसकी भाषा पर पकड ठीक नही है ? शायद कोई ऐसा कम्प्यूटर वैज्ञानिक हो जो जीनियास हो । क्या उसे भाषा- कौशल की उतनी ही ज़रूरत पडेगी , जितनी कि , एक वकील को ? देखिये , मुझे तो ऐसा नहीं लगता । हम इंग्लिश के अध्यापक अक्सर ऐसे लोगों को हटा देते हैं । उनके सामने रुको का साइन- बोर्ड लगा कर , और उन्हें हम उनके रास्ते में ही रोक देते हैं । वो अपने सपनों को साकार नहीं कर सकते , जब तक कि वो इंग्लिश न सीख लें । चलिये , दूसरी तरह से कहती हूँ , अगर मुझे सिर्फ़ एक भाषा बोलने वाल डच व्यक्ति मिले , जिसके पास कैंसर का इलाज है , तो क्या मैं उसे ब्रिटिश विश्वविद्यालय में आने से रोकूँगी ? मैं तो बिलकुल भी नहीं रोकूँगी । मगर सच मे , हम बिलकुल यही कर रहे हैं । हम इंग्लिश अध्यापक वो चौकीदर हैं । और पहली आपको हमें संतुष्ट करना होगा कि आपकी अंग्रेजी ठीक- ठाक है । ये बहुत खतरनाक हो सकता है कि हम बहुत ज्यादा ताकत दे दें समाज के एक छोटे से हिस्से को । शायद ये रुकावट सारे विश्व में फ़ैल जाये । है न ? मगर , आप कहेंगे , कि " शोध के बारे में मेरी क्या राय है ? वो तो पूरा ही अंग्रेजी में है । " तो सारी किताबें इंग्लिश में हैं , सारे जर्नल इंग्लिश में हैं , मगर ये खुद को ही स्थापित करते जाने वाली बात है । ये तर्क और भी ज्यादा अंग्रेजी जानने को बढावा देता है । और ये इसी तरह बढता जाता है । मैं आपसे पूछती हूँ , अनुवाद का क्या हुआ ? अगर आप इस्लाम के स्वर्ण काल के बारे में सोचें , तो आप पायेंगे कि तब बहुत अनुवाद होता था । वो लेटिन और ग्रीक से अनुवाद करते थे , अरबी मे , फ़ारसी में , और फ़िर वहाँ से आगे , यूरोप की जर्मन मूल की भाषाओं मे , और रोमन भाषाओं में । और इस तरह से ही यूरोप का अँधकार- युग ख्त्म हुआ । देखिये , मुझे गलत मत समझिये ; मैं इंग्लिश पठन- पाठन के ख़िलाफ़ नहीं हूँ , अँग्रेज़ी अध्यापक ध्यान दें । मुझे ये बात बहुत अच्छी लगती है हमारे पास एक वैश्विक भाषा है । आज हमें ऐसी वैश्विक भाषा की ज़रूरत है । मगर मैं उसके रुकावट के रूप में विकसित होने के ख़िलाफ़ हूँ । क्या हम सच में चाहते हैं कि केवल ६०० भाषाएँ हों और मुख्य भाषा इंग्लिश हो , या चीनी हो ? हमें उस से ज्यादा चाहिये । हम कहाँ पर लाइन खींचें ? आज का सिस्टम बुद्धिमत्ता को इंगलिश की जानकारी से कनफ़्यूज़ करता है , जो कि बिल्कुल ही गलत है । ( अभिवादन ) और मैं आपको याद दिलाना चाहती हूँ कि उन महान हस्तियों को , जिनके कंधों पर आज के ज्ञान और बुद्धि टिकी है , इंगलिश नहीं पढनी पडती थी , न हि उन्हें इंग्लिश की कोई परीक्षा पास करनी होती थी । मिसाल के तौर पर , आइंस्टाइन । और उन्हें तो स्कूल में बुद्धू समझा जाता था क्योंकि असल में , वो डिस्लेक्सिक थे । मगर ये संसार का सौभाग्य ही था , कि उन्हें अँग्रेज़ी की परीक्षा नहीं देनी पडी । क्योंकि सन १९६४ तक टोफ़ेल ( TOEFL ) परीक्षा की शुरुवात ही नहीं हुई थी , जो कि अमरीकी परीक्षा है अंग्रेज़ी की । और अब तो उसके बिना कुछ होता ही न । इंग्लिश- कौशल मापने के आज तमाम तरीके हैं और कई लाख विद्यार्थी उनमें शरीक हो रहे है , साल दर साल । और आपको और मुझे लग सकता है , कि उनमें लगने वाली फ़ीस , ठीक ही है , बहुत महँगी नहीं , . मगर वो रुकावट पैदा करती है करोंडों गरीब लोगों की राह में । तो इसलिये , उन्हें तो हम बिना परीक्षा के ही भगा दे रहे हैं । ( अभिवादन ) मुझे एक खबर याद आ रही है , हाल ही की : शिक्षा : विभाजन का ज़रिया अब मुझे समझ आया है । मैं समझती हूँ कि क्यों लोग इंग्लिश पर इतना ध्यान देते हैं वो अपने बच्चों को सफ़लता प्राप्त करने लायक बनाना चाहते हैं । और वो करने के लिये , उन्हें पाशचात्य शिक्षा की आवश्यकता है । क्योंकि , ज़ाहिर है , सबसे अच्छी नौकरियाँ उन्हीं को मिलती हैं जो पश्चिमी विश्वविद्यालयॊं में पढ्ते है , जैसा मैने पहले कहा था । ये एक घुमावदार मृग- मरीचिका है । ठीक है ? चलिये मैं आपको दो वैज्ञानिकों की कहानी सुनाती हूँ , दो इंग्लिश वैज्ञानिकों की । \ वो एक प्रयोग कर रहे थे जैनेटिक्स पर , जानवरो के अगले पाँवों और पिछले पाँवो पर आधारित । मगर उन्हें वो निष्कर्श नहीं मिल रहे थे जो वो चाहते थे । उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वो आखिर क्या करें , जब तक कि एक जर्मन साइंसदान नही आया , जिसने ये देखा कि वो लोग दो अलग अलग शब्दों से अगले और पिछले पाँवो के बारे में बात कर रह थे . जबकि जैनेटिक्स को पाँवो के अगले या पिछले होने से फ़र्क नहीं पडता , और न ही जर्मन भाषा को । बस धडाके से समस्या हल हो गयी । यदि आप कोई विचार सोच नहीं पायेंगे , तो आप अटक जायेंगे । मगर यदि दूसरी भाषा वो विचार सोच सके , तो साझेदारी से बहुत कुछ पाया जा सकता है , और सीखा जा सकता है । मेरी बेटी , इंगलैंड से कुवैत यी थी । उसने विज्ञान और गणित अरबी भाषा में सीखा है । एक अरबी विद्यालय में । और उसे उस ज्ञान को अंग्रेजी में अनुवादित करना पडा अपने व्याकरण विद्यालय में । और वो कक्षा में अव्वल थी इन विषयों में । जिस से ये पता चलता है कि जब विद्यार्थी विदेश से हमारे पास आता है , हम शायद उनके ज्ञान को यथोचित सम्मान नहीं दे रहे है , और उन्हें ज्ञान अपनी भाषा में होता है । जब एक भाषा की मृत्यु होती है , हमें नहीं पता चलता है कि उस भाषा के साथ हम क्या खो रहे हैं । पता नहीं आपने सी . एन . एन पर देखा या नहीं -- वो हीरो पुरस्कार देते हैं - एक कीन्या के चरवाहे लडके को जो कि अपने गाँव में रात को पढ नही पाता था , क्यों तमाम और बच्चों की तरह ही उसका मिट्टी तेल का दिया , धुँआ करता था , और आँखें खराब करता थी । और ऐसे भी , उस के पास पर्याप्त तेल नहीं होता थी , क्योंकि एक डालर प्रतिदिन में आप क्या क्या खरीद सकते हैं ? तो उसने अविष्कार किया एक मुफ़्त सौर- लालटेन का । और अब , उसके गाँव के बच्चे , वही नंबर लाते है , जो कि वो बच्चे जिनके घरों में बिजली है । ( अभिवादन ) जब उसे वो पुरस्कार मिला , उसने ये प्यारे शब्द कहे : " बच्चे अफ़्रीक को बदल सकते हैं - एक अंधकार- युक्त महाद्वीप से , एक रोशनी भरे महाद्वीप में " एक छोटा सा आयडिया , मगर उसके कितने बडा असर हो सकता है । जिन लोगों के पास रोशनी नहीं है , चाहे दिये की या फ़िर ज्ञान की , वो हमारे अंग्रेजी की परीक्षाओं को पास नहीं कर सकते हैं , और हमें कभी पता नहीं लगेगा कि उनके पास क्या ज्ञान है । आइये उन्हें और स्वयं को अँधकार से निकालें । विविधता का सम्मान करें । अपनी जुबान पर काबू करें । उसे महान विचारों को फ़ैलाने में इस्तेमाल करें । ( अभिवादन ) धन्यवाद । ( अभिवादन )
(trg)="4"> ( टाळ्यांचा गजर ) आणि या काळात , मी बरेच बदल पाहिले आहेत . आणि ती सांख्यिकी जरा धक्कादायक आहे . मला तुमच्याशी आज बोलायचय ( इतर ) भाषांची हानी आणि इंग्रजीच्या जागतिकीकरणाबाबत मी तुम्हाला माझ्या मैत्रिणीबाबत सांगते , ती अबू धाबीत प्रौढांना इंग्रजी भाषा शिकवायची . एक दिवस ती सर्व विद्यार्थ्यांना बागेत निसर्गासंबंधीचे ( इंग्रजी ) शब्द शिकवण्यासाठी घेऊन गेली . पण खरे तर ती स्वतःच स्थानिक झाडांची सर्व अरबी नावे आणि उपयोग शिकून गेली -- त्यांचे उपयोग - वैद्यकीय , सौंदर्यवर्धनातील , स्वयंपाकातील , वनौषधींसंबंधी . हे सर्व ( स्थानिक झाडांचे ) ज्ञान विद्यार्थ्यांना कुठे मिळाले ? त्यांच्या पूर्वीच्या पिढ्यांपासून - आई , वडील , आजोबा , पणजोबा वगैरे . त्यांच्या पूर्वीच्या पिढ्यांपासून - आई , वडील , आजोबा , पणजोबा वगैरे . या सर्व पिढ्यांमध्ये ( त्यांच्या भाषेत ) बोलाचाली होणे किती महत्त्वाचे आहे हे सांगण्याची आवशक्यता नाहीये . या सर्व पिढ्यांमध्ये ( त्यांच्या भाषेत ) बोलाचाली होणे किती महत्त्वाचे आहे हे सांगण्याची आवशक्यता नाहीये . या सर्व पिढ्यांमध्ये ( त्यांच्या भाषेत ) बोलाचाली होणे किती महत्त्वाचे आहे हे सांगण्याची आवशक्यता नाहीये . सध्या या भाषा प्रचंड वेगाने मरतायत . सध्या या भाषा प्रचंड वेगाने मरतायत . सध्या या भाषा प्रचंड वेगाने मरतायत . प्रत्येक १४ दिवसात एक भाषा नष्ट होतेय . आणि , याच आजच्या काळात , इंग्रजी ही बिनविरोध जागतिक भाषा आहे .
(trg)="5"> ( इतर भाषा मरण्याचे ) इंग्रजीशी काही संबंध आहे ? मला माहित नाही . परंतु मला हे माहिती आहे की मी बरेच बदल पाहिले आहेत . मी जेंव्हा प्रथम गल्फला आले , मी कुवेतला आले त्या काळात तिथे काम करणे अतिशय कठीण होते फार काळ नाही झाला त्याला ते बहुतेक लवकर झाले . तरीही त्या काळात , ब्रिटीश कौन्सिलने माझी नेमणूक केली इतर २५ शिक्षकांबरोबर आणि आम्ही कोणीही मुस्लीम नसणारे प्रथमच कुवेतच्या शाळेत शिकवणारे शिक्षक होतो . आम्हाला इंग्रजी शिकवण्यासाठी आणले होते कारण सरकारला देशाचे आधुनिकीकरण करायचे होते आणि शिक्षणामार्फत नागरिकांचा विकास करावयाचा होता . अर्थात , यात इंग्लंडचा फायदा झाला त्या गल्फच्या पेट्रोलच्या संपत्तीपासून ठीक आहे . आणि हा प्रमुख बदल मी पहिला आहे - इंग्रजी शिकवणे हे कसे बदलले आहे परस्परहिताच्या आचरणापासून ते♫ आजचा प्रचंड आंतरराष्ट्रीय धंदा होण्यापर्यंत .
(trg)="6"> ( इंग्रजी भाषा ) आता परदेशी भाषा म्हणून कुठल्याही शाळेच्या अभ्यासक्रमात नाही . आणि इंग्लंडचा एकटा मक्ता राहिला नाहीये तिच्यावर . आणि इंग्लंडचा एकटा मक्ता राहिला नाहीये तिच्यावर . ती मिळून गेलीय जगातील प्रत्येक इंग्रजी बोलणाऱ्या देशात . आणि का नाही ? शेवटी , अत्युत्तम शिक्षण हे जागतिक विद्यापीठांच्या दर्जेनुसार इंग्लंड आणि अमेरिकेच्या विद्यापीठातच मिळते . इंग्लंड आणि अमेरिकेच्या विद्यापीठातच मिळते . म्हणजे , आता सगळ्यांचे शिक्षण इंग्रजीत हवे हे साहजिकच झाले . पण तुम्ही जर स्थानिक भाषा बोलणारे असाल तर , तुम्हाला परीक्षा पास व्हावी लागणार आता हे बरोबर आहे का ? विधार्थ्याला नकार देणे त्याच्या फक्त ( इंग्रजी ) भाषेवरील क्षमतेवरून ? कदाचित , तो कोणी संगणक शास्त्रज्ञ असेल अतिशय बुद्धीमान उदा : त्याला वकील होण्यासाठी त्याच ( इंग्रजी ) भाषेची गरज आहे ? माझ्या मते नाही . आम्ही इंग्रजी शिक्षक त्या ( स्थानिक भाषा बोलणाऱ्या ) विद्यार्थ्यांना कायम नाकारतो . आम्ही त्यांना नकार देतो . आणि त्याना रस्त्यातच थांबवतो . त्यांची ( शिक्षणाची ) स्वप्ने त्या नकारामुळे ते पूर्ण करू शकत नाहीत . जोपर्यंत त्यांना इंग्रजी येत नाही तोपर्यंत . आता मी हे असे समजावून सांगते . समजा , मी फक्त डच भाषा बोलणाऱ्या एका माणसाला भेटले ज्याच्याकडे कॅन्सरचा उपाय आहे मी त्याला ब्रिटीश विद्यापीठात प्रवेश करावयास/ शिकण्यास आडवेन का ? नाही , बिलकुल नाही . पण खरे तर , आम्ही नेमके तेच ( प्रवेश न देणे ) करतो . आम्ही इंग्रजी शिक्षक हे त्या प्रवेशद्वारावरचे पहारेकरी आहोत . आणि तुम्ही आमचे आधी समाधान केले पाहिजे की तुम्हाला नीटनेटके इंग्रजी येते याचे आता लोकांच्या छोट्या समूहाला एवढी जास्त ताकद देणे हे धोकादायक होऊ शकते . कदाचित हा अटकाव सार्वत्रिक असावा . ठीक आहे . तुम्ही म्हणताय " पण , संशोधनाचे काय ? ते सगळे इंग्रजीमध्ये आहे . " पुस्तके इंग्रजीमध्ये आहेत . संशोधनाची नियतकालिके इंग्रजीमध्ये आहेत . ते स्वपुर्ततेचे भाकीत झाले . ते इंग्रजी आवश्यकतेतून सुरू होते . आणि मग ( चक्र ) चालू राहते . मी हे विचारते - भाषांतराचे काय झाले ? तुम्ही जर इस्लामी सुवर्णयुगाचा विचार केला तर , त्या काळात बरेच भाषांतर झाले . त्यांनी लॅटीन आणि ग्रीकचे भाषांतर अरबी आणि फारसीमध्ये केले . आणि त्याचे भाषांतर युरोपमध्ये जर्मन भाषेत आणि रोमन भाषेत झाले . आणि मग युरोपच्या अंधारमय युगावर प्रकाश पडला . आता मला चुकीचे समजू नका मी इंग्रजी शिकवण्याच्या विरुद्ध नाही सर्व इंग्रजी शिक्षकांनो आपली एक जागतिक भाषा आहे हे मला आवडते . एक जागतिक भाषा असणे ही आजच्या काळाची गरज आहे . पण माझा विरोध आहे त्या भाषेचा उपयोग प्रतिबंध/ अडथळा म्हणून करण्याचा . खरच आपल्याला ६०० भाषा नष्ट करून इंग्रजी किंवा चीनी प्रमुख भाषा करायची आहे का ? आपल्याला यापेक्षा जास्त काहीतरी हवे आहे . आणि याला ( एकभाषीयतेला ) सीमा आहे की नाही ? हि ( एकभाषीयतेची ) पद्धत बुद्धिमत्तेला इंग्रजी किती येते यास जोडते हे खरे तर अवास्तविक आहे .

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(src)="1"> एक बच्चे का जन्म होता है और काफी लम्बे समय तक वह एक उपभोक्ता रहता है वो एक सचेतन सहयोगी नहीं हो सकता वो पूरी तरह से निरीह है उसे अपनी रक्षा करना भी नहीं आता जबकि उसके पास बचे रहने का सहजज्ञान है उसे जीवित रहने के लिए माँ की जरुरत होती है वो अपने पालनकर्ता पर संदेह नहीं कर सकता उसे पूर्ण आत्मसमर्पण करना होता है जिस तरह हम ऑपरेशन के पूर्व अपने को एनेस्थेटिस्ट के हवाले करते हैं उसे पूर्ण आत्मसमर्पण करना होता है यह काफी विश्वसनीयता प्रणामित करता है अर्थात भरोसेमंद व्यक्ति विश्वास को तोड़ नहीं सकता जैसे बच्चा बड़ा होता है उसे पता चलता है कि विश्वसनीय व्यक्ति विश्वास का अतिक्रमण कर रहा है उसे तो अतिक्रमण का मतलब भी नहीं पता होता इसलिए बच्चा खुद को दोषी मानता है अलफ़ाज़ रहित दोष जिसे हल करना बहुत मुश्किल है शब्द रहित आत्मदोष जैसे जैसे बच्चा वयस्क होता है अब तक वो एक उपभोक्ता था पर मनुष्य का विकास उसकी सहयोग क्षमता पर निर्भर करता है उसके सहभागी या सहयोगी होने पे जबतक हम खुद को सुरक्षित नहीं समझते हम सहयोग नहीं कर सकते खुद को बड़ा महसूस करते हमें लगता हमारे पास काफी है संवेदनशील होना कोई मजाक नहीं है यह सरल भी नहीं है व्यक्ति को अपने भीतर विशाल हृदयता तलाशनी होती है विशाल हृदयता हमारे इर्द गिर्द केन्द्रित होनी चाहिए पैसों के लिहाज से नहीं ना ही अपनी ताकत के लिहाज से और ना ही सामाजिक हैसियत से ये हमारे इर्द गिर्द केन्द्रित होनी चाहिए स्वयं आत्मबोध आत्मबोध पर केन्द्रित , विशाल हृदयता , सम्पूर्णता अगर ऐसा नहीं है तो संवेदना एक शब्द मात्र और स्वप्न मात्र से ज्यादा कुछ नहीं आप कभी कभी संवेदनशील , करूणामय हो सकते हैं .. समानुभूति से ज्यादा द्रविद होते हैं संवेदनशीलता की तुलना में भगवन का धन्यवाद की हम समानुभूति रखने वाले हैं जब कोई दर्द में होता है तो हम उसका दर्द महसूस करते हैं टेनिस के फ़ाइनल मुकाबले में दो लड़के संघर्ष करते है हरेक के पास दो गेम होते है मैच का रुख किधर भी मुड सकता है अभी तक उन्होंने जो पसीना बहाया है संघर्ष किया है उसका कोई मतलब नहीं रहता एक व्यक्ति विजयी होता है टेनिस का शिष्टाचार यह है की दोनों खिलाडी नेट तक आते हैं और एक दुसरे से हाथ मिलाते है विजेता हवा में मुक्का उछालता है और जमीन को चूमता है अपनी कमीज़ फेंकता है जैसे किसी को इसका इंतज़ार था ( खिलखिलाहट ) और इस विजयी खिलाडी को नेट तक आना होता है जब वह नेट पर पहुँचता है , तो आप देखते हैं, उसका पूरा चेहरा बदल जाता है . ऐसा लगता है जैसे कि वह चाह रहा है कि वो न जीतता क्यों ? समानुभूति .. हमदर्दी ऐसा है मानव हृदय कोई भी मानव हृदय समानुभूति , हमदर्दी से वंचित नहीं है¥ कोई धर्म उसे ध्वस्त नहीं कर सकता है कोई संस्कृति, कोई देश, और राष्ट्रवाद कुछ भी उसे छू नहीं सकता क्योंकि यह समानुभूति है और समानुभूति का सामर्थ्य लोगों तक पहुंचने का माध्यम है आप कुछ ऐसा करें जिससे किसी के जीवन में फर्क पड़ता हो शब्दों के माध्यम से या फिर समय से करुणा एक रूप में परिभाषित नहीं है . कोई भारतीय हमदर्दी नहीं है . न ही कोई अमेरिकी सहानुभूति यह देश , लिंग , उम्र के बंधन के परे है क्यों ? क्योंकि यह सब में है . यह कभी कभार लोग अनुभव करते हैं तब ये यदा- कदा सहानुभूति की बात हम नहीं कर रहे हैं ये यदा- कदा नहीं रह सकती जनादेश करके , आप एक व्यक्ति दयालु नहीं कर सकते आप यह नहीं कह सकते " कृपया मुझे प्यार करो . " प्रेम का अहसास धीरे धीरे होता है यह एक क्रिया नहीं है लेकिन अंग्रेजी भाषा में , यह एक क्रिया भी है . मैं इस पर बाद में आऊँगा तो व्यक्ति को एक पूर्णता तलाशनी होती है मैं परिपूर्णता की संभावना का हवाला देने जा रहा हूँ जो हमारे अनुभव के दायरे के भीतर है , हर किसी के अनुभव के दायरे के भीतर एक बहुत ही दुखद जीवन के बावजूद , हम खुश होते हैं कुछ ही क्षण के लिए जो काफी देर बाद आते हैं और जो कोई खुश है , एक भद्दे मजाक पर भी अपने आप को स्वीकार करता है , और उन परिस्थितियों को भी , जिनमें वह एक अपने आप को पाता है . यानि पूरे ब्रह्मांड को , जानी अनजानी चीज़ों को , सब के सब पूरी तरह से स्वीकार किए जाते हैं क्योंकि आप अपने आप में अपनी पूर्णता पा लेते हो कर्त्ता , मैं और प्रयोजन , परिस्थितियां सब एक हो जाते हैं एक अनुभव जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है एक सर्वसामान्य अनुभव यह अनुभव , जो पुष्टि करता है कि , हमारी सभी सीमाओं के बावजूद, ™ हमारी सारी अतृप्त इच्छाओं और चाहतों , क्रेडिट कार्ड और छंटनी , और , अंत में गंजापन के बावजूद , आप खुश रह सकते हो लेकिन इस तर्क का विस्तार है कि खुश रहने के लिए अपनी इच्छा को पूरा करने की जरूरत नहीं है आप स्वयम ही वह आनन्द हो , वो पूर्णता हो जो तुम बनना चाहते हो इस में कोई विकल्प नहीं है . ये सिर्फ हकीकत की पुष्टि है कि तुम पूर्णता से अलग नहीं हो पूर्णता तुम्हारे बिना पूर्ण नहीं हो सकती वो समपूर्णता तुम ही तो हो तुम पूर्णता का हिस्सा नहीं होते हुए पूर्ण नहीं हो सकते आपके खुशी के क्षण इस वास्तविकता को प्रकट करते हैं वह बोध , वह स्वीकृति शायद मैं ही सम्पूर्णता हूँ शायद स्वामी सही है . शायद स्वामी सही है . आप अपना नया जीवन शुरू करते हैं . तब सब कुछ सार्थक हो जाता है . फिर मेरे पास अपने आप को दोष देने का कोई कारण नहीं रहता अगर आप खुद को दोष देते हैं तो इसके हजारों कारण है लेकिन अगर मैं कहता हूँ , मेरे शरीर सीमित होने के बावजूद अगर यह काला है तो सफेद नहीं है , यदि यह सफेद है तो काला नहीं है , किसी भी दृष्टिकोण से शरीर सीमित है . सीमाबद्ध तुम्हारा ज्ञान सीमित है, स्वस्थ सीमित है और इसलिए तुम्हारा सामर्थ्य सीमित है और तुम्हारी प्रसन्नचित्तता भी सीमित रहेगी तुम्हारी संवेदना भी सीमित होगी सब कुछ असीम रहेगा तुम संवेदना को आदेश नहीं दे सकते जब तक तुम असीमित नहीं होते , और कोई भी अपरिमित नहीं बन सकता या तो तुम हो या नहीं हो . विराम और तुम्हारे असीम नहीं होने का भी कोई रास्ता नहीं है आपके खुद के अनुभव प्रकट करते हैं की सभी सीमाओं के बावजूद आप सम्पूर्ण हो और ये परिपूर्णता आपकी सच्चाई है जब तुम दुनिया से सम्बन्ध बनाते हो वह पहले प्यार है जब तुम दुनिया से सम्बन्ध बनाते हो पूर्णता की गतिशील अभिव्यक्ति जिसे हम प्रेम कहते है और वह संवेदना में परिवर्तित हो जाता है अगर वो वस्तु आप में वह भावना जगाती है और फिर उसके बाद देने और सहभागिता में परिवर्तित हो जाये आप खुद को अभिवयक्त करते हो क्यूंकि आप में संवेदना है दया और संवेदना को खुद में तलाशने और तराशने के लिए आपको दयालु होना होगा देने और बांटने का समर्थ तलाशने के लिए आपको दानी और बाँटनेवाला होना होगा कोई छोटा रास्ता नहीं है . ये तैर कर तैराकी सिखने जैसा है आप तैर कर ही तैराकी सीखते हैं आप दरी पर तैराकी सीख कर पानी में नहीं उतर सकते ( खिलखिलाहट ) आप तैर कर ही तैराकी सीखते हैं . साइकिल चलाना आप साइकिल चला कर ही सीखते हैं आप खाना बनाना खाना बना कर सीखते हैं आपने आसपास के दयालु लोगों को आपना बनाया खाना खिला कर ( खिलखिलाहट )
(trg)="1"> मूल जन्माला येते आणि बर्‍याच काळासाठी ते फक्त एक ग्राहक असते . ते प्रत्यक्ष सहयोगी होऊ शकत नाही . ते असहाय्य असते . त्याला स्वतःचे अस्तित्व स्वतः राखता येत नाही , जगण्याचे सहजज्ञान जन्मतःच मिळूनदेखील . त्याला जगण्यासाठी आईची किंवा पालनकर्त्याची मदत घ्यावी लागते . ते आपल्या पालनकर्त्यावर संशय घेऊ शकत नाही . त्याला पूर्णपणे आत्मसमर्पण करावे लागते . जसे शस्त्रक्रियेपूर्वी आपण स्वतःला भूलतज्ञाच्या हवाली करतो . त्याला संपूर्ण समर्पण करावेच लागते . त्यामधून विश्वासाची भावना सूचित होते . अशी भावना असते की ही विश्वासू व्यक्ती आपला विश्वासघात करणार नाही . जसजसे मूल मोठे होत जाते , त्याच्या लक्षात येऊ लागते की ही विश्वासू व्यक्ती आपल्या विश्वासाला धक्का पोचवत आहे . त्याला विश्वासघात हा शब्ददेखील माहिती नसतो . त्यामुळे , ते स्वतःला दोष देते . हा निःशब्द आत्मदोष असतो . ज्याचे निराकरण करणे अतिशय अवघड असते , असा निःशब्द आत्मदोष . ते मूल आता वयात येऊ लागते . आतापर्यंत ते फक्त एक ग्राहक होते . परंतु मानवाची खरी वाढ त्याच्या सहयोग क्षमतेमध्ये आहे , त्याच्या सहयोगी , सहभागी होण्यामध्ये आहे . त्याचा सहभाग तोपर्यंत शक्य नाही , जोपर्यंत त्याला सुरक्षित वाटत नाही , मुक्त वाटत नाही , किंवा माझ्याकडे देण्यासाठी खूप काही आहे असे वाटत नाही . संवेदनशील होणे म्हणजे चेष्टा नव्हे . वाटते तितके ते सोपे नाही . त्यासाठी स्वतःची विशालता ओळखावी लागते . ही विशालता स्वकेंद्रीत असावी लागते . ना संपत्तीवर , ना सत्तेवर , ना तुमच्या समाजातील प्रतिष्ठेवर , तर ती केंद्रीत असावी लागते स्वतःवर . तुम्ही स्वतः , तुमचा आत्मबोध . या ´स्व´वर ती महानता , ते पूर्णत्व केंद्रीत करावे लागते . अन्यथा , अनुकंपा हा केवळ एक शब्द उरेल , आणि न पूर्ण होणारे स्वप्न .
(trg)="2"> तुम्ही कधी कधीच संवेदनशील होऊ शकता , सहानुभूतीने अधिक भावनिक होऊन अनुकंपेपेक्षा . सुदैवाने आपण सारे सहानुभूतीपूर्वक विचार करु शकतो . कुणीतरी दुःखी असेल , तर आपणही त्याच्या दुःखात सहभागी होतो . एखाद्या विम्बल्डनच्या स्पर्धेत , अंतिम सामन्यात , दोन प्रतिस्पर्धी समोरासमोर उभे ठाकतात . प्रत्येकाकडे दोन डाव असतात . तो कोणाचाही डाव असू शकतो . त्यांनी आत्तापर्यंत गाळलेल्या घामाला काही अर्थ उरत नाही . कारण शेवटी एकचजण जिंकतो . टेनिसच्या शिष्टाचारानुसार दोन्ही खेळाडूंनी मधल्या जाळीजवळ येऊन हस्तांदोलन करायचे असते . विजेता हवेमध्ये ठोसा मारतो , आणि टेनिस कोर्टाचे चुंबन घेतो , प्रेक्षकांतील कुणीतरी वाट पाहत असल्यागत आपला शर्ट काढून भिरकावतो .
(trg)="3"> ( हशा ) आता त्याच खेळाडूला मधल्या जाळीकडे जाणे भाग असते . तो जेव्हा त्या जाळीजवळ येतो , तेव्हा त्याच्या चेहर्‍यावरील भाव पूर्णपणे बदललेले तुम्हाला दिसतील . आपण जिंकायला नको होते असे भाव त्याच्या चेहर्‍यावर दिसतात . का ? सहानुभूती ! हा मनुष्य स्वभाव आहे . मानवी हृदय वागविणारा कोणीही ही सहानुभूती नाकारु शकत नाही . कोणताही धर्म मतारोपणाने ती उद्ध्वस्त करु शकत नाही . कोणतीही संस्कृती , कोणतेही राष्ट्र आणि राष्ट्रवाद , कोणीही तिला धक्का पोचवू शकत नाही , अशी ही सहानुभूती आहे . आणि हीच सहानुभूतीची क्षमता म्हणजे तुमचा इतर लोकांपर्यंत पोहोचण्याचा मार्ग आहे , ज्यायोगे तुम्ही एखादाच्या आयुष्यामध्ये बदल घडवून आणू शकता . शब्दांच्या माध्यमातून आणि वेळेच्या माध्यमातूनही . करुणा एका चौकटीत बसवता येत नाही . ही भारतीय करुणा , ती अमेरिकन सहानुभूती , असे वर्गीकरण करता येत नाही . ती देश , लिंग , वय या सर्वांच्या पलिकडे आहे . का ? कारण , तिचे अस्तित्व प्रत्येकात आहे . कधी कधी लोकांना तिची जाणीव होते . अशा कधी कधी वाटणार्‍या करुणेबद्दल आपण बोलत नाही आहोत . ती नेहमीच अशी कधीमधीची असणार नाही . आदेश देऊन तुम्ही एखाद्याला सहानुभूती वाटायला लावू शकत नाही .

(src)="2"> और , इसलिए मैं कहता हूँ आपको कुछ बनाने के लिए नक़ल करना होगा ( खिलखिलाहट ) और कोई चारा नहीं है मेरे पूर्वाधिकारी ने भी यही कहा आपको ऐसा बर्ताव करना होगा आपको सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव करना होगा दया , संवेदना के लिए कोई क्रिया नहीं है पर संवेदना के लिए एक क्रिया विशेषण है यह मुझे काफी रोचक लगता है आप सहानुभूति पूर्वक कार्य करो पर आप सहानुभूति पूर्वक कार्य कैसे करोगे अगर आप में करुणा न हो यहीं पर आप नक़ल कर सकते हैं नक़ल करके बन जाइये . यही तो अमेरिका का मन्त्र है ( खिलखिलाहट ) नक़ल करके बन जाइये आप सहानुभूति पूर्वक कार्य करो , जैसे आप में करुणा हो अपने दाँत पीसो अपनी समर्थन प्रणाली से पूरी मदद लें अगर तुम्हें प्रार्थना करना आता है तो प्रार्थना करो . इश्वर से करुणा मांगो मुझे सहानुभूति पूर्ण और करुणामय व्यवहार करने दो ऐसा करो तुम करुणा को खोज लोगे और धीरे धीरे पहले की तुलना में दया , और धीरे धीरे , शायद अगर तुम सही शिक्षण मिल , तुम्हें पता चलेगा कि करुणा एक गतिशील अभिव्यक्ति है तुम्हारे यथार्थ की , सम्पूर्णता और एकता , और वही तो तुम हो इन्हीं शब्दों के साथ , बहुत बहुत धन्यवाद ( प्रशंसा ध्वनि )
(trg)="7"> आणि म्हणूनच मला हे सांगायचे आहे की , तुम्हाला त्या गोष्टीचे सोंग आणून ती घडवावी लागेल .
(trg)="8"> ( हशा ) असेच करणे भाग आहे . माझ्या आधीचे वक्ते असेच म्हणून गेले . तुम्हाला तशी कृती करावी लागेल . तुम्हाला सहानुभूतीपूर्वक कृती करावी लागेल . सहानुभूतीसाठी कोणतेही क्रियापद नाही , पण सहानुभूतीसाठी क्रियाविशेषण आहे . काय गंमत आहे पहा . तुम्ही सहानुभूतीपूर्वक कृती करता . पण दयाळू कृती कशी करता येईल , जर तुमच्या मनात दयाच नसेल ? इथेच तुम्हाला सोंग आणावे लागते . कोणत्याही गोष्टीचे सोंग पांघरुन तुम्हाला ती गोष्ट घडवून आणता येते . अमेरिकन संघराज्यांचा तर हाच मंत्र बनला आहे .
(trg)="9"> ( हशा ) बनाव करुन तुम्ही कोणतीही गोष्ट घडवता . तुम्ही सहानुभूतीपूर्वक कृती करता , जणू तुमच्या मनात अपार करुणा भरली आहे , तुम्ही पराकाष्ठेचे प्रयत्न करता , सर्व बाजूंनी मदत मिळविण्याचा प्रयत्न करता , तुम्हाला प्रार्थना करता येत असेल तर तुम्ही प्रार्थना करता . करुणेचे देणे मागून घ्या . सहानुभूतीपूर्वक कृती करु द्या . असेच करीत रहा . त्यातून तुम्हाला करुणेचा शोध लागेल . आणि हळूहळू सापेक्ष करुणेचीही जाणीव होईल , आणि हळूहळू , योग्य मार्गदर्शन मिळाले तर तुम्हाला शोध लागेल की करुणा हे एक प्रेरक प्रकटीकरण आहे , तुमच्या स्वतःच्या वास्तवाचे , म्हणजेच एकतेचे व पूर्णत्वाचे , आणि हे सर्व म्हणजेच तुम्ही स्वतः आहात . या शब्दांबरोबरच , मी तुम्हा सर्वांचे आभार मानतो .

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(src)="1"> जब मैं 11 साल का थी मैं एक सुबह उठी खुशी की आवाज़ मेरे पिता बीबीसी समाचार सुन रहा था अपने छोटे , ग्रे रेडियो पर . उनके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान जो असामान्य तब था , क्योंकि खबर ज्यादातर उसे उदास . " तालिबान चले गए ! " मेरे पिता चिल्लाया . मैं नहीं जानता था कि यह क्या मतलब है , लेकिन मैं देख सकता था कि मेरे पिता बहुत , बहुत खुश था . अब आप एक असली स्कूल के लिए जा सकते हैं " , उन्होंने कहा . एक सुबह कि वह कभी नहीं भूल जाएगा . एक असली स्कूल . तुम देखो , मैं छह साल का था जब तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया और यह गैरकानूनी लड़कियों को स्कूल जाने के लिए के लिए बनाया है . तो अगले पांच वर्षों के लिए , मैं एक लड़के के रूप में कपड़े पहने बड़ी बहन के साथ जाने के रूप में वह अकेले बाहर नहीं जाना चाहिए एक गुप्त स्कूल यह एकमात्र तरीका था , हम दोनों को शिक्षित किया जा सकता है . हर दिन , हम एक अलग मार्ग लिया ताकि कोई भी संदेह है , हम कहाँ जा रहे थे . हम किराने की थैलियों में हमारी किताबों को कवर किया जाएगा तो यह लगता है , हम बाहर खरीदारी के लिए जा रहे थे . स्कूल के एक घर में था , 100 से अधिक एक छोटे से कमरे में बैठे थे . यह सर्दियों में आरामदायक है , लेकिन गर्मियों में बेहद गर्म था . हम सभी को पता था कि हम हमारे जीवन को खतरे में डाल रहे थे - शिक्षक , छात्रों और हमारे माता पिता . समय समय पर , स्कूल अचानक रद्द कर दिया जाएगा क्योंकि तालिबान के एक सप्ताह के लिए संदिग्ध थे . हम हमेशा सोचा है कि वे हमारे बारे में क्या पता था . थे हम पर जाया जा रहा है ? क्या वे जानते हैं कि जहां हम रहते हैं ? हम डरे हुए थे , लेकिन फिर भी , स्कूल था जहाँ हम होना चाहते थे . मैं बहुत भाग्यशाली था एक परिवार है शिक्षा जहां बेशकीमती और बेटियों क़ीमती थे . मेरे दादा अपने समय के लिए एक असाधारण आदमी था . अफगानिस्तान के दूरदराज के एक प्रांत से आवारा , उन्होंने जोर देकर कहा है कि उसकी बेटी , स्कूल जाना है , और के लिए है कि वह अपने पिता द्वारा अस्वीकृत था गया था . लेकिन मेरे शिक्षित माँ एक शिक्षक बन गया . वह वहाँ है . वह दो साल पहले सेवानिवृत्त हुए , केवल हमारे घर बारी करने के लिए हमारे पड़ोस में लड़कियों और महिलाओं के लिए एक स्कूल में . और मेरे पिता वह अपने परिवार में पहले व्यक्ति को शिक्षित किया जा था था . वहाँ कोई सवाल ही नहीं था कि अपने बच्चों को उसकी बेटियों सहित एक शिक्षा प्राप्त होगा , तालिबान के बावजूद , जोखिम के बावजूद . वह अपने बच्चों को शिक्षित नहीं में अधिक से अधिक जोखिम देखा .. तालिबान के वर्षों के दौरान , मुझे याद है कभी कभी मैं तो जीवन से निराश हो जाएगा हमेशा डर लगता है , जा रहा है और एक भविष्य देख नहीं है . मैं छोड़ने के लिए करना चाहते हैं , लेकिन मेरे पिता , वे कहते हैं ,
(trg)="1"> मला आठवतंय , मी अकरा वर्षांची असताना एके दिवशी सकाळी मला एका खुशखबरीने जाग आली होती . माझे वडील त्यांच्या छोट्या करड्या रेडिओवर बीबीसीच्या बातम्या ऐकत होते . त्यांच्या चेहऱ्यावर मोठ्ठं हास्य होतं . हे एक नवलच होतं . कारण बातम्या ऐकून ते नेहमी उदास होत असत . " तालिबान निघून गेले " ते ओरडले . मला याचा अर्थ समजला नाही . पण माझे वडील खूप खूष दिसत होते . " आता तुला खऱ्या शाळेत जाता येईल . " ते म्हणाले . ती सकाळ मी कधीच विसरणार नाही . खरी शाळा . मी सहा वर्षांची होते तेव्हा तालिबानने अफगाणिस्तानचा ताबा घेतला आणि मुलींचं शिक्षण बेकायदेशीर ठरवलं . पुढची पाच वर्षं मी मुलांसारखे कपडे घालीत असे . माझ्या मोठ्या बहिणीला एकटीने हिंडायला बंदी होती . म्हणून , तिच्यासोबत एका छुप्या शाळेत जाण्यासाठी . आम्हा दोघींना शिकण्याचा तो एकच मार्ग होता . दर दिवशी आम्ही वेगळ्या रस्त्याने जायचो . कुणाला संशय येऊ नये म्हणून . आम्ही आमची पुस्तकं पिशवीत लपवून सहज बाजारात गेल्यासारख्या जायचो . ही शाळा एका घरात होती . आम्ही शंभरावर मुलं एका छोट्या खोलीत जमायचो . हिवाळ्यात ते उबदार वाटे . पण उन्हाळ्यात अतिशय उकडायचं . आम्ही जाणूनबुजून जीव धोक्यात घालीत होतो . शिक्षक , विद्यार्थी आणि आमचे पालक , सर्वच . अनेकदा शाळा अचानक आठवडाभर बंद ठेवली जाई . तालिबानला संशय आला म्हणून . आम्हाला नेहमी वाटे , त्यांना आपल्याबद्दल काय माहित असेल ? आपला पाठलाग होत असेल का ? आपण कुठे राहतो ते त्यांना ठाऊक असेल का ? आम्हाला भीती वाटे . पण तरीही आम्हाला शाळेत जायचं होतं . माझं भाग्य मोठं , म्हणून मी अशा एका कुटुंबात लहानाची मोठी झाले की जिथे शिक्षणाला मान होता आणि मुली ही मौल्यवान ठेव होती . माझे आजोबा त्यांच्या काळातले एक असामान्य पुरुष होते . अफगाणिस्तानाच्या एका दुर्गम भागातल्या या सर्वस्वी बेलगाम माणसाने , आग्रह धरला , त्यांच्या मुलीला , म्हणजे माझ्या आईला , शाळेत घालण्याचा . आणि त्यासाठी त्यांच्या वडिलांनी त्यांच्याशी संबंध तोडले होते . पण माझी आई शिकली , ती शिक्षिका झाली . ही पहा . दोन वर्षांपूर्वी ती निवृत्त झाली , ती केवळ आमच्या घराचं रूपांतर , आजूबाजूच्या मुली आणि स्त्रियांच्या शाळेत करण्यासाठीच . आणि माझे वडील - हे पहा - त्यांच्या घराण्यातले शिकणारे ते पहिलेच . तेव्हा त्यांची मुलं आणि मुलीसुद्धा शिकणार यात शंकाच नव्हती . तालिबानसारखे धोके असूनही . त्यांच्या मते , आपल्या मुलांना शिक्षण न देणं हा जास्त मोठा धोका होता . मला आठवतंय , तालिबानच्या काळात काही वेळा आपल्या आयुष्याकडे पाहून मी खूप हताश होई . तसंच सततची भीती , आणि समोर भविष्य दिसत नसल्यामुळेही . मला ( शिक्षण ) सोडून द्यावंसं वाटे . पण माझे वडील , ते म्हणत ,

(src)="2"> " सुनो , मेरी बेटी , आप अपने जीवन में सब कुछ अपने आप को खो सकते हैं . आपका पैसा चुराया जा सकता है . आप के लिए एक युद्ध के दौरान अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर किया जा सकता है . लेकिन एक बात है कि हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा यहाँ क्या है और अगर हम हमारे खून बेचने के स्कूल की फीस का भुगतान किया है , हम करेंगे . आप अभी भी नहीं चाहते ? जारी रखने के लिए " आज मैं 22 हूँ . मैं नष्ट कर दिया गया है कि एक देश में पले युद्ध के दशकों से महिलाओं के कम से कम छह प्रतिशत मेरी उम्र यह उच्च विद्यालय से परे बना दिया है , और मेरे परिवार तो था मेरी शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं किया गया है , मैं उनमें से एक होगा . इसके बजाय , मैं मिडलबरी कॉलेज के एक गर्व स्नातक हूँ .
(trg)="2"> " ऐक , माझ्या मुली , आयुष्यात आपल्या मालकीचं जे काही असतं , ते सगळं गमावलं जाऊ शकतं . आपले पैसे चोरले जाऊ शकतात . लढाईत आपल्याला आपल्या घरातून हाकललं जाऊ शकतं . पण कायम आपल्यासोबत राहणारी एकमेव गोष्ट म्हणजे ही इथे आहे ती . आणि आम्हाला जर तुझ्या शाळेची फी भरण्याकरता आमचं रक्त विकावं लागणार असेल , तर आम्ही ते विकू . तर , अजूनही तुला ( शिक्षण ) सुरू ठेवावसं वाटत नाही काय ? " आज मी बावीस वर्षांची आहे . मी लहानाची मोठी झाले , ती दशकभर चाललेल्या युद्धात नाश पावलेल्या एका देशात . माझ्या वयाच्या सहा टक्क्याहून कमी स्त्रियांनी माध्यमिक शाळा पार केली आहे . माझ्या कुटुंबाने जर माझ्या शिक्षणाचा निर्धार केला नसता , तर मीही त्या ( स्त्रियां) तलीच एक ठरले असते . त्याऐवजी , आज मी इथे मिडलबरी कॉलेजची पदवीधर म्हणून अभिमानाने उभी आहे .

(src)="3"> ( तालियाँ ) जब मैं अफगानिस्तान के लिए लौट आए , मेरे दादा , अपनी बेटियों को शिक्षित करने के लिए साहस के लिए अपने घर से निर्वासित , मुझे बधाई देने के लिए पहली बार था . वह गर्व से अपने कॉलेज की डिग्री के बारे में बात करती है , लेकिन यह भी है कि मैं पहली महिला थी , और कहा कि मैं पहली महिला हाय कार में काबुल की सड़कों पर ड्राइव .
(trg)="3"> ( टाळ्या ) मी जेव्हा अफगाणिस्तानात परतले , तेव्हा मुलींना शिकवल्याबद्दल घरातून हद्दपार झालेल्या माझ्या आजोबांनी माझं सर्वप्रथम अभिनंदन केलं . ते बढाई मारतात , ती केवळ माझ्या पदवीची नव्हे , तर ( पदवी घेणारी ) मी पहिलीच स्त्री म्हणूनही . आणि मी पहिलीच स्त्री आहे , त्यांना काबूलच्या रस्त्यांतून स्वतः गाडी चालवून घेऊन जाणारी , म्हणून .

(src)="4"> ( तालियाँ ) मेरा परिवार भरोसा करता है . मैं बड़ा सपना है , लेकिन मेरे परिवार ने मुझे के लिए भी बड़े सपने यही कारण है कि मैं 10x10 के लिए एक वैश्विक राजदूत है , महिलाओं को शिक्षित करने के लिए एक वैश्विक अभियान . यही कारण है कि मैं SOLA सह की स्थापना की है , और शायद पहली बार ही बोर्डिंग स्कूल अफगानिस्तान में लड़कियों के लिए , एक देश में , जहां यह अभी भी जोखिम भरा है के लिए लड़कियों को स्कूल जाने के लिए . रोचक बात यह है कि मैं अपने स्कूल में छात्रों को देखने के महत्वाकांक्षा अवसर पर हथियाने के साथ . और अपने माता पिता और पिता को देखने के जो , उनके लिए अपने वकील , जैसे , बावजूद और चुनौतीपूर्ण विरोध का सामना करना पड़ रहा है . अहमद की तरह . यह उसका असली नाम नहीं है , और मैं तुम उसका चेहरा नहीं दिखा सकते हैं , लेकिन अहमद अपने छात्रों में से एक के पिता है . एक महीने पहले की बात है , वह और उसकी बेटी
(trg)="4"> ( टाळ्या ) माझ्या घरच्यांचा माझ्यावर विश्वास आहे . मी मोठी स्वप्नं पाहते , पण माझ्या घरच्यांची स्वप्नं त्याहूनही मोठी आहेत . म्हणून मी १० x १० ची वैश्विक राजदूत झाले .
(trg)="5"> १० x १० ही स्त्रीशिक्षणाची एक जागतिक मोहीम आहे . तशीच मी SOLA ची सहसंस्थापिका झाले .
(trg)="6"> SOLA ही अफ़गाणिस्तानातली पहिलीच आणि कदाचित एकमेव मुलींची निवासी शाळा आहे . अशा एका देशातली , जिथे अजूनही मुलींनी शाळेत जाणं धोक्याचं आहे . कौतुकाची गोष्ट अशी , की माझ्या शाळेतल्या महत्त्वाकांक्षी विद्यार्थिनी मला सुसंधी पटकावताना दिसताहेत . आणि त्यांचे पालक आणि जन्मदाते , माझ्या घरच्यांप्रमाणेच , त्यांची पाठराखण करताना दिसताहेत , भयानक विरोध पत्करून आणि त्याला तोंड देऊन . अहमद प्रमाणे . हे काही त्याचं खरं नाव नव्हे . आणि मी तुम्हाला त्याचा चेहरा दाखवू शकत नाही . पण अहमद माझ्या एका विद्यार्थिनीचा पिता . महिन्याभरापूर्वी , तो आणि त्याची मुलगी

(src)="5"> SOLA से अपने गांव के लिए अपने रास्ते पर थे , वे मारे जा से याद किया मिनट से एक सड़क के किनारे बम से . जैसा कि वह घर आ गया , फोन बज उठा , उसे एक आवाज चेतावनी कि , अगर वह अपनी बेटी को भेजा स्कूल में वापस वे फिर से कोशिश करेंगे . " अब मुझे मार डालो , अगर आप चाहते हैं , " उन्होंने कहा ,
(trg)="7"> SOLA हून आपल्या गावी जायला निघाले होते . आणि ते रस्त्यावरच्या बॉम्बस्फोटात अक्षरशः मरता मरता वाचले . केवळ काही मिनिटांच्या फरकाने . तो घरी पोहोचताच फोन वाजला . त्याला धमकावण्यात आलं . पुन्हा जर मुलीला शाळेत पाठवलंस , तर आम्ही पुन्हा प्रयत्न करू म्हणून . " हवं तर आत्ताच मारा मला , " तो म्हणाला ,

(src)="6"> " लेकिन मैं अपनी बेटी के भविष्य को बर्बाद नहीं होगा अपने पुराने और पिछड़े विचारों की वजह से . " मैं अफगानिस्तान के बारे में समझा है क्या , और इस तथ्य को अक्सर पश्चिम में खारिज कर दिया है , कि हम में से ज्यादातर लोग सफल पीछे एक पिता जो अपनी बेटी में मूल्य पहचानता है और जो देखता है कि उसकी सफलता उसकी सफलता है . यह कहना नहीं है कि हमारी मां हमारी सफलता में महत्वपूर्ण नहीं हैं . वास्तव में , वे अक्सर प्रारंभिक और ठोस वार्ताकारों अपनी बेटियों के लिए एक उज्जवल भविष्य के , लेकिन अफगानिस्तान में जैसे समाज के संदर्भ में , हम पुरुषों के समर्थन होना चाहिए . तालिबान काल के दौरान लड़कियों , जो स्कूल के पास गया सैकड़ों की संख्या में गिने - याद रखना , यह अवैध रूप से किया गया था . लेकिन आज , तीन लाख से अधिक लड़कियों को स्कूल में अफगानिस्तान में हैं .
(trg)="8"> " पण तुमच्या जुन्या आणि मागासलेल्या कल्पनांपायी मी माझ्या मुलीचं भविष्य नष्ट करणार नाही . " मला जी गोष्ट अफगाणिस्तानबद्दल जाणवली आहे , आणि जी पाश्चात्यांकडून नेहमी डावलली जाते ती अशी , की आमच्यापैकी बहुतेक यशस्वी मुलींच्या पाठीशी एक पिता असतो , जो त्याच्या मुलीची योग्यता जाणतो आणि तिचं यश हेच आपलं यश मानतो .
(trg)="9"> ( मला ) असं म्हणायचं नाही , की आमच्या माता आमच्या यशाच्या शिल्पकार नसतात . खरं तर , बरेचदा त्याच पुढाकार घेऊन मुलींना शिकवण्याचा आग्रह धरतात . पण अफगाणिस्तानासारख्या समाजाच्या संदर्भात , आम्हाला पुरुषांचा पाठिंबा आवश्यक असतो . तालिबानच्या राजवटीत , शाळेत जाणाऱ्या मुलींची संख्या शेकड्यात होती . आठवतं का , ते बेकायदेशीर होतं . पण आज , अफगाणिस्तानातल्या तीस लाखावर मुली शाळेत शिकताहेत .